ट्रंप ने फिर फोड़ा बम, अब जेनेरिक दवाओं पर लगाएंगे टैरिफ, भारत पर क्या होगा असर?

नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर वैश्विक व्यापार जगत में हलचल मचा दी है। कनाडा पर पचास प्रतिशत टैरिफ लगाने के ऐलान के कुछ ही दिनों बाद, अब उन्होंने अमेरिका में आयात होने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर दो सौ प्रतिशत तक भारी टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है।

यह फैसला ऐसे समय आया है, जब मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध की वजह से वैश्विक व्यापारिक माहौल पहले से ही तनावपूर्ण बना हुआ है। दुनियाभर की दवा कंपनियों के लिए यह एक बड़ा झटका माना जा रहा है। भारत के लिए भी इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं, क्योंकि भारतीय जेनेरिक दवा उद्योग अमेरिकी बाजार पर बड़े पैमाने पर निर्भर है।

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पहले राहत, फिर झटका 

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट के जरिए इस नई नीति की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि, पहली अगस्त से शुरू होकर अगले दो वर्षों तक, अमेरिका में आयातित सभी जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ पूरी तरह शून्य रहेगा। शुरुआती तौर पर यह ऐलान राहत देने वाला लग सकता है, लेकिन इसके तुरंत बाद ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया कि, यह राहत स्थायी नहीं है।

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उन्होंने बताया जैसे ही दो साल पूरे होंगे। उसके ठीके बाद एक साल तक जेनेरिक दवाओं पर सौ प्रतिशत टैरिफ लागू किया जायेगा। फिर इस दर को बढ़ाकर दो सौ प्रतिशत तक कर दिया जाएगा। यानी ये एक ऐसी ऐसी नीति है जो शुरुआत में मीठी लग रही है, लेकिन आगे चलकर बेहद कड़वी साबित हो सकती है।

टैरिफ के पीछे की मंशा 

राष्ट्रपति ने अपने पोस्ट में इस फैसले के पीछे की वजह भी साफ कर दी है। उनके अनुसार, इस कदम का मकसद जेनेरिक दवाओं के उत्पादन को वापस अमेरिका लाना है। ट्रंप ने ये भी चेतावनी दी है कि, जो कंपनियां तय समयसीमा के अंदर अमेरिका में अपने प्लांट और उत्पादन उपकरण स्थापित नहीं करेंगी, उन पर जुर्माना लगाया जाएगा। यानी यह टैरिफ सिर्फ राजस्व जुटाने का जरिया नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है।

अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों पर गौर करें तो, अमेरिका में बिकने वाली 90% से अधिक दवाएं जेनेरिक श्रेणी की ही होती हैं। यानी यह फैसला किसी छोटे हिस्से पर नहीं, बल्कि अमेरिकी हेल्थकेयर सिस्टम की बुनियाद पर असर डालेगा। हालांकि राहत की बात यह है कि पेटेंट, ब्रांडेड या इनोवेटिव दवाओं से जुड़ी नीति में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। रिपोर्टों के मुताबिक, दुनिया की कुछ बड़ी दवा निर्माता कंपनियों ने पिछले साल ही अमेरिकी सरकार के साथ समझौते कर लिए थे, जिसके तहत अरबों डॉलर मूल्य की दवाओं को टैरिफ से छूट मिल चुकी है।

अप्रैल में ही मिल चुके थे संकेत

आपको बता दें कि, यह पहला मौका नहीं है, जब ट्रंप प्रशासन ने दवा उद्योग को निशाने पर लिया हो। इससे पहले अप्रैल महीने में राष्ट्रपति ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें अमेरिका में आयातित ब्रांडेड दवाओं पर सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। उस समय शर्त यह थी कि, यदि दवा निर्माता कंपनियां सरकार द्वारा तय मूल्य निर्धारण समझौतों को स्वीकार करती हैं और अपने उत्पादन को अमेरिका में स्थानांतरित करने का वादा करती हैं, तो उन्हें इस टैरिफ से राहत मिल सकती है। अब जेनेरिक दवाओं पर दो सौ प्रतिशत तक के नए ऐलान के साथ ट्रंप प्रशासन ने अपनी इस मुहिम को और आगे बढ़ा दिया है।

 क्या होगी भारत की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में भारत की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है। इसकी वजह भी साफ है।  दरअसल, अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली हर पांच जेनेरिक दवाओं में से एक भारत में ही तैयार होती है। यह किफायती दवाएं लाखों अमेरिकी नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाती हैं।

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आंकड़ों पर नजर डालें तो ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव यानी जीटीआरआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने पिछले साल यानी 2025 में अमेरिका को करीब साढ़े नौ अरब डॉलर मूल्य की जेनेरिक दवाओं का निर्यात किया। यह आंकड़ा भारत के कुल वैश्विक दवा निर्यात, जो लगभग 25 अरब डॉलर के आसपास है, उसका करीब 48% हिस्सा है। इसके अलावा भारत सालाना करीब दस अरब डॉलर से भी ज्यादा मूल्य की जेनेरिक दवाएं अकेले अमेरिका को भेजता है, जो किसी हद तक अमेरिकी स्वास्थ्य तंत्र की रीढ़ बना हुआ है।

भारतीय कंपनियों के लिए अवसर

ट्रंप की इस नई घोषणा का सबसे बड़ा फायदा यह है कि, अगले दो सालों तक भारतीय जेनेरिक दवाओं पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा। यानी भारतीय दवा कंपनियां इस अवधि में बिना किसी रोक-टोक के अपना निर्यात जारी रख सकेंगी। सीधे शब्दों में कहें, तो ट्रंप के इस ऐलान से भारतीय जेनेरिक दवा उद्योग पर तत्काल कोई नकारात्मक असर पड़ने वाला नहीं है।

यह दो साल भारतीय कंपनियों के लिए एक अनमोल अवसर की तरह हैं। इस दौरान उनके पास पर्याप्त समय होगा कि, वे आने वाले सौ और फिर दो सौ प्रतिशत टैरिफ की चुनौती से निपटने के लिए अपनी रणनीति तैयार कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि, इस मोहलत के दौरान भारतीय जेनेरिक दवा कंपनियां अमेरिका में सीधे मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करने, या फिर वहां की स्थानीय कंपनियों के साथ साझेदारी बढ़ाने जैसे कदम उठा सकती हैं। इससे जब आगे चलकर भारी टैरिफ लागू होगा, तब तक भारतीय कंपनियां खुद को उस झटके से बचाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुकी होंगी।

 भारत के लिए राहत

कुल मिलाकर देखा जाए, तो ट्रंप का यह ऐलान भले ही सुर्खियों में डरावना लग रहा हो, लेकिन भारत के लिए फिलहाल घबराने की कोई वजह नहीं है। अगले दो साल भारतीय जेनेरिक दवा उद्योग के लिए राहत और अवसर दोनों लेकर आए हैं। असली परीक्षा तब होगी जब यह मोहलत खत्म होगी और टैरिफ की दरें बढ़नी शुरू होंगी। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत सरकार और यहां की दवा कंपनियां इस अवसर का इस्तेमाल किस तरह करती हैं, और अमेरिकी बाजार में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए क्या नई रणनीति अपनाती हैं।

 

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