
तेहरान। बीते कुछ दिनों से ऐसा लग रहा था कि, दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर आकर खड़ी हो गई है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अंतिम क्षणों में एक ऐसा फैसला लिया जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों को भी चौंका दिया है। बुधवार की उस समयसीमा से महज कुछ घंटे पहले, जब ईरान पर भीषण बमबारी की आशंका जताई जा रही थी, राष्ट्रपति ट्रंप ने संघर्ष को अनिश्चित समय के लिए रोकने यानी इंडेफिनिट सीजफायर पर अपनी सहमति दे दी।
इसे भी पढ़ें- मिडिल ईस्ट संघर्ष: तेहरान ने ठुकराया ट्रंप का ऑफर, अब और विनाशकारी मोड़ ले सकता है युद्ध
पाकिस्तान को दिया क्रेडिट
ट्रंप का यह फैसला उस समय आया है जब उन्होंने खुद कुछ घंटों पहले एक साक्षात्कार में बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा था कि, अमेरिकी सेना ईरान पर हमले के लिए पूरी तरह तैयार है और उन्हें उम्मीद है कि अमेरिका वहां बमबारी करेगा। उन्होंने ईरान के बुनियादी ढांचे, जिसमें पुल और बिजली संयंत्र शामिल थे, को नेस्तनाबूद करने की अपनी पुरानी धमकी भी दोहराई थी, लेकिन अचानक बदले इस घटनाक्रम ने युद्ध के बादलों को फिलहाल के लिए छांट दिया है।

ट्रंप ने अपने इस चौंकाने वाले फैसले के पीछे पाकिस्तान सरकार के अनुरोध का हवाला दिया है। यह अपने आप में एक बड़ा कूटनीतिक मोड़ है कि दक्षिण एशियाई देश पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका में उभरकर सामने आया है। हालांकि, पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही इशारा करती है।
ट्रंप की इस घोषणा से यह स्पष्ट होता है कि, वह अब ईरान के साथ उस पैमाने पर युद्ध शुरू नहीं करना चाहते जिसकी वह लंबे समय से धमकी दे रहे थे। उनके इस फैसले में अमेरिकी घरेलू राजनीति और वैश्विक तेल बाजार की कीमतों का गणित भी छिपा हुआ है। अगर अमेरिका इस समय ईरान पर सीधा हमला करता, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगतीं, जिसका सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और ट्रंप की अपनी लोकप्रियता पर पड़ता।
संशय में अमेरिका
ट्रंप की हालिया सोशल मीडिया पोस्ट्स और उनके बयानों का यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो यह साफ झलकता है कि, अमेरिकी प्रशासन इस समय ईरान के भीतर चल रही राजनीतिक उथल-पुथल को लेकर संशय में है। ट्रंप ने बार-बार इस बात का जिक्र किया है कि ईरान का नेतृत्व इस समय काफी कमजोर हो चुका है और वहां निर्णय लेने की प्रक्रिया में भारी अफरातफरी मची हुई है।
वॉशिंगटन को फिलहाल यह समझ नहीं आ रहा है कि, तेहरान में असल फैसले कौन ले रहा है और बातचीत की मेज पर किस प्रस्ताव को ठोस माना जाए। यही कारण है कि, ट्रंप ने इस युद्धविराम के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की है। बिना किसी डेडलाइन के युद्धविराम घोषित करना ट्रंप की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जो उन्हें भविष्य में बातचीत या हमले के लिए पर्याप्त लचीलापन प्रदान करती है।
हालांकि, शांति की यह राह इतनी भी आसान नहीं है, जितनी कागजों पर नजर आती है। भले ही हवाई हमलों को रोक दिया गया हो, लेकिन ईरान के बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसेना की सख्त नाकेबंदी अभी भी जारी है। ईरान इस नाकेबंदी को सीधे तौर पर युद्ध की कार्रवाई मानता है। तेहरान का तर्क है कि, जब तक उसके व्यापारिक मार्ग बंद हैं, तब तक किसी भी सार्थक बातचीत की गुंजाइश नहीं है।
होर्मुज पर बढ़ सकता है संघर्ष
ऐसे में यह आशंका बनी हुई है कि, ईरान दबाव में झुकने के बजाय तनाव को और बढ़ा सकता है। वह पर्शियन गल्फ और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग, होर्मुज़ स्ट्रेट में छोटी-मोटी सैन्य कार्रवाई या जहाजों को रोकने जैसा संघर्ष छेड़ सकता है। ट्रंप ने इस युद्धविराम के जरिए खुद के लिए समय तो निकाल लिया है, लेकिन उन्होंने इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं ढूंढा है।
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें 8 अप्रैल को हुए उस दो हफ़्ते के सशर्त युद्धविराम में छिपी हैं, जिसकी मियाद बुधवार को खत्म हो रही थी। उस समझौते की मुख्य शर्त यह थी कि, ईरान होर्मुज़ स्ट्रेट को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए फिर से खोलेगा। ईरान ने अपनी सेना की निगरानी में दो हफ़्तों के लिए वहां से जहाजों को गुजरने की अनुमति भी दी थी। इस बीच कूटनीतिक कोशिशें भी तेज हुईं, जिसके तहत अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान भी गए, लेकिन पाकिस्तान में हुई वह बातचीत किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी और वेंस को खाली हाथ वॉशिंगटन लौटना पड़ा।
आर्थिक दवाब में ईरान
बातचीत विफल होने के तुरंत बाद अमेरिका ने न केवल नौसैनिक नाकेबंदी कड़ी कर दी, बल्कि विदेशी बैंकों पर सेकेंडरी प्रतिबंधों की चेतावनी देकर ईरान पर आर्थिक दबाव को चरम पर पहुंचा दिया। मध्य पूर्व के इस संकट का दूसरा मोर्चा इजराइल और लेबनान की सीमा पर खुला हुआ है। 16 अप्रैल को ट्रंप ने इजराइल और लेबनान के बीच 10 दिनों के युद्धविराम की घोषणा की थी, जिसे 1993 के बाद दोनों देशों के बीच हुई पहली सीधी बातचीत के परिणाम के रूप में देखा गया।

ईरान का कहना था कि, लेबनान में शांति स्थापित होने के बाद उसने होर्मुज़ स्ट्रेट को पूरी तरह खोल दिया था, लेकिन अमेरिका द्वारा नाकेबंदी न हटाए जाने के कारण उसने अगले ही दिन इसे फिर से बंद कर दिया। इस त्रिकोणीय संघर्ष में जटिलता यह है कि, लेबनान और इजराइल के बीच हुए समझौते में इजराइल को आत्मरक्षा के नाम पर किसी भी समय हमले का अधिकार दिया गया है, जबकि लेबनान पर यह जिम्मेदारी डाली गई है कि, वह हिज़्बुल्लाह जैसे समूहों को इजराइल पर हमले करने से रोके।
कितने दिन रहेगी शांति?
फिलहाल, दुनिया इस घटनाक्रम को एक बड़ी राहत के तौर पर देख रही है क्योंकि ट्रंप ने तबाही के खतरे से अपने कदम पीछे खींच लिए हैं, लेकिन अमेरिकी प्रशासन के सामने अब भी वही पुराने और जटिल मुद्दे खड़े हैं। अमेरिका चाहता है कि, होर्मुज़ स्ट्रेट स्थायी रूप से खुले और ईरान की यूरेनियम एनरिचमेंट यानी परमाणु क्षमता को पूरी तरह नियंत्रित किया जाए।
भले ही ईरान यह दावा करता रहे कि वह परमाणु बम नहीं बनाना चाहता, लेकिन वॉशिंगटन को यह संदेह है कि, तेहरान भविष्य के लिए परमाणु विकल्प को जीवित रखना चाहता है। ट्रंप ने ईरान को एक एकजुट प्रस्ताव देने के लिए और समय तो दे दिया है, लेकिन यह शांति कितने दिनों तक बनी रहेगी, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले हफ्तों में तेहरान का नेतृत्व क्या रुख अपनाता है। फिलहाल, युद्ध टल गया है, लेकिन तनाव की आग ठंडी नहीं हुई है।
इसे भी पढ़ें- डोनाल्ड ट्रंप का सनसनीखेज बयान, ईरान की परमाणु क्षमता नष्ट, अब समझौते की मेज पर आया तेहरान



