मैं हिंसा की अपेक्षा कायरता को कभी नहीं चुनूँगा – महात्मा गाँधी

अहिंसा और कायरता — एक महीन रेखा, एक बड़ा अंतर

महात्मा गांधी ने एक बार कहा था — “मैं हिंसा की अपेक्षा कायरता को कभी नहीं चुनूँगा। यदि मुझे केवल इन्हीं दो विकल्पों में से एक चुनना हो, तो मैं हिंसा को प्राथमिकता दूँगा।”  यह वाक्य उन लोगों के लिए एक करारा जवाब है जो अहिंसा को कमज़ोरी का पर्याय समझते हैं। आज जब हम अहिंसा की बात करते हैं, तो अक्सर यह भ्रम उत्पन्न होता है कि जो व्यक्ति हाथ नहीं उठाता, वह डरपोक है। जो चुप रहता है, वह हारा हुआ है। लेकिन यह सोच न केवल अधूरी है, बल्कि खतरनाक भी है।

अहिंसा और कायरता — ये दो शब्द देखने में एक जैसे लग सकते हैं, क्योंकि दोनों में कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से हिंसा नहीं करता। लेकिन इनके अंतःकरण में जमीन-आसमान का अंतर है। कायरता भय से जन्म लेती है। वह डर जो व्यक्ति को सच बोलने से रोकता है, अन्याय के सामने खड़े होने से रोकता है, और जिम्मेदारी उठाने से भगाता है। दूसरी ओर, अहिंसा साहस से उत्पन्न होती है, वह साहस जो व्यक्ति को कहता है कि मैं प्रतिशोध ले सकता हूँ, लेकिन मैं नहीं लूँगा, क्योंकि मेरे पास एक उच्चतर उद्देश्य है।

शक्ति का त्याग बनाम शक्ति का अभाव

यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है, क्या आपने हिंसा न करने का चुनाव इसलिए किया क्योंकि आप सक्षम नहीं थे, या इसलिए कि आप सक्षम होते हुए भी संयम रखा? पहली स्थिति कायरता है, दूसरी अहिंसा।

एक सैनिक जो युद्ध के मैदान में डर के कारण हथियार नहीं उठाता, वह कायर है। लेकिन एक योद्धा जो युद्ध जीतने की क्षमता रखते हुए भी शांति का रास्ता चुनता है, वह अहिंसक है। भगवद्गीता में अर्जुन का प्रसंग इसी द्वंद्व को उजागर करता है। अर्जुन ने जब हथियार रखे, तो वह क्षण कायरता का था, वह भय और मोह से उपजा निर्णय था। श्रीकृष्ण ने उसे यही समझाया कि कर्तव्य से विमुख होना, अपनी जिम्मेदारी से भागना, यह अहिंसा नहीं, यह पलायन है।

Gandhi Ji

गांधी का अहिंसा-दर्शन: एक क्रांतिकारी विचार

महात्मा गांधी ने अहिंसा को एक राजनीतिक और नैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उनकी अहिंसा में असाधारण साहस था। लाठियाँ खाना, जेल जाना, भूख हड़ताल करना, यह सब कायरता के लक्षण नहीं थे। वे जानते थे कि उनके सामने एक विशाल साम्राज्य है, लेकिन उन्होंने भय के बजाय नैतिक बल का सहारा लिया। उन्होंने दुनिया को दिखाया कि निहत्थे इंसान की आत्मशक्ति सबसे बड़ी ताकत होती है।

गांधी का यह दर्शन इसीलिए क्रांतिकारी था क्योंकि उसमें कायरता के लिए कोई जगह नहीं थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जो व्यक्ति भय के कारण अहिंसा का पालन करता है, वह वास्तव में अहिंसक नहीं है। अहिंसा का सही अर्थ है कि सब कुछ जानते-समझते हुए, सक्षम होते हुए, शांति को चुनना।

आज के संदर्भ में: क्या हम अहिंसक हैं या कायर?

आज की दुनिया में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है। जब कोई दफ्तर में अन्याय देखकर चुप रह जाता है, क्या वह अहिंसक है? जब कोई सड़क पर किसी कमज़ोर को पीटते देखकर मुँह फेर लेता है, क्या वह शांतिप्रिय है? जब एक पत्रकार सत्ता के डर से सच नहीं लिखता, क्या वह अहिंसावादी है? नहीं! यह सब कायरता है — भय से उपजी चुप्पी, जिसे हम सुविधा के लिए “शांति” का नाम दे देते हैं।

असली अहिंसा वह है जो अन्याय के सामने खड़ी होती है, बिना हथियार उठाए, लेकिन बिना झुके भी। वह बोलती है, लिखती है, विरोध करती है लेकिन घृणा और हिंसा का सहारा नहीं लेती।

अहिंसा और कायरता के बीच की रेखा महीन ज़रूर है, लेकिन धुंधली नहीं। एक में शक्ति है, दूसरे में शक्तिहीनता। एक में चेतना है, दूसरे में पलायन। एक में नैतिक साहस है, दूसरे में मोह और भय की दासता।

हमें यह समझना होगा कि अहिंसा कोई निष्क्रियता नहीं है — यह एक सक्रिय, सचेत और साहसिक जीवन-दर्शन है। जो व्यक्ति सही मायनों में अहिंसक है, वह संसार का सबसे निडर प्राणी होता है, क्योंकि उसने हिंसा का रास्ता जानते हुए भी उसे अस्वीकार किया है।

कायरता हमें अंधेरे में रखती है। अहिंसा हमें रोशनी की ओर ले जाती है — लेकिन उस रोशनी तक पहुँचने के लिए पहले अंधेरे से लड़ने का साहस चाहिए।

— सम्पादकीय  / ओम तिवारी

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