अमेरिका-ईरान जंग में कूदा रूस! यूएस को दी चेतावनी, बोला-‘भरोसा करने लायक नहीं हैं ट्रंप’

मास्को। ईरान पर अमेरिका की हालिया सैन्य कार्रवाई ने पश्चिम एशिया में तनाव को और तेज कर दिया है। इसके साथ ही यहां एक नया संकट  खड़ा हो गया है। दरअसल, अब इस विवाद में रूस भी कूद पड़ा है। रूस ने अमेरिकी हमलों की कड़ी शब्दों में निंदा की और इसे  तेहरान-वॉशिंगटन के बीच हुए एक अहम समझौते का उल्लंघन करार दिया है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के इस बयान के बाद क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर तनाव और बढ़ गया है।

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समझौते के उल्लंघन का आरोप

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने अमेरिका की आलोचना करते हुए कहा कि यूएस ने ईरान और अमेरिका के बीच हुए समझौता ज्ञापन की भावना और शर्तों का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा कि, यह समझौता तेहरान और वॉशिंगटन के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के मकसद से किया गया था, लेकिन अमेरिका की ताजा सैन्य कार्रवाई ने उस पूरी प्रक्रिया को कमजोर कर दिया है।

Tensions over Hormuz Russia angry

लावरोव ने यह भी आरोप लगाया कि, अमेरिकी हमलों का असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पूरे पर्शियन गल्फ क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया। लावरोव ने कहा, इन हमलों में नागरिक ठिकानों को भी नुकसान पहुंचा है, जिससे इलाके की समग्र स्थिरता खतरे में पड़ गई है।  विदेश मंत्री ने ये बयान मॉस्को में चाड के विदेश मंत्री के साथ आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिया। यहां लावरोव ने अमेरिका की सैन्य रणनीति पर खुलकर सवाल उठाए।

सैन्य कार्रवाई से नहीं निकलेगा हल

प्रेस कॉन्फ्रेंस में रूसी विदेश मंत्री ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि, किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद को सैन्य ताकत के जरिए सुलझाना कोई स्थायी हल नहीं हो सकता। उनका कहना था कि, इस तरह की कार्रवाइयां समस्या को सुलझाने के बजाय उसे और उलझा देती हैं। इससे क्षेत्र में लंबे समय तक चलने वाली अस्थिरता जन्म लेती है, जिसके परिणाम घातक होते हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी अपील की कि, इस मुद्दे पर कूटनीतिक रास्ते तलाशे जाएं, न कि सैन्य टकराव को बढ़ावा दिया जाए।

नागरिक बुनियादी ढांचे के नुकसान का दावा

रूस ने अपने बयान में यह भी दावा किया कि, अमेरिकी हमलों से न केवल ईरान बल्कि पर्शियन गल्फ सहयोग परिषद (GCC) के अन्य सदस्य देशों में भी नागरिक बुनियादी ढांचे को क्षति पहुंची है। लावरोव ने इस स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए चेतावनी दी कि, इस तरह की सैन्य कार्रवाइयां पूरे क्षेत्र में अस्थिरता को और बढ़ा सकती हैं। उन्होंने कहा,  इससे मिडिल ईस्ट में शांति स्थापित करने की दिशा में मुश्किल आ सकती है और अब तक हुए तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रयास भी कमजोर पड़ सकते हैं।

ट्रंप प्रशासन पर भी उठाए सवाल

रूसी विदेश मंत्री ने इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिका की विश्वसनीयता पर भी गंभीर उठाए। उन्होंने कहा, जिस तरह से मिडिल ईस्ट में हालात बने हुए हैं, उसे देखते हुए अमेरिका के साथ भविष्य में होने वाले किसी भी समझौते पर भरोसा करना मुश्किल हो जायेगा। अपनी बात को पुख्ता करने के लिए लावरोव ने अलास्का में हुई उस अहम वार्ता का हवाला दिया, जिसमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शामिल हुए थे। उनका कहना था कि, इससे पहले भी कई मौकों पर अमेरिका द्वारा किए गए समझौतों का पूरी तरह से पालन नहीं किया गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसे का संकट पैदा होता है।

ईरान का भी कड़ा विरोध

इस पूरे मामले में ईरान की प्रतिक्रिया भी बेहद तीखी रही है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी सैन्य हमलों को सीधे तौर पर संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन बताया है। तेहरान ने साफ़ शब्दों में कहा कि, अमेरिका की इस कार्रवाई ने युद्ध विराम बनाए रखने और क्षेत्रीय तनाव को कम करने की दिशा में हो रहे तमाम प्रयासों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है।

ईरान ने अमेरिका पर आरोप लगाते हुए कहा कि, हमलों में सिर्फ सैन्य ठिकानों को ही नहीं, बल्कि परिवहन से जुड़े ढांचे, मालवाहक जहाजों और कई अन्य नागरिक सुविधाओं को भी निशाना बनाया गया है। यह आरोप स्थिति को और गंभीर बनाता है, क्योंकि नागरिक बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत एक संवेदनशील और विवादास्पद मुद्दा माना जाता है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है केंद्र में

इस पूरे विवाद के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। दरअसल, यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक और ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल गुजरता है, जिससे दुनिया भर का परिवहन सुचारू रूप से चलता रहता है। ईरान ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अब इस जलमार्ग से जहाजों की आवाजाही को अस्थायी रूप से रोकने का ऐलान कर दिया, जिससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

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दूसरी तरफ, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मामले पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए दावा किया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अब अमेरिका का नियंत्रण स्थापित हो चुका है। इस जलमार्ग को दोबारा से खोल दिया गया है, लेकिन ईरान और अमेरिका, दोनों देशों के विरोधाभासी दावों की वजह से इस क्षेत्र में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

 शांति स्थापना को झटका

इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक समुदाय को चिंता में डाल दिया है। साथ ही ये बहस भी छेड़ दी है कि, क्या सैन्य कार्रवाई से पश्चिम एशिया में स्थायी शांति स्थापित हो सकेगी। रूस और ईरान, दोनों का साझा रुख यही है कि अमेरिका की यह कार्रवाई क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा है। वहीं, अमेरिका इस कार्रवाई को उचित बता रहा है।

फिलहाल कूटनीतिक स्तर पर बयानबाजी तेज हो गई है, दोनों देश एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं, साथ है सैन्य कार्रवाई भ चल रही है। जमीनी स्तर पर तनाव बढ़ा हुआ है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक रूप से अहम जलमार्ग पर बना गतिरोध आने वाले दिनों में वैश्विक तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों, दोनों पर असर डाल सकता है।

 

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