यूपी में आतंकी साजिश का पर्दाफाश, निशाने पर था ये मॉल और हिंदू संगठन का दफ्तर

 लखनऊ। उत्तर प्रदेश में एक बार फिर आतंक के काले साये ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स के इशारे पर भारत की शांति व्यवस्था को भंग करने और दहलाने की एक बेहद खतरनाक साजिश का पर्दाफाश हुआ है। यूपी एटीएस द्वारा गिरफ्तार किए गए चार संदिग्ध आतंकियों के मोबाइल फोन से जो जानकारी सामने आई हैं, उसने न केवल सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह भी साफ कर दिया है कि सीमा पार बैठे दुश्मन अब डिजिटल नेटवर्क का इस्तेमाल कर स्थानीय युवाओं को किस हद तक गुमराह कर रहे हैं।

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सरहद पार भेजी गईं थीं तस्वीरें

इस पूरी साजिश का केंद्र गाजियाबाद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण स्थान थे, जिनकी रेकी कर बाकायदा वीडियो और तस्वीरें सरहद पार भेजी गई थीं। यह खुलासा उस वक्त हुआ है जब एजेंसियां आरोपियों के डिजिटल फुटप्रिंट्स और वित्तीय लेन-देन की कड़ियों को जोड़ने में जुटी हुई हैं।

एटीएस द्वारा लखनऊ से गिरफ्तार किए गए मेरठ निवासी साकिब, अरबाब, लोकेश और विकास के पास से मिले इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों ने जांच की दिशा बदल दी है। जांच में यह सनसनीखेज तथ्य सामने आया है कि, इन संदिग्धों के निशाने पर गाजियाबाद के साहिबाबाद स्थित हिंदू रक्षा दल का कार्यालय और राजनगर एक्सटेंशन में स्थित दिल्ली-6 मॉल था।

आरोपियों ने इन दोनों ही स्थानों की बड़ी बारीकी से रेकी की थी और वहां के प्रवेश व निकास द्वारों के साथ-साथ भीड़भाड़ वाले इलाकों के वीडियो बनाकर अपने पाकिस्तानी आकाओं को व्हाट्सएप पर भेजे थे। माना जा रहा है कि, इन स्थानों पर विस्फोट करने और बड़े पैमाने पर आगजनी कर दहशत फैलाने की साजिश थी। पाकिस्तानी हैंडलर्स ने इन वीडियो को प्राप्त करने के बाद आरोपियों के काम की सराहना की और उन्हें आगे की कार्रवाई के लिए उकसाया था।

क्यूआर कोड से भेजी गई रकम

आतंक के इस कारोबार में पैसों के लेन-देन का भी एक नया और चौंकाने वाला तरीका सामने आया है। जांच के दौरान पता चला कि, इन लोकेशन की रेकी करने के एवज में आरोपियों को तत्काल इनाम के तौर पर 13 हजार रुपये दिए गए थे। यह रकम सीधे तौर पर किसी बैंक खाते में न भेजकर डिजिटल माध्यम यानी क्यूआर कोड के जरिए भेजी गई थी।

आरोपियों में शामिल विकास ने अपना निजी क्यूआर कोड देने के बजाय अपने जीजा का बैंक खाता उपयोग किया था, ताकि जांच एजेंसियों की नजरों से बचा जा सके। पाकिस्तान से आए इस फंड ने यह स्पष्ट कर दिया है कि, आतंकी संगठन अब छोटे-छोटे स्थानीय नेटवर्क को सक्रिय करने के लिए डिजिटल पेमेंट और यूपीआई का सहारा ले रहे हैं ताकि उनकी फंडिंग की ट्रैकिंग मुश्किल हो सके।

आरोपियों के मंसूबे केवल गाजियाबाद तक ही सीमित नहीं थे। मोबाइल डेटा की गहराई से जांच करने पर पता चला कि इन संदिग्धों ने अलीगढ़ में स्थित एक नामी कार शोरूम की भी रेकी की थी। वहां भी उनकी योजना आगजनी करने की थी ताकि आर्थिक नुकसान के साथ-साथ जनता के बीच डर पैदा किया जा सके। इसके अलावा, गाजियाबाद में सड़क किनारे खड़े रहने वाले भारी ट्रकों और व्यावसायिक वाहनों के वीडियो भी पाकिस्तानी हैंडलर्स को साझा किए गए थे।

24 पर्चें ने उड़ाए सुरक्षाबलों के होश

आशंका जताई जा रही है कि इन ट्रकों का इस्तेमाल किसी बड़े आत्मघाती हमले या फिर रसद की आपूर्ति में बाधा डालने के लिए किया जाना था। एटीएस के पास इन सभी घटनाओं से संबंधित व्हाट्सएप चैट, ऑडियो रिकॉर्डिंग और सटीक लोकेशन शेयरिंग के साक्ष्य मौजूद हैं, जो आरोपियों की संलिप्तता को पुख्ता करते हैं।

गिरफ्तारी के दौरान आरोपियों के कब्जे से बरामद हुए 24 पर्चों ने सुरक्षा बलों के होश उड़ा दिए हैं। इन पर्चों पर एक तरफ हिंदी और दूसरी तरफ उर्दू में बेहद भड़काऊ बातें लिखी गई थीं। पर्चों पर लिखा था कि, वे अपने मकसद से पीछे हटने वाले नहीं हैं और यह केवल एक शुरुआत है, जिसके बाद और भी बड़े कदम उठाए जाएंगे। साजिश के तहत, किसी भी वारदात को अंजाम देने के बाद इन पर्चों को घटनास्थल पर फेंकना था, ताकि हमले के पीछे की विचारधारा और संगठन का प्रचार किया जा सके और एक विशेष प्रकार का सांप्रदायिक तनाव पैदा हो।

पाकिस्तानी हैंडलर दे रहा था निर्देश 

यह तरीका बताता है कि, आरोपी केवल हमला करने के लिए नहीं, बल्कि समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की मंशा से काम कर रहे थे। जांच में यह भी पाया गया कि, ये चारों संदिग्ध व्हाट्सएप पर मुस्लिम आर्मी नाम के एक संदिग्ध ग्रुप से जुड़े हुए थे। इस ग्रुप में न केवल स्थानीय स्तर के कट्टरपंथी युवा शामिल थे, बल्कि कई पाकिस्तानी हैंडलर्स भी सक्रिय थे जो लगातार इन्हें निर्देश दे रहे थे। इस ग्रुप के जरिए ही उन्हें बताया जाता था कि किस तरह की लोकेशन चुननी है और सुरक्षा घेरे से कैसे बचना है।

आरोपियों को इंटरनेट कॉलिंग और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप्स के इस्तेमाल की ट्रेनिंग भी दी गई थी। विकास और लोकेश जैसे युवाओं का इस नेटवर्क में शामिल होना इस बात की ओर इशारा करता है कि आतंकी संगठन अब धर्म की दीवारों को तोड़कर उन लोगों को भी निशाना बना रहे हैं, जो पैसों के लालच या किसी अन्य वजह से उनके जाल में फंस सकें।

यूपी एटीएस और केंद्रीय एजेंसियां अब इस मामले में यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि, इस नेटवर्क के तार और कहां-कहां जुड़े हैं। गाजियाबाद और अलीगढ़ के अलावा क्या उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों में भी इसी तरह के स्लीपर सेल सक्रिय हैं, इसकी गहनता से जांच की जा रही है। आरोपियों के मोबाइल से मिले डिलीटेड डेटा को रिकवर करने के लिए फॉरेंसिक लैब भेजा गया है।

बढ़ाई गई सुरक्षा

फिलहाल, सुरक्षा एजेंसियों ने गाजियाबाद के उन तमाम ठिकानों की सुरक्षा बढ़ा दी है जिनकी रेकी की गई थी। इस खुलासे ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि डिजिटल दुनिया के खतरों से निपटने के लिए अब और भी सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि सीमा पार बैठा दुश्मन अब मोबाइल की स्क्रीन के जरिए हमारे घरों और शहरों की जासूसी कर रहा है। लखनऊ से दिल्ली तक की सुरक्षा एजेंसियां अब इस डिजिटल टेरर मॉड्यूल को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने की तैयारी में हैं।

 

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