यूएस-ईरान युद्ध: भुखमरी की कगार पर पहुंचे 4.5 करोड़ लोग, वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ने चौंकाया

वॉशिंगटन। दुनिया इस समय एक ऐसे मुहाने पर खड़ी है, जहां बारूद की गंध अब आम आदमी की थाली तक पहुंचने लगी है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के घाव अभी भरे नहीं थे कि ईरान और उसके आसपास बढ़ते युद्ध के तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कनें तेज कर दी हैं। वर्ल्ड बैंक (विश्व बैंक) की हालिया ‘फूड क्राइसिस अलर्ट’ रिपोर्ट ने एक ऐसी डरावनी तस्वीर पेश की है, जिसने पूरी दुनिया को संकट में डाल दिया है।

इसे भी पढ़ें- यूएस-ईरान के बीच सीक्रेट वार्ता, क्या इस बार बनेगी बात या बिगड़े रहेंगे होर्मुज के हालात?

हिल सकती है अर्थव्यवस्था की नींव

रिपोर्ट के मुताबिक, यदि ईरान के आसपास युद्ध की स्थिति और बिगड़ती है, तो दुनिया भर में करीब 4.5 करोड़ लोग भुखमरी और अकाल जैसी स्थिति का सामना करने को मजबूर हो जाएंगे। यह केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि एक ग्लोबल कमोडिटी शॉक के रूप में उभर रहा है, जो विकसित और विकासशील दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं की नींव हिला सकता है।

Iran war

वर्ल्ड बैंक ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि ईरान के पास स्थित स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के सबसे संवेदनशील और व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है। अक्सर लोग इसे केवल कच्चे तेल की सप्लाई लाइन मानते हैं, लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक गंभीर है।

इस संकरे समुद्री रास्ते से न केवल दुनिया का एक-तिहाई तेल गुजरता है, बल्कि अनाज और फर्टिलाइजर (खाद) का भी एक बहुत बड़ा हिस्सा यहीं से होकर विभिन्न देशों तक पहुंचता है। यदि युद्ध के कारण यह रास्ता प्रभावित होता है या ब्लॉक होता है, तो वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा जाएगी। इसका सीधा परिणाम यह होगा कि अनाज की उपलब्धता कम हो जाएगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाने-पीने की चीजों की कीमतें रॉकेट की रफ़्तार से ऊपर भागेंगी, जिससे आम आदमी की पहुंच से रोटी दूर हो जाएगी।

तेल की आग में जलेगी रोटी

विश्व बैंक ने विशेष रूप से एनर्जी-फूड लिंक के खतरनाक चक्र को लेकर दुनिया को आगाह किया है। यह समझना बेहद जरूरी है कि युद्ध की स्थिति में केवल तेल ही महंगा नहीं होता, बल्कि उसका असर सीधे तौर पर खेती की लागत पर पड़ता है। आधुनिक खेती पूरी तरह से ऊर्जा पर निर्भर है। खाद (फर्टिलाइजर) बनाने के लिए प्राकृतिक गैस की आवश्यकता होती है, जबकि फसलों की बुवाई, कटाई और उनकी ढुलाई के लिए डीजल और पेट्रोल की जरूरत पड़ती है।

रिपोर्ट बताती है कि अगर ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो खाद उत्पादन महंगा हो जाएगा और किसानों के लिए खेती करना घाटे का सौदा बन जाएगा। जब उत्पादन लागत बढ़ेगी, तो वैश्विक स्तर पर अनाज की पैदावार में भारी गिरावट आएगी, जो अंततः बड़े पैमाने पर खाद्य असुरक्षा को जन्म देगी।

गरीब देशों पर दोहरी मार 

रिपोर्ट में ये भी लिखा गया है कि, इस संभावित युद्ध का सबसे क्रूर असर उन गरीब और विकासशील देशों पर पड़ेगा जो पहले से ही कर्ज, महंगाई और जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं। अफ्रीकी और एशियाई देशों में जहां आय का एक बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है, वहां कीमतों में मामूली वृद्धि भी लोगों को कुपोषण की ओर धकेल देती है।

Iran war

वर्ल्ड बैंक ने स्पष्ट किया है कि, खाने की कमी और आसमान छूती कीमतें केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं हैं, बल्कि यह गृहयुद्ध और सामाजिक अस्थिरता का भी कारण बन सकती हैं। जब लोगों के पास अपने बच्चों का पेट भरने के लिए भोजन नहीं होगा, तो सड़कों पर हिंसा और विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हो जाएगा, जिससे दुनिया भर में शरणार्थी संकट और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां और भी जटिल हो जाएंगी।

 तीन दशक पीछे चली जाएगी वैश्विक खाद्य सुरक्षा

यह रिपोर्ट केवल चेतावनी नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक वेक-अप कॉल है। वर्ल्ड बैंक का मानना है कि, अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो वैश्विक खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में पिछले तीन दशकों में की गई प्रगति पूरी तरह शून्य हो जाएगी। दुनिया भर में भुखमरी को खत्म करने के लक्ष्य (SDGs) को भारी झटका लगेगा।

वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय समुदाय और वैश्विक ताकतें भारी दबाव में हैं ताकि कूटनीतिक रास्तों से इस तनाव को कम किया जा सके। विशेषज्ञ मानते हैं कि युद्ध सिर्फ सीमाओं पर टैंकों और मिसाइलों से नहीं लड़ा जाता, बल्कि इसकी सबसे भयानक गूंज गरीब की रसोई और खाली थाली में सुनाई देती है। यदि ईरान के आसपास की चिंगारी को समय रहते नहीं बुझाया गया, तो दुनिया को एक ऐसी मानवीय आपदा का सामना करना पड़ेगा जिसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है।

 

इसे भी पढ़ें- यूएस-ईरान युद्ध के बीच भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत, सऊदी अरब ने खोला ‘नया तेल मार्ग’

Related Articles

Back to top button