
तेहरान। मिडिल ईस्ट इन दिनों भीषण युद्ध की आग से धधक रहा है। अभी तक उम्मीद जताई जा रही थी कि, जल्द ही युद्ध शांत होगा और शांति का माहौल बनेगा, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि, युद्ध अभी और लंबा खिंचेगा। दरअसल, ईरान ने अमेरिका के साथ सीधे संवाद की किसी भी संभावना को सिरे से खारिज कर दिया है और मध्यस्थों द्वारा रखे गए तमाम प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया है। और तो और ईरान ने इसे अपमानजनक करार दिया है।
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पाक की कोशिशों पर फिरा पानी
‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में होने वाली बहुप्रतीक्षित शांति वार्ता अब पूरी तरह से खटाई में पड़ गई है। ईरान ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि, वह अमेरिकी शर्तों पर किसी भी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं है, जिससे यह अंदेशा गहरा गया है कि, इस क्षेत्र में जारी संघर्ष अब और भी विनाशकारी मोड़ ले सकता है।

ईरान का यह सख्त रुख ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिकी प्रशासन और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सीजफायर की कोशिशों में जुटे होने का दावा कर रहे थे। तेहरान ने न केवल अमेरिकी अधिकारियों से मिलने से साफ मना कर दिया है, बल्कि अमेरिका द्वारा मध्यस्थों के जरिए भेजे गए 15 सूत्रीय मांग पत्र को अवास्तविक, तर्कहीन और बेकार बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है। इस चौंकाने वाले घटनाक्रम ने पाकिस्तान और अन्य क्षेत्रीय देशों की उन तमाम कूटनीतिक कोशिशों पर पानी फेर दिया है, जो युद्ध की विभीषिका को रोकने के लिए पिछले कई हफ्तों से पर्दे के पीछे सक्रिय थे।
बीते कुछ समय से पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच एक मजबूत कूटनीतिक सेतु की भूमिका निभाने की पुरजोर कोशिश कर रहा था। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने सार्वजनिक रूप से और बड़े गर्व के साथ यह घोषणा की थी कि, इस्लामाबाद इस ऐतिहासिक वार्ता की मेजबानी करने के लिए पूरी तरह तैयार है और इसे अपने लिए एक महान सम्मान मानता है।
ईरान के आत्मसम्मान के खिलाफ हैं शर्तें
पाकिस्तान की रणनीतिक योजना थी कि, दोनों कट्टर दुश्मन देशों के उच्चाधिकारियों को एक मेज पर लाया जाए, ताकि सीजफायर की तकनीकी शर्तों पर कोई ठोस और सर्वमान्य आम सहमति बनाई जा सके। हालांकि, ईरान के ताजा और कड़े बयान ने पाकिस्तान की इन तमाम वैश्विक उम्मीदों को धराशायी कर दिया है। ईरान ने आधिकारिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों को यह सूचित कर दिया है कि वह आगामी दिनों में इस्लामाबाद की धरती पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ बैठने या हाथ मिलाने के लिए कतई तैयार नहीं है।
ईरान के विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, जब तक अमेरिका अपनी अत्यधिक, अनुचित और विस्तारवादी मांगों को वापस नहीं लेता, तब तक किसी भी स्तर की बातचीत का कोई नैतिक या राजनीतिक औचित्य नहीं रह जाता है। ईरान का स्पष्ट मानना है कि वार्ता की आड़ में अमेरिका उन पर ऐसी शर्तें थोपना चाहता है जो एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में उनकी स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के खिलाफ हैं।
विश्वस्त राजनयिक सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने क्षेत्रीय मध्यस्थों के जरिए ईरान को एक 15 सूत्रीय गोपनीय मसौदा भेजा था, जिसे शांति की पहली सीढ़ी बताया गया था। इस प्रस्ताव में सीजफायर के बदले ईरान के सामने कुछ ऐसी शर्तें रखी गई थीं, जिन्हें ईरान ने अपनी रेड लाइन पार करना माना है।
इन शर्तों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर तत्काल और पूर्ण अंतरराष्ट्रीय लगाम, लेबनान, यमन और गाजा जैसे क्षेत्रों में सक्रिय अपने सहयोगी समूहों को सैन्य और वित्तीय समर्थन पूरी तरह बंद करना और बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षणों पर अनिश्चितकालीन रोक लगाना शामिल था।
दवाब में नहीं होगा समझौता
ईरान के आधिकारिक प्रवक्ता एस्माइल बाघई ने इस प्रस्ताव पर बेहद तीखी और हमलावर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, ये मांगें पूरी तरह से अवास्तविक और एकतरफा हैं। उन्होंने वाशिंगटन की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि अमेरिका एक तरफ तो सार्वजनिक मंचों पर शांति और स्थिरता की मीठी बातें करता है और दूसरी तरफ पर्दे के पीछे से ऐसी शर्तें थोपता है जिन्हें पूरा करना किसी भी आत्मसम्मान वाले राष्ट्र के लिए मुमकिन नहीं है।
ईरान का तर्क है कि, इस समूचे तनाव की शुरुआत अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के उकसावे के कारण हुई है, इसलिए शांति के लिए पीछे हटने की पहली जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए। तेहरान ने साफ कर दिया है कि, वे अपनी राष्ट्रीय रक्षा क्षमताओं और दशकों पुरानी क्षेत्रीय नीतियों पर किसी भी विदेशी या साम्राज्यवादी दबाव में आकर कोई समझौता नहीं करेंगे।
दूसरी ओर, अमेरिकी राजनीति के केंद्र वाशिंगटन से विरोधाभासी संकेत मिल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में मीडिया के सामने यह संकेत दिए थे कि, पर्दे के पीछे चल रही बातचीत में बेहद सकारात्मक और अच्छी प्रगति हो रही है। ट्रंप प्रशासन को यह अटूट विश्वास था कि, ईरान पर लगाए गए कमरतोड़ आर्थिक प्रतिबंधों और चौतरफा कूटनीतिक दबाव के जरिए उसे बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया जा सकता है, लेकिन ईरान के सार्वजनिक और दो टूक इनकार ने अमेरिकी कूटनीति की सीमाओं और उसकी कमजोरी को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया है।
अमेरिका और दबाव बनाने की रणनीति
वाशिंगटन स्थित अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि, ईरान का यह अड़ियल रुख उसकी सोची-समझी वेट एंड वॉच रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है। तेहरान शायद यह संदेश देना चाहता है कि वह आर्थिक बदहाली के बावजूद दबाव में झुकने वाला नहीं है और अमेरिका को और अधिक बड़ी रियायतें देने के लिए मजबूर करना चाहता है। अमेरिका के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बिना किसी सीधे संवाद के वह इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ती सैन्य गतिविधियों और इजरायल-ईरान के बीच संभावित सीधी भिड़ंत को कैसे नियंत्रित करे।

ईरान और अमेरिका के बीच संवाद के दरवाजे पूरी तरह बंद होने का सीधा और घातक असर लेबनान की पहाड़ियों, गाजा की गलियों और यमन के तटों पर पड़ेगा। यदि ये दो बड़ी शक्तियां किसी न्यूनतम समझौते पर भी नहीं पहुंचती हैं, तो इन संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में सक्रिय लड़ाकों को मिलने वाला समर्थन और अधिक आक्रामक हो जाएगा। इससे न केवल इजरायल और ईरान के बीच सीधे मिसाइल युद्ध की आशंका बढ़ जाएगी, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्ग भी खतरे में पड़ जाएंगे।
पीछे हटने को तैयार नहीं ईरान
ईरान के प्रवक्ता ने चेतावनी भरे और सख्त लहजे में कहा है कि युद्ध का अंत होना पूरी मानवता के हित में है, लेकिन दुनिया को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि इस आग की पहली चिंगारी किसने सुलझाई थी। यह बयान सीधे तौर पर अमेरिका की पिछले कई दशकों की मध्य-पूर्व नीति पर एक करारा हमला था। ईरान अब चीन और रूस जैसे देशों के साथ मिलकर एक नया भू-राजनीतिक मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहा है, जो मध्य-पूर्व में अमेरिकी प्रभुत्व को सीधे तौर पर चुनौती दे सके।
ईरान द्वारा अमेरिका की शर्तों को सिरे से खारिज करना यह दर्शाता है कि, पश्चिम एशिया में वर्चस्व और अस्तित्व की लड़ाई अब एक निर्णायक और खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है। अमेरिका जहां अपनी मैक्सिमम प्रेशर यानी अधिकतम दबाव की नीति को अपनी सफलता मान रहा है, वहीं ईरान अपनी प्रतिरोध की नीति को अपना धर्म मानकर पीछे हटने को तैयार नहीं है। दोनों पक्षों के बीच संवाद की भारी कमी और अविश्वास की गहरी खाई के कारण आने वाले दिन न केवल इस क्षेत्र के लिए, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद तनावपूर्ण और अनिश्चित हो सकते हैं।
यदि जल्द ही कोई निष्पक्ष मध्यस्थ या कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला गया, तो यह छिटपुट रॉकेट और ड्रोन हमलों का सिलसिला एक व्यापक और विनाशकारी क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील हो सकता है। पाकिस्तान का प्रस्ताव टलने के बाद अब कतर या ओमान जैसे देशों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, लेकिन फिलहाल के हालातों को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि कूटनीति की मेज अब सूनी पड़ चुकी है और भविष्य के फैसले अब युद्ध के मैदान की गर्जना से ही तय होंगे।
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