
वॉशिंगटन। मिडिल ईस्ट में मची उथल-पुथल की वजह से दुनिया इस वक्त एक ऐसे आर्थिक संकट से गुजर रही है जिससे हर देश और इन्सान प्रभावित हो रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और होर्मूज स्ट्रेट के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है।
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110 डॉलर प्रति बैरल पार हुईं कीमतें
कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं और इसका असर ब्रिटेन से लेकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत तक हर जगह पद रहा है। हर देश में तेल की कीमतें बेतहाशा बढ़ रही हैं, लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा बयान दे दिया है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है।

ट्रंप ने दावा किया है कि, ईरान युद्ध जल्द खत्म होगा, क्योंकि तेहरान समझौते के लिए बेताब है और इसके बाद तेल की कीमतें धड़ाधड़ गिरेंगी। साथ ही उन्होंने यह भी खुलासा किया कि, वह ईरान पर हमले के आदेश देने से महज एक घंटे दूर थे।
वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार
होर्मूज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग है और जब से यह बाधित हुआ है, तब से वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार मचा हुआ है। कच्चे तेल की कीमतें बीते कुछ दिनों से लगातार 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं। इसका सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ रहा है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल से आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ रहा है। ब्रिटेन और यूरोपीय देशों में भी महंगाई का दबाव बढ़ता जा रहा है। पूरी दुनिया की निगाहें इस वक्त मध्य पूर्व की उस बातचीत पर टिकी हैं जो अमेरिका और ईरान के बीच चल रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में मीडिया से बात करते हुए बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा कि, कच्चे तेल की कीमतें बहुत जल्द तेजी से गिरेंगी। उन्होंने दावा किया कि ईरान उनसे समझौता करने के लिए पूरी तरह बेताब है और वहां तेल का विशाल भंडार मौजूद है। ट्रंप के शब्दों में कहें तो वहां इतना तेल है कि समझौता होते ही कीमतें धड़ाधड़ गिरेंगी।
हमले से महज एक घंटे दूर थी अमेरिकी सेना
यह बयान ऐसे समय आया है जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं तेल की ऊंची कीमतों से कराह रही हैं। ट्रंप के इस दावे ने बाजार में तत्काल असर भी दिखाया और बुधवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली। हालांकि मिडिल ईस्ट से सप्लाई में रुकावट के चलते कीमतें अभी भी 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं।
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू वह है, जिसमें ट्रंप ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान खुलासा किया था कि, वह ईरान पर सैन्य हमले का आदेश देने से महज एक घंटे दूर थे, अमेरिकी सेना पूरी तरह तैयार खड़ी थी, लेकिन ठीक उसी वक्त कतर, सऊदी अरब, कुवैत और यूएई समेत अन्य मध्यस्थ देशों के फोन आए और उन्हें बताया गया कि, तेहरान शांति वार्ता में सकारात्मक रुख अपना रहा है। इन्हीं फोन कॉल्स के बाद ट्रंप ने अपना इरादा बदल दिया।
बड़े सैन्य टकराव के करीब दुनिया
यह खुलासा बताता है कि, दुनिया एक बड़े सैन्य टकराव से कितने करीब थी। अगर वे फोन कॉल्स नहीं आते तो मध्य पूर्व में एक और बड़ा युद्ध शुरू हो चुका होता और उसके नतीजे सिर्फ उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहते। ट्रंप ने बताया कि, सऊदी अरब, कतर, यूएई, कुवैत, बहरीन और अन्य खाड़ी देश अमेरिका और ईरान के बीच समझौता कराने के लिए एक टीम के रूप में काम कर रहे हैं।

ये देश दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं और शांति वार्ता को आगे बढ़ाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका भी ईरान को समझौते के लिए एक सीमित समय दे रहा है। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि, ईरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति किसी भी कीमत पर नहीं दी जा सकती। उन्होंने चिंता जताई कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है तो वह उसका इस्तेमाल करने से नहीं हिचकेगा। यही वह लाल लकीर है जिसे अमेरिका किसी भी हाल में पार नहीं होने देना चाहता।
अभी राहत मिलने के आसार नहीं
ट्रंप के इस बयान से बाजार में उम्मीद की एक किरण जरूर जगी है, लेकिन विश्लेषक और ऊर्जा विशेषज्ञ इतनी जल्दी राहत मिलने को लेकर सतर्क हैं। एनालिस्ट इस बात पर पैनी नजर रख रहे हैं कि क्या वास्तव में वॉशिंगटन और तेहरान किसी शांति समझौते पर पहुंच सकते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि, भले ही कीमतों में थोड़ी नरमी आई हो लेकिन ईरान पर अमेरिकी हमले का जोखिम पूरी तरह टला नहीं है। जब तक यह अनिश्चितता बनी रहेगी तब तक तेल की कीमतें ऊंचाई पर बनी रह सकती हैं।
भारत पर क्या असर
भारत अपनी कुल तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है और ऐसे में वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अगर ट्रंप का दावा सच साबित होता है और ईरान के साथ समझौता होता है तो भारत को बड़ी राहत मिल सकती है। तेल की गिरती कीमतें महंगाई को काबू में रखने में मदद करेंगी और आम आदमी की जेब पर पड़ रहे दबाव से कुछ राहत मिलेगी, लेकिन फिलहाल सब कुछ इस बात पर निर्भर है कि अमेरिका और ईरान की वार्ता किस दिशा में जाती है।
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