होर्मुज में यूएस की नाकेबंदी ने रोकी भारतीय जहाजों की राह, पीएम मोदी ने ट्रंप से जताया विरोध

नई दिल्ली। बारूद के ढेर पर बैठे मिडिल ईस्ट में शांति आने के आसार अभी नजर नहीं आ रहे हैं। यहां छिड़े महायुद्ध की आग अब धीरे-धीरे भारत को भी झुलसाने लगी है। 28 फरवरी से शुरू हुए इस भीषण संघर्ष के बीच ईरान ने भारत के लिए अपने दरवाजे खोल कर एक अच्छे दोस्त का फर्ज निभाया था। वहीं अब अमेरिका ने होर्मुज पर नई घेरेबंदी कर भारत धर्मसंकट में डाल दिया है।

इसे भी पढ़ें- इस्लामाबाद वार्ता फेल: ट्रंप ने किया होर्मुज की नाकाबंदी का ऐलान, ईरान ने दी तेल संकट की धमकी

वॉरशिप डिप्लोमेसी ने लगाया ब्रेक

बीते कुछ दिनों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो युद्ध के चरम दौर में भी सबसे ज्यादा भारतीय झंडे वाले जहाज ही ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ से सुरक्षित निकलें हैं। यह भारत और ईरान के बीच उस गहरे कूटनीतिक तालमेल का परिणाम था, जिसकी मिसाल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कम ही देखने को मिलती है, लेकिन अब समुद्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वॉरशिप डिप्लोमेसी ने इस रफ़्तार पर ब्रेक लगा दिया है, जिससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि, क्या दोस्ती के नाम पर अमेरिका ने भारत के हितों को एक जटिल समस्या में फंसा दिया है।

US blockade in Hormuz

पश्चिम एशिया में जारी इस युद्ध के दौरान मैरीटाइम मूवमेंट को ट्रैक करने वाले अधिकारियों ने चौंकाने वाली जानकारी साझा की है। 13 अप्रैल को अमेरिकी नाकेबंदी पूरी तरह प्रभावी होने से ठीक पहले तक, ईरान ने अपनी संप्रभुता का इस्तेमाल करते हुए 10 भारतीय मर्चेंट जहाजों को होर्मुज के रास्ते सुरक्षित निकलने का रास्ता दिया। ईरान ने न केवल इन जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की, बल्कि आधिकारिक तौर पर यह भी स्पष्ट किया कि उसने भारतीय जहाजों से कोई भी टोल या अतिरिक्त शुल्क नहीं वसूला है।

15 जंगी जहाज और 10000 हजार सैनिक तैनात

यह वैश्विक व्यापार के इतिहास में एक दुर्लभ घटना है, जहां युद्धरत देश किसी मित्र राष्ट्र के लिए अपनी सबसे महत्वपूर्ण समुद्री सीमा को बिना किसी आर्थिक स्वार्थ के खुला रखता है। ईरान का यह कदम भारत के साथ उसकी सदियों पुरानी सभ्यतागत नजदीकियों और वर्तमान सामरिक जरूरतों के बीच के संतुलन को दर्शाता है। जब तक होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण रहा, भारतीय कूटनीति के चलते एक-एक करके जहाज निकलते रहे और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर कोई बड़ा आंच नहीं आया।

हालांकि, अब मंजर पूरी तरह बदल चुका है क्योंकि अमेरिका ने इस रणनीतिक जलमार्ग पर अपनी अभूतपूर्व सैन्य नाकेबंदी कर दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देशों पर फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ने वाले इस इलाके में कम से कम 15 जंगी जहाज तैनात कर दिए गए हैं। इन विशालकाय जहाजों पर दर्जनों अत्याधुनिक फाइटर जेट और 10,000 से भी अधिक अमेरिकी सैनिक चौबीसों घंटे निगरानी कर रहे हैं।

इस नाकेबंदी का असर इतना गहरा है कि, पहले ही 24 घंटों के भीतर 6 बड़े मर्चेंट नेवी जहाजों को अमेरिकी सेना के आदेश पर रास्ता बदलना पड़ा और वे वापस ओमान की खाड़ी में ईरानी बंदरगाहों की ओर लौटने को मजबूर हो गए। वर्तमान में 15 भारतीय जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं, जिनके लिए आगे बढ़ना अब जान जोखिम में डालने जैसा है। अमेरिका की इस कार्रवाई ने भारत के उस सहज रास्ते को बंद कर दिया है जो ईरान के सहयोग से अब तक खुला हुआ था।

ट्रंप और मोदी के बीच हुई बातचीत

इस तनावपूर्ण माहौल के बीच कूटनीतिक गलियारों में हलचल उस समय बढ़ गई जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन किया। करीब 40 मिनट तक चली इस लंबी बातचीत के दौरान ट्रंप ने पीएम मोदी को पश्चिम एशिया के ताजा हालातों की जानकारी दी और विशेष रूप से पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली ईरान वार्ता के विफल होने पर चर्चा की। ट्रंप ने प्रधानमंत्री को होर्मुज में की गई अमेरिकी नाकेबंदी के सैन्य उद्देश्यों से अवगत कराया, जिस पर प्रधानमंत्री मोदी ने भी भारत का रुख बेहद स्पष्ट और कड़े शब्दों में साझा किया।

प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य का खुला और सुरक्षित रहना भारत के लिए महज एक कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था का सवाल है। भारत के लिए तेल और गैस की निर्बाध सप्लाई का एकमात्र रास्ता यही है और अमेरिकी दखलंदाजी ने भारत के इन हितों को सीधे तौर पर खतरे में डाल दिया है।

US blockade in Hormuz

देखा जाए तो अमेरिका की यह नीति भारत के लिए एक दोधारी तलवार साबित हो रही है। एक तरफ ट्रंप प्रशासन भारत को अपना सबसे करीबी रणनीतिक साझेदार बताता है और बार-बार फोन करके सहयोग की उम्मीद करता है, लेकिन दूसरी तरफ उनकी सैन्य कार्रवाइयां भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग को ही ठप कर रही हैं।

भारत का रुख साफ़- नहीं करेगा गुटबाजी

28 मार्च को हुए पिछले फोन कॉल के बाद से अब तक की परिस्थितियों का विश्लेषण करें तो यह साफ होता है कि अमेरिका तब-तब भारत की ओर मुड़ता है, जब वह पश्चिम एशिया के दलदल में खुद को कमजोर पाता है। पाकिस्तान के जरिए ईरान को साधने की कोशिशें नाकाम होने के बाद अब अमेरिका शायद भारत के जरिए ईरान पर दबाव बनाना चाहता है, लेकिन भारत ने अपने स्टैंड से यह साफ कर दिया है कि वह किसी की गुटबाजी के लिए अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा।

भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती ईरान और अमेरिका के बीच संतुलन बनाए रखने की है। एक तरफ ईरान है जिसने युद्ध के दौरान भी भारतीय जहाजों को वीआईपी ट्रीटमेंट देकर अपनी दोस्ती का हक अदा किया और दूसरी तरफ अमेरिका है जो अपनी वैश्विक चौधराहट के चक्कर में भारत के व्यापारिक जहाजों का रास्ता रोककर खड़ा है।

होर्मुज में फंसे 15 भारतीय जहाज

होर्मुज में फंसे 15 भारतीय जहाजों का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय विदेश मंत्रालय इस नाकेबंदी से छूट दिलाने के लिए वॉशिंगटन पर कितना दबाव बना पाता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा नेविगेशन की स्वतंत्रता की वकालत की है, लेकिन आज विडंबना यह है कि वही अमेरिका, जो दक्षिण चीन सागर में इस सिद्धांत की दुहाई देता है, वह ही होर्मुज में नाकेबंदी करके भारत जैसे मित्र राष्ट्रों की रफ़्तार रोक रहा है।

 

इसे भी पढ़ें- इस्लामाबाद पर टिकीं दुनिया की निगाहें, आज होने जा रही अहम शांति वार्ता, होर्मुज पर अमेरिका का बड़ा दावा

Related Articles

Back to top button