
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति में कब कौन सा समीकरण बदल जाए, इसका अंदाजा लगाना अक्सर मुश्किल होता है। हाल ही में जो वाशिंगटन कुछ सप्ताह पहले तक भारत द्वारा रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने पर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहा था, वही अमेरिका आज खुद भारत की ऊर्जा नीति का समर्थक बन गया है। ईरान और अमेरिका के बीच छिड़े मौजूदा सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिलाकर रख दिया है, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका ने अपनी नीतियों में एक बड़ा और रणनीतिक ‘यू-टर्न’ लिया है।
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रूसी तेल खरीद पर अपनाया था सख्त रुख
गौरतलब है कि, कुछ हफ्ते पहले तक स्थिति बिल्कुल विपरीत थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन भारत के रूसी तेल आयात को लेकर अत्यंत सख्त रुख अपनाए हुए था। यहां तक कि अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी तक टैरिफ लगाने का फैसला भी इसी मुद्दे को आधार बनाकर लिया था। अमेरिकी प्रशासन का तर्क था कि, भारत का यह कदम रूसी अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है।

हालांकि, ईरान के साथ उपजे ताजा सैन्य संघर्ष ने स्थिति की गंभीरता बदल दी है। होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव, ईराक द्वारा उत्पादन में कटौती और ईरान की ओर से लगातार मिल रही धमकियों ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को संकट में डाल दिया है। इस बदलती परिस्थितियों में, अमेरिका ने अब औपचारिक रूप से भारत के रूस से तेल खरीदने के फैसले का न केवल बचाव किया है, बल्कि इसे वैश्विक स्थिरता के लिए आवश्यक भी माना है।
भारत को बताया ग्रेट पार्टनर
भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने एक्स पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश साझा किया है, जिसने दुनिया भर के विश्लेषकों का ध्यान खींचा है। गोर ने लिखा, पूरी दुनिया में तेल की कीमतें स्थिर बनाए रखने में भारत एक ग्रेट पार्टनर है। अमेरिका मानता है कि, रूस से लगातार तेल खरीदना इसी प्रयास का हिस्सा है। राजदूत गोर ने आगे स्पष्ट किया कि, भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं और रिफाइनरों में से एक है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि मौजूदा वैश्विक अनिश्चितता के दौर में अमेरिका और भारत के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करने और बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए हाथ से हाथ मिलाकर काम करें। यह बयान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका अब भारत को एक ऐसे रणनीतिक भागीदार के रूप में देख रहा है, जो ग्लोबल एनर्जी मार्केट को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है।
30 दिनों की छूट का फैसला
सर्जियो गोर के इस रुख को व्हाइट हाउस का पूर्ण समर्थन प्राप्त है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने मीडिया से बात करते हुए इस नीतिगत बदलाव की पुष्टि की। लेविट ने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, ट्रेजरी डिपार्टमेंट और नेशनल सिक्योरिटी टीम के बीच उच्च-स्तरीय चर्चा के बाद ही भारत को रूसी तेल आयात पर 30 दिनों की तत्कालीन छूट देने का फैसला लिया गया है।
व्हाइट हाउस की तरफ से आए इस बयान में सहयोगी शब्द का बार-बार इस्तेमाल किया गया है। लेविट ने कहा, राष्ट्रपति और पूरी नेशनल सिक्योरिटी टीम इस फैसले पर इसलिए पहुंची, क्योंकि भारत हमारे बहुत अच्छे सहयोगी रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह छूट ईरान के साथ चल रहे सैन्य तनाव से पैदा हुई सप्लाई चेन की रुकावटों को कम करने के लिए एक सामरिक उपाय है।
अमेरिका के लिए ‘सेफ्टी वाल्व’
अमेरिकी प्रशासन ने अपने इस फैसले पर सफाई देते हुए यह भी कहा कि, इस छूट का उद्देश्य मास्को को आर्थिक रूप से फायदा पहुंचाना बिल्कुल नहीं है। व्हाइट हाउस का मानना है कि, मौजूदा व्यवस्था से रूस को कोई विशेष आर्थिक बढ़त हासिल नहीं होगी। इसके बजाय, यह कदम पूरी तरह से ग्लोबल मार्केट में तेल की उपलब्धता सुनिश्चित करने और कीमतों को बेकाबू होने से रोकने पर केंद्रित है। ईरान द्वारा दी जा रही सुरंग बिछाने की धमकियों और होर्मुज स्ट्रेट के बाधित होने की खबरों ने दुनिया भर में तेल की कीमतों को लेकर खौफ पैदा कर दिया है। ऐसी स्थिति में भारत की रिफाइनिंग क्षमता और उसका रूस से निर्बाध आयात, अमेरिका के लिए एक ‘सेफ्टी वाल्व’ की तरह काम कर रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बदलाव भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की जीत है। भारत ने शुरू से ही यह रुख अपनाया था कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा उसकी विदेश नीति का अभिन्न हिस्सा है। भले ही अमेरिका ने पहले दबाव बनाने की कोशिश की, लेकिन जब वैश्विक स्थिरता का प्रश्न आया, तो अमेरिका को अपनी जिद छोड़कर भारत के तर्क को मानना पड़ा। यह घटनाक्रम भारत की उस कूटनीतिक परिपक्वता को भी दर्शाता है जिसके तहत भारत ने बिना किसी घबराहट के अपने हितों की रक्षा करते हुए रूस के साथ तेल व्यापार जारी रखा। अब, अमेरिका का यह रुख भारत की वैश्विक हैसियत को और अधिक मजबूत करता है।
विश्व बाजार में अस्थिरता
30 दिनों की यह छूट केवल एक शुरुआत मानी जा रही है। अगर ईरान-अमेरिका संघर्ष लंबा खिंचता है, तो संभावना है कि इस व्यवस्था को और आगे बढ़ाया जा सकता है। वर्तमान में, विश्व बाजार में अस्थिरता के बादल छाए हैं और भारत एक ‘स्टेबलाइजर’ के रूप में उभर रहा है।अंत में, यह स्पष्ट है कि वैश्विक राजनीति में राष्ट्रीय हित ही सर्वोपरि होते हैं। जहाँ पहले रूसी तेल खरीद भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव का कारण बन रही थी, वहीं अब यही तेल खरीद उन संबंधों को स्थिरता देने का आधार बन गई है। यह घटनाक्रम न केवल भारत के लिए एक कूटनीतिक जीत है, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का एक प्रमाण भी है।
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