
नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र के दौरान महिला आरक्षण से जुड़े ऐतिहासिक विधेयकों के प्रस्ताव ने भारतीय राजनीति के गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। गुरुवार को जब केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में इन विधेयकों को पेश किया, तो सदन का माहौल पूरी तरह से चुनावी और वैचारिक प्रतिद्वंद्विता के रंग में रंग गया।
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जुबानी जंग ने बढ़ाई तपिश
यह केवल एक विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया नहीं रही, बल्कि इसमें सामाजिक न्याय, जातिगत समीकरण और संवैधानिक सीमाओं के ऐसे सवाल घुले हुए थे, जिन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष के शीर्ष नेताओं को आमने-सामने खड़ा कर दिया। जहां एक तरफ सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम बता रही है। वहीं, दूसरी ओर विपक्ष ने परिसीमन और जनगणना की शर्तों को लेकर सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। विशेष रूप से समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच हुई जुबानी जंग ने इस सत्र की तपिश को और बढ़ा दिया है।

संसद की कार्यवाही शुरू होते ही जब बिल पटल पर रखा गया, तो कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, एआईएमआईएम और बीजेडी जैसी विपक्षी पार्टियों ने परिसीमन की शर्त को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने चर्चा में हिस्सा लेते हुए साफ किया कि, उनकी पार्टी सैद्धांतिक रूप से महिला आरक्षण के समर्थन में है, लेकिन जिस तरह से इसे परिसीमन और जनगणना से जोड़ा जा रहा है, वह संदिग्ध है।
अखिलेश ने सरकार को घेरा
अखिलेश यादव ने सीधे तौर पर सरकार की घेराबंदी करते हुए सवाल किया कि, आखिर देश में जनगणना का काम अब तक क्यों रुका हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार जनगणना से इसलिए पीछे हट रही है क्योंकि उसे डर है कि विपक्ष जातिगत जनगणना की मांग को और तेज करेगा। अखिलेश ने तर्क दिया कि बिना जातिगत डेटा के सामाजिक न्याय अधूरा है और जब तक पिछड़ों की सही आबादी का पता नहीं चलेगा, तब तक आरक्षण का सही लाभ उन तक नहीं पहुंच पाएगा। उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार पारदर्शी तरीके से काम करने के बजाय चुनावी लाभ के लिए धोखा देने का प्रयास कर रही है।
अखिलेश यादव के इन तीखे हमलों का जवाब देने के लिए खुद गृह मंत्री अमित शाह मैदान में उतरे। शाह ने सदन को आश्वस्त करते हुए कहा कि जनगणना की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है और इसमें किसी भी तरह की देरी की बात निराधार है। उन्होंने एक बड़ा बयान देते हुए स्पष्ट किया कि सरकार ने जातिगत आधार पर जनगणना करने का निर्णय ले लिया है और आने वाले समय में यह प्रक्रिया इसी आधार पर आगे बढ़ेगी। जब समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने इस पर आपत्ति जताई और पूछा कि वर्तमान में चल रही प्रक्रिया में जाति का कोई कॉलम क्यों नहीं है, तो अमित शाह ने अपनी चिर-परिचित शैली में पलटवार किया।
शाह ने कसा तंज
उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल घरों की गिनती का काम हो रहा है और तंज कसते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी का बस चले तो वह घरों की भी जाति तय कर दे। गृह मंत्री ने सदन में जोर देकर कहा कि जब नागरिकों की व्यक्तिगत गणना का चरण आएगा, तब उसमें जाति का कॉलम निश्चित रूप से शामिल किया जाएगा। बहस का रुख तब और अधिक आक्रामक हो गया जब आरक्षण के भीतर धर्म आधारित कोटे की बात उठी।
सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की मांग की, जिस पर गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ा रुख अपनाया। शाह ने दो टूक शब्दों में कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना पूरी तरह से असंवैधानिक है। उन्होंने संविधान का हवाला देते हुए तर्क दिया कि हमारा बुनियादी ढांचा किसी विशेष धर्म के आधार पर आरक्षण देने की अनुमति नहीं देता, इसलिए मुस्लिम कोटा असंवैधानिक है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। शाह के इस बयान ने विपक्षी खेमे में हलचल पैदा कर दी।
मुस्लिम महिलाएं आधी आबादी- अखिलेश
अखिलेश यादव ने इस पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए गृह मंत्री के बयान को ही असंवैधानिक करार दे दिया। अखिलेश ने सवाल उठाया कि क्या मुस्लिम महिलाएं इस देश की आधी आबादी का हिस्सा नहीं हैं? उनका तर्क था कि, अगर हम महिलाओं के सशक्तिकरण की बात कर रहे हैं, तो इसमें अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं को पीछे नहीं छोड़ा जा सकता।
अमित शाह ने अखिलेश के इस सवाल का जवाब बेहद तल्ख अंदाज में दिया। उन्होंने कहा कि अगर समाजवादी पार्टी को मुस्लिम महिलाओं की इतनी ही चिंता है, तो वे अपने कोटे के सभी टिकट मुस्लिम महिलाओं को दे दें, इसमें सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी। शाह ने इसे राजनीतिक पैंतरेबाजी करार देते हुए कहा कि संविधान के दायरे से बाहर जाकर कोई भी मांग करना केवल तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा है।
पीडीए पर सरकार को घेरने की कोशिश
पूरे दिन चली इस बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महिला आरक्षण बिल केवल महिलाओं को संसद तक पहुंचाने का जरिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे जातिगत जनगणना और क्षेत्रीय राजनीति के गहरे समीकरण छिपे हुए हैं। विपक्ष जहां पिछड़ा और अल्पसंख्यक (PDA) के मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे संवैधानिक मर्यादा और राष्ट्र निर्माण के व्यापक नजरिए से जोड़कर पेश कर रहा है।
परिसीमन को लेकर विपक्ष की चिंता यह है कि इसके बहाने आरक्षण के क्रियान्वयन में कई साल की देरी हो सकती है, जबकि सरकार का कहना है कि यह एक व्यवस्थित कानूनी प्रक्रिया है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कुल मिलाकर, लोकसभा में हुई यह बहस आगामी चुनावों के लिए एक वैचारिक ब्लूप्रिंट की तरह नजर आई, जहां जाति, धर्म और प्रतिनिधित्व के सवाल भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेंगे।



