ईरान को ट्रंप का अल्टीमेटम, समझौते की मेज पर न आया, तो तबाह हो जाएगी अर्थव्यवस्था

वॉशिंगटन।  दुनिया की नजरें एक बार फिर मिडिल ईस्ट और दक्षिण एशिया के कूटनीतिक गलियारों पर टिक गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अपने तेवर कड़े करते हुए एक ऐसी चेतावनी दी है, जिसने न केवल तेहरान बल्कि वैश्विक तेल बाजार में भी हड़कंप मचा दिया है।

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72 घंटे में फट जाएंगी पाइप लाइनें

रविवार, 26 अप्रैल को एक इंटरव्यू में ट्रंप ने ईरान को स्पष्ट शब्दों में 72 घंटे यानी तीन का समय दिया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि, यदि ईरान युद्ध और तनाव को समाप्त करने के लिए समझौते की मेज पर नहीं आता है, तो उसकी सभी अहम तेल पाइपलाइनें फट जाएंगी।

Iran Vs USA

उन्होंने ये भी कहा कि, ऐसा तकनीकी और प्राकृतिक कारणों से होगा, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ टूट सकती है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची पाकिस्तान और रूस के बीच एक मैराथन कूटनीतिक मिशन पर हैं, जिससे यह साफ झलकता है कि, पर्दे के पीछे कुछ बड़ा पक रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप की इस धमकी के पीछे का तर्क केवल सैन्य नहीं, बल्कि काफी हद तक तकनीकी और भू-वैज्ञानिक भी है। ट्रंप ने साक्षात्कार के दौरान विस्तार से समझाया कि ईरान वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और नाकाबंदी के कारण अपने कच्चे तेल का निर्यात करने में असमर्थ है। उनके अनुसार, जब तेल का निर्यात रुक जाता है और उसे जहाजों या कंटेनरों में नहीं भरा जा सकता, तो पाइपलाइनों के भीतर भारी दबाव और यांत्रिक विकृति पैदा होती है।

इस्लामाबाद पहुंचे ईरानी विदेश मंत्री

ट्रंप ने दावा किया कि, यदि ये पाइपलाइनें तीन दिनों के भीतर चालू नहीं की गईं या समझौता नहीं हुआ, तो वे अंदर से फट जाएंगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह केवल मानवीय हमला नहीं होगा, बल्कि दबाव के कारण जमीन के अंदर होने वाली एक प्राकृतिक और यांत्रिक विफलता होगी। सबसे चौंकाने वाली बात जो ट्रंप ने कही, वह यह थी कि एक बार ये पाइपलाइनें क्षतिग्रस्त हो गईं, तो ईरान उन्हें कभी भी उनकी पुरानी क्षमता पर बहाल नहीं कर पाएगा।

ट्रंप के मुताबिक, मरम्मत के बाद भी ये पाइपलाइनें अपनी मूल उत्पादन क्षमता के महज 50 प्रतिशत पर ही काम कर सकेंगी, जो ईरान के आर्थिक भविष्य के लिए एक घातक प्रहार होगा। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच, कूटनीतिक मोर्चे पर ईरान की सक्रियता भी चरम पर है।

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ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची का रविवार को एक बार फिर इस्लामाबाद पहुंचना कई महत्वपूर्ण संकेत दे रहा है। यह पिछले तीन दिनों में उनका दूसरा पाकिस्तान दौरा है। इससे पहले वह शुक्रवार की रात को इस्लामाबाद पहुंचे थे, जहां उन्होंने शनिवार को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर के साथ लंबी चर्चा की थी।

पाकिस्तान से ओमान जाने के तुरंत बाद उनका दोबारा लौटकर आना और फिर से सेना प्रमुख असीम मुनीर से मुलाकात करना यह दर्शाता है कि, पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच एक बैक-चैनल दूत की भूमिका निभा रहा है। अराघची ने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को कुछ बेहद अहम मुद्दों पर लिखित संदेश भेजे हैं, जिसकी पुष्टि ईरान की फार्स न्यूज एजेंसी ने भी की है। यह संदेश ऐसे समय में भेजे गए हैं जब ट्रंप ने अपने स्वयं के वार्ताकारों को पाकिस्तान जाने से रोक दिया है, जिससे सीधी बातचीत में एक अस्थायी गतिरोध पैदा हो गया था।

ईरान के पाले में डाली गेंद

ट्रंप ने हालांकि बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं किए हैं। अपने चिर-परिचित अंदाज में उन्होंने गेंद ईरान के पाले में डालते हुए कहा कि यदि वे युद्ध और विनाश से बचना चाहते हैं, तो वे सीधे अमेरिका से संपर्क कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि, फोन मौजूद हैं और हमारे पास सुरक्षित लाइनें हैं। ट्रंप का यह बयान एक तरफ कड़ा अल्टीमेटम है, तो दूसरी तरफ समझौते की एक बारीक खिड़की भी है।

राष्ट्रपति का मानना है कि, ईरान के पास अब समय बहुत कम बचा है और उसकी अर्थव्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां से वापसी मुमकिन नहीं होगी। अमेरिकी प्रशासन की रणनीति स्पष्ट नजर आ रही है। ईरान पर इतना अधिक दबाव बनाना कि, वह अपनी शर्तों के बजाय वाशिंगटन की शर्तों पर झुकने को मजबूर हो जाए।

दूसरी ओर, ईरान केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं है। अब्बास अराघची सोमवार को मॉस्को में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिलने के लिए रवाना होने वाले हैं। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने इस उच्च-स्तरीय यात्रा की पुष्टि कर दी है। पुतिन और अराघची की यह मुलाकात वैश्विक राजनीति के समीकरणों को बदल सकती है।

रूस से सहयोग की उम्मीद

रूस, जो खुद पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, ईरान के लिए एक महत्वपूर्ण ढाल बन सकता है, लेकिन ट्रंप की सीधी चेतावनी और पाइपलाइनों के तकनीकी रूप से ठप होने के खतरे ने तेहरान को रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है। अराघची का रूस दौरा इस बात का प्रयास माना जा रहा है कि, यदि अमेरिका के साथ बातचीत विफल रहती है, तो क्या मॉस्को और बीजिंग जैसे सहयोगी ईरान को इस बड़े संकट से उबारने में मदद कर सकते हैं।

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पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प और नाजुक बनी हुई है। एक तरफ पाकिस्तान के अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी तरफ ईरान उसका पड़ोसी देश है। अराघची का बार-बार इस्लामाबाद आना और सेना प्रमुख असीम मुनीर से मिलना यह संकेत देता है कि सुरक्षा और सैन्य स्तर पर कोई बड़ी रणनीति तैयार की जा रही है।

जानकार मानते हैं कि, ईरान चाहता है कि पाकिस्तान अपनी मध्यस्थता का उपयोग कर ट्रंप प्रशासन को इस बात के लिए राजी करे कि वह तेल निर्यात पर लगी नाकाबंदी में कुछ ढील दे, ताकि पाइपलाइनों को फटने से बचाया जा सके, लेकिन ट्रंप के तीन दिन वाले अल्टीमेटम ने समय की कमी को एक बड़ा हथियार बना दिया है।

क्या झुकेगा ईरान?

फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें अब उन सुरक्षित लाइनों पर टिकी हैं जिनका जिक्र ट्रंप ने किया है। क्या ईरान झुककर फोन उठाएगा, या वह अपनी तेल पाइपलाइनों और आर्थिक भविष्य को दांव पर लगाकर संघर्ष का रास्ता चुनेगा? अगले 72 घंटे न केवल ईरान के लिए, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति और मध्य पूर्व की शांति के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं।

अगर ट्रंप की भविष्यवाणी सच साबित होती है और पाइपलाइनें वास्तव में यांत्रिक रूप से विफल हो जाती हैं, तो यह आधुनिक युग में बिना एक भी गोली चलाए किसी देश की अर्थव्यवस्था को तबाह करने का एक नया उदाहरण होगा। वहीं, अराघची की मॉस्को यात्रा यह तय करेगी कि क्या रूस इस विवाद में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करने का साहस दिखाएगा या वह भी ईरान को समझौते की सलाह देगा। कूटनीति के इस शतरंज में शह और मात का खेल अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है।

 

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