
वॉशिंगटन। मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बार फिर गर्माहट पैदा हो गई है, जिसने न केवल वॉशिंगटन के सत्ता गलियारों में हलचल मचा दी है, बल्कि वैश्विक तेल बाजार और कूटनीतिक हलकों को भी चिंता में डाल दिया है। ईरान ने अमेरिका के सामने एक ऐसा कूटनीतिक प्रस्ताव रखा है, जिसे जानकार दोधारी तलवार मान रहे हैं। तेहरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक जलमार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से सुगम बनाने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए सुरक्षित रखने का वादा किया है, लेकिन इसके बदले में उसने ऐसी शर्तें रख दी हैं, जिन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को धर्मसंकट में डाल दिया है।
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वैश्विक स्तर पर तनाव चरम पर
यह प्रस्ताव एक ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर तनाव चरम पर है और अमेरिका-ईरान के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी किसी बड़े टकराव की ओर बढ़ती दिख रही थी। तेहरान के इस दांव ने ट्रंप की मैक्सिमम प्रेशर यानी अधिकतम दबाव की नीति को सीधी चुनौती दी है।

ईरान के इस नए कूटनीतिक प्रस्ताव की गहराई को समझें, तो यह एक रणनीतिक अदला-बदली का खेल नजर आता है। तेहरान ने स्पष्ट किया है कि, यदि अमेरिका उस पर लगाए गए सभी आर्थिक प्रतिबंधों और नाकाबंदी को तत्काल प्रभाव से वापस ले लेता है, तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और वहां से होने वाले निर्बाध व्यापार की गारंटी देने के लिए तैयार है।
गौरतलब है कि, होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के कुल तेल व्यापार के पांचवें हिस्से का मार्ग है और ईरान अक्सर इसे बंद करने की धमकी देकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को डराता रहा है, लेकिन इस प्रस्ताव में जो सबसे बड़ा पेच फंसा है, वह है ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा को स्थगित करने की मांग। ईरान चाहता है कि, प्रतिबंधों के हटने और व्यापारिक मार्ग खुलने के बदले उसे अपने परमाणु कार्यक्रम पर फिलहाल बातचीत से छूट दी जाए, जो अमेरिका के लिए किसी भी सूरत में स्वीकार्य नजर नहीं आता।
ईरान का रुख सख्त
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने अपने पिछले कार्यकाल से ही ईरान के प्रति बेहद सख्त रुख अपनाया हुआ है, इस नए प्रस्ताव से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं दिख रहे हैं। व्हाइट हाउस के सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि, ट्रंप ने अपने वरिष्ठ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारियों और सामरिक विशेषज्ञों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की है, जिसमें उन्होंने साफ कर दिया है कि, अमेरिका ईरान के शर्तों के जाल में फंसने वाला नहीं है।
ट्रंप का मानना है कि, होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना केवल एक तात्कालिक समाधान हो सकता है, लेकिन असली खतरा ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं हैं। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि, जब तक परमाणु हथियार बनाने की दिशा में ईरान के बढ़ते कदमों पर पूर्ण विराम नहीं लग जाता, तब तक किसी भी अन्य व्यापारिक या सुरक्षा संबंधी समझौते पर आगे बढ़ना संभव नहीं होगा। ट्रंप प्रशासन इसे ईरान की एक चाल मान रहा है, जिसके जरिए वह प्रतिबंधों से राहत पाकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना चाहता है ताकि वह बिना किसी वैश्विक दबाव के अपने परमाणु संवर्धन को जारी रख सके।
तेहरान का प्रस्ताव ख़ारिज
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए तेहरान के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। रुबियो ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि, ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं ही किसी भी बातचीत का केंद्र बिंदु हैं और इसे दरकिनार करके किसी अन्य मुद्दे पर चर्चा करना अर्थहीन है। उन्होंने तर्क दिया कि, अमेरिका केवल होर्मुज की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपने सबसे बड़े सुरक्षा खतरे, यानी परमाणु बम की संभावना को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

रुबियो के अनुसार, यदि अमेरिका प्रतिबंध हटा देता है, तो वह ईरान पर दबाव बनाने वाला अपना सबसे प्रभावी हथियार खो देगा। अमेरिका को डर है कि, एक बार प्रतिबंध हट जाने पर ईरान को मिलने वाला भारी पैसा उसके सैन्य ढांचे और परमाणु बुनियादी ढांचे को और मजबूत करेगा, जिससे भविष्य में उसे नियंत्रित करना नामुमकिन हो जाएगा। वॉशिंगटन में यह आम सहमति बनती दिख रही है कि ईरान केवल समय काटने की रणनीति अपना रहा है। इस पूरे कूटनीतिक घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी महत्वपूर्ण उभरकर सामने आई है।
वॉशिंगटन पहुंचाई शर्तों की फ़ाइल
रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान एक दूत के रूप में ईरान और अमेरिका के बीच संदेशों का आदान-प्रदान कर रहा है। पाकिस्तान के जरिए ही तेहरान ने अपनी शर्तों की फाइल वॉशिंगटन तक पहुंचाई है। हालांकि, कूटनीतिक चैनलों के सक्रिय होने के बावजूद मुख्य मुद्दा यूरेनियम संवर्धन पर जाकर अटक गया है।
अमेरिका की मांग है, कि ईरान को अगले 20 वर्षों के लिए अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से फ्रीज करना होगा और वर्तमान में उसके पास मौजूद लगभग 440 किलोग्राम उच्च संवर्धित यूरेनियम को किसी तीसरे पक्ष या अंतरराष्ट्रीय एजेंसी को सौंपना होगा। ईरान इन शर्तों को अपनी संप्रभुता पर हमला बता रहा है और उसने यूरेनियम सौंपने से साफ इनकार कर दिया है। यह गतिरोध ही वह मुख्य बिंदु है जिसकी वजह से होर्मुज को लेकर दिया गया प्रस्ताव भी अधर में लटकता दिख रहा है।
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