
यूएई। संयुक्त अरब अमीरात के एक फैसले ने न सिर्फ तेल उत्पादक देशों की नींद उड़ा दी हैं, बल्कि ओपेक और ओपेक प्लस को भी कमजोर कर दिया है। इस फैसले ने पहले से ही मुश्किल में घिरे तेल बाजार में उथल पुथल मचा दी है। मिडिल ईस्ट में छिड़े भीषण युद्ध की वजह से दुनिया पहले से पेट्रोल, डीजल और गैस की किल्लत झेल रही है, ऐसे में यूएई का ये फैसला तेल निर्यात करने और आयत करने वाले देशों पर क्या असर डालेगा आइए समझते हैं, साथ ही ये भी जानते हैं कि क्या है ओपेक और ओपेक प्लस, ये कैसे काम करता है, भारत समेत दुनिया पर इस फैसले का क्या असर पड़ेगा और यूएई ने ये फैसला क्यों लिया।
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संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई की सरकार ने मंगलवार को ऐलान किया कि, वह एक मई से ओपेक और ओपेक प्लस से खुद को अलग कर रहा है। इसकी घोषणा करते समय यूएई ने तर्क दिया कि, अब वह बिना किसी बंधन के ज्यादा से ज्यादा तेल का उत्पादन कर बाजार में आना चाहता है, लेकिन ओपेक के कोटे उसे ऐसा करने से रोक रहे हैं। यूएई ने कहा कि, उसने अपने एनर्जी प्रोडक्शन की कैपिसिटी बढ़ा ली है और अब वह स्वत्रंत होकर तेल बेचना चाहता है।
क्या है ओपेक और ओपेक प्लस
तो आपको बता दें कि- ओपेक यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज, ये उन देशों का संगठन है जो तेल निर्यात करते हैं। ये संगठन न सिर्फ तेल की कीमतों को कंट्रोल करता है, बल्कि प्रोडक्शन कोटा भी तय करता है। यानी कि, कौन सा देश कितना तेल निकाल सकता है।

ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि दुनिया भर में तेल की कीमतें स्थिर रहें और सप्लाई पर भी कंट्रोल रहे। अगर तेल उत्पादन पर कंट्रोल नहीं रहेगा, तो उत्पादक देश मनमाने तरीके से तेल का उत्पादन कर दुनिया के बाजार में बेचने के लिए फ्री हो आएंगे। अगर ऐसा हुआ तो तेल की कीमतें या तो गिर जाएंगी या फिर बढ़ जाएगी। अब यूएई यही करना चाह रहा है यानी अब वह पूरी तरह से स्वत्रंत हो कर तेल बाजर में उतरना चाह रहा है।
कब हुआ था ओपेक का गठन
आइए ये भी जानते हैं कि, ओपेक का गठन कब और किन हालातों में हुआ था। तो आपको बता दें कि, ओपेक की नींव साल 1960 में बगदाद के रखी गई थी, उस वक्त ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला इसे पांच सदस्य देश थे, लेकिन 1966 आते-आते आबू धाबी और यूएई भी इसमें शामिल हो गये। इसके बाद अल्जीरिया, नाइजीरिया, लीबिया, गैबॉन और अंगोला जैसे देश भी इसके साथ जुड़ गये।
अब ये भी जान लेते हैं कि, ओपेक प्लस क्या है, तो आपको बता दें कि, ओपेक प्लस, ओपेक सदस्य देशों के साथ गैर ओपेक तेल उत्पादक देशों का गठबंधन है। इसका गठन उस वक्त हुआ था, जब साल 2016 में तेल की कीमतों में भारी गिरावट आ गई थी। ओपेक प्लस में रूस, कजाकिस्तान, अजरबैजान और ओमान जैसे देश शामिल हैं। ये ग्लोबल तेल प्रोडक्शन का करीब चालीस प्रतिशत हिस्सा कंट्रोल करता है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि, ओपेक और ओपेक प्लस दोनों मिलकर तेल बाजार को बैलेंस करने की कोशिश करते हैं।
यूएई ने ओपेक से अलग होने का ऐलान भले अब किया है, लेकिन वह लंबे समय से ओपेक और ओपके प्लस के कोटे से असंतुष्ट था क्योंकि वह अपनी क्षमता से अधिक तेल निकालना चाहता था, लेकिन तय कोटे ने उसके हाथ-पैर बांध रखे थे। ऐसे में जब होर्मुज संकट की वजह से दुनिया भर में तेल की किल्लत बी बढ़ने लगी तो उसने अपनी खुद की नीति बनाने का फैसला किया।
कम हुई ओपेक की ताकत
यूएई एनर्जी मिनिस्टर ने कहा कि, दुनिया को ज्यादा एनर्जी की जरूरत है और हम बिना किसी ग्रुप में बंधे यानी खुलकर काम करना चाहते हैं। अब हम बाजार की डिमांड के हिसाब से अपने एनर्जी प्रोडक्शन के इजाफा करेंगे।
आपको बता दें कि, युएई दुनिया का सातवां सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है, उसकी तेल उत्पादन क्षमता 4.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन है, ऐसे में युएई का ये फैसला ओपेक और ओपेक प्लस के लिए बड़ा झटका है, इससे उसकी ताकत काफी कम हो जाएगी।
क्योंकि, ओपेक से अलग होने के बाद वह ज्यादा से ज्यादा तेल का उत्पादन करेगा, जिससे तेल की कीमतें गिरेंगी और इसका नुकसान अन्य तेल उत्पादक देशों को हो सकता है। हालांकि, ईरान युद्ध की वजह से इसका असर तत्काल नहीं दिखेगा, क्योंकि तेल की कीमतें अभी आसमान छू रही हैं।

अब बात करते हैं भारत और दुनिया पर इसके असर की, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, जो मिडिल ईस्ट से आता है। ऐसे में अगर यूएई ज्यादा तेल का उत्पादन करता है, तो ग्लोबल सप्लाई बढ़ेगी और कीमतें कम होंगी, जिससे भारत का आयात बिल घटेगा और पेट्रोल डीजल की कीमतें स्थिर रहने में मदद मिल सकती है, लेकिन अगर बाजार में ज्यादा उतार चढ़ाव हुआ तो अनिश्चितता भी बढ़ सकती है।
हालांकि, यूएई से पहले भी कई देश जैसे कतर, इंडोनेशिया और इक्वाडोर ओपक से बाहर हुए हैं, लेकिन उससे संगठन पर कोई खास असर नहीं पडा, लेकिन यूएई जैसे बड़े उत्पादक का जाना अलग मायने रखता है। इधर युएई ने दावा किया है कि, वो जिम्मेदारी से काम करेगा और बाजार को अस्थिर नहीं होने देगा ये बदलाव तेल बाजार की पुरानी व्यवस्था को चुनौती दे रहा है। क्या यूएई का ये फैसला सही है, इससे भारत किस तरह से प्रभावित होगा।
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