
इस्लामाबाद। दक्षिण एशिया की राजनीति और वैश्विक कूटनीति के केंद्र में इस वक्त पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद है, क्योंकि यही वह स्थान है, जहां से मिडिल ईस्ट में शांति का रास्ता निकालने का प्रयास किया जा रहा है। अटकलें लगाई जा रही है कि, इस्लामाबाद के बंद कमरों में दो धुर विरोधी देश अमेरिका और ईरान एक बार फिर बातचीत की मेज पर आ रहे हैं। हालांकि, बाहरी तौर पर तेहरान ने किसी भी तरह की सीधी बातचीत से इनकार कर दिया है, लेकिन राजनयिक गलियारों में चर्चा है कि ये एक गुप्त वार्ता है। ऐसे में दुनिया की नजरें एक बार फिर से इन वार्ता पर टिक गई हैं।
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इस्लामाबाद पहुंचे अराघची
अलजजीरा और क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची की इस्लामाबाद यात्रा महज एक औपचारिक दौरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे ट्रैक-2 कूटनीति की एक गहरी बिसात बिछी हुई है। पाकिस्तान इस वार्ता में एक मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि कूटनीति की सफलता पर अभी भी प्रश्नचिह्न लगा हुआ है।

इस्लामाबाद में चल रही इस कथित सीक्रेट मीटिंग को लेकर सबसे दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही देश अमेरिका और ईरान इसे लेकर सार्वजनिक तौर पर मौन साधे हुए हैं। ऐतिहासिक रूप से देखें तो अमेरिका और ईरान के बीच कभी भी प्रत्यक्ष वार्ता की सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई है, सिवाय कुछ दुर्लभ और अभूतपूर्व मामलों को छोड़कर।
क्या हल हो पाएंगे जटिल मुद्दे
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची का पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर से मिलना इस बात का संकेत है कि बातचीत केवल नागरिक कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सुरक्षा और सैन्य प्रतिष्ठान भी शामिल हैं। तेहरान के सूत्रों का हवाला देते हुए बताया गया है कि, अमेरिका के साथ बैक-चैनल संपर्क केवल इस्लामाबाद में ही नहीं, बल्कि मॉस्को और ओमान जैसे अन्य स्थानों पर भी सक्रिय रहे हैं।
अब बड़ा सवाल यह नहीं रह गया है कि बातचीत हो रही है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या दोनों पक्ष कूटनीति के जरिए उन पांच-छह जटिल मुद्दों को सुलझा पाएंगे, जिन्होंने दशकों से उन्हें युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर रखा है? अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी समझौते की राह में कम से कम पांच ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें सुलझाना लोहे के चने चबाने जैसा है।
बातचीत का पहला और महत्वपूर्ण मुद्दा है ईरान का परमाणु कार्यक्रम। अमेरिका चाहता है कि ईरान परमाणु बम निर्माण की दिशा में अपनी गतिविधियों को पूरी तरह बंद करे, जबकि ईरान अपने अधिकार और संप्रभुता की दुहाई देता है। दूसरा बड़ा पेंच संवर्द्धित यूरेनियम को लेकर है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के पास लगभग 450 किलो उच्च संवर्द्धित यूरेनियम का भंडार है, जिसे अमेरिका एक बड़े खतरे के रूप में देखता है। इसके अलावा, ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों की रेंज भी वॉशिंगटन के लिए चिंता का सबब बनी हुई है।
सख्त है अमेरिका का रवैया
ईरान अपनी मिसाइल क्षमता को अपनी सुरक्षा के लिए अनिवार्य मानता है, जबकि अमेरिका इसे इजरायल और खाड़ी देशों के लिए सीधा खतरा बताता है। ईरान के लिए बातचीत की मेज पर बैठने का सबसे बड़ा मकसद उन आर्थिक प्रतिबंधों से राहत पाना है, जिन्होंने उसकी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है।
ईरान न केवल प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहा है, बल्कि वह उन प्रतिबंधों से हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई भी चाहता है। हालांकि, कूटनीति की इस प्रक्रिया के बीच भी अमेरिका का रवैया सख्त बना हुआ है। हाल ही में अमेरिकी वित्त विभाग ने ईरान पर नए प्रतिबंध लगाए हैं, जिसने कूटनीतिक माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है।
सैन्य तनाव से प्रभावित हो रही अर्थव्यवस्था
सबसे ताजा और गंभीर मोड़ ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को लेकर आया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने वार्ता के दूसरे दौर को शुरू करने के लिए एक कड़ी शर्त रखी है। तेहरान का कहना है कि, जब तक अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य से अपनी नाकेबंदी नहीं हटाता, तब तक वह अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से आमने-सामने की बात नहीं करेगा। होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक तेल व्यापार की जीवन रेखा है और यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

खबर है कि, इस्लामाबाद में चल रही इस कूटनीतिक गहमागहमी के बीच पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दो खास दूत जेयर्ड कुशनर और स्टीव विटकॉफ भी इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं। ये दोनों पहले भी ईरान के साथ वार्ता के प्रयासों का हिस्सा रहे हैं, लेकिन उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि, क्या वही चेहरे फिर से कुछ नया और रचनात्मक मेज पर ला पाएंगे?
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी तरह के दबाव में आकर या फोटोजेनिक कूटनीति के लिए बातचीत नहीं करेंगे। ईरान का कहना है कि, जब तक अमेरिका अपने व्यवहार में ठोस बदलाव नहीं लाता, तब तक आमने-सामने की वार्ता की उम्मीदें धूमिल हैं।
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