
भारतीय इतिहास के सबसे विवादास्पद शासकों में शुमार टीपू सुल्तान की शुरुआती शिक्षा से जुड़ा एक ऐसा प्रसंग सामने आता है, जो खुद उनके पिता और मैसूर के तत्कालीन शासक हैदर अली को बुरी तरह आग-बबूला कर गया था। हैदर अली खुद जीवनभर पढ़-लिख नहीं सके थे, और इस बात का उन्हें हमेशा गहरा मलाल रहा।
यही वजह थी कि वे चाहते थे कि उनके बेटे भरपूर शिक्षा हासिल करें। इसी सोच के तहत उन्होंने टीपू की शिक्षा-दीक्षा का जिम्मा एक योग्य मुस्लिम शिक्षक को सौंपा था। लेकिन कुछ वर्षों बाद जब हैदर अली ने बेटे की प्रगति परखने की कोशिश की, तो नतीजा देखकर वे हैरान और नाराज रह गए। असल में एक भावी शासक के लिए जरूरी युद्धकला, राजनीति और कूटनीति की शिक्षा के बजाय टीपू को सिर्फ धार्मिक कट्टरता से जुड़ी बातें पढ़ाई गई थीं।
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नाराज हैदर अली ने उस शिक्षक को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि उनके सिखाए गए पाठ मैसूर राज्य को बर्बाद करके रख देंगे। इतिहासकारों के एक तबके की राय है कि टीपू के मन में धार्मिक असहिष्णुता के बीज उसी शुरुआती शिक्षा के दौरान बो दिए गए थे। दिलचस्प बात यह है कि धार्मिक सहिष्णुता के मामले में पिता-पुत्र की छवियां एक-दूसरे से बिल्कुल उलट नजर आती हैं।
हैदर अली का संघर्ष भरा बचपन
इस पूरी कहानी को समझने के लिए हैदर अली के अपने बचपन पर नजर डालना जरूरी है। मैसूर के तत्कालीन महाराजा दौड़ड़ा कृष्णराज बोडेयार ने अपने सेनापति की गुहार पर आठ साल के शाहबाज और चार साल के हैदर अली की जान बचाई थी। इन दोनों बच्चों के पिता फतेह मुहम्मद एक युद्ध में मारे गए थे, जिसके बाद जागीरदार अब्बास कुली खान ने उनकी विधवा मां को लूट-पाटकर बेघर कर दिया था।

इतना ही नहीं, गुस्साए कुली खान ने दोनों मासूम बच्चों को एक बड़े नगाड़े में बंद कर बुरी तरह पीटा भी था। किसी तरह जान बचाकर मां अपने दोनों बच्चों के साथ मैसूर पहुंचीं, जहां महाराजा ने दरियादिली दिखाते हुए इन बच्चों को संरक्षण दिया और उनके पिता का कर्ज तक चुकाया।
आगे चलकर यही हैदर अली, जो कभी पढ़ नहीं सका, घुड़सवारी और शस्त्रकला में पूरी तरह पारंगत हो गया। बड़े होने पर उसने अपने परिवार पर जुल्म ढाने वाले अब्बास कुली खान को बेरहमी से मार डाला। साल 1749 में उसने एक साधारण सिपाही के तौर पर महाराजा की सेना में कदम रखा और अगले 11 वर्षों में अपने युद्ध-कौशल के दम पर लगातार आगे बढ़ता गया।
साल 1761 तक वह इतना ताकतवर हो चुका था कि मैसूर की गद्दी पर भले ही बोडेयार राजपरिवार का कोई सदस्य बैठा दिखता था, लेकिन असली सत्ता की डोर हैदर अली के ही हाथों में थी। यह सच सभी को पता था, लेकिन उसकी ताकत और क्रूरता के डर से कोई विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था।
बेटे को शिक्षित बनाने की गहरी चाहत
7 दिसंबर 1782 को बीमारी के चलते अपनी मौत तक हैदर अली लगातार युद्धों में उलझा रहा। कुछ लड़ाइयों में उसे जीत मिली तो कुछ में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन एक योद्धा के तौर पर वह कभी हताश नहीं हुआ। इस बीच अपने बेटे टीपू को एक सक्षम उत्तराधिकारी के रूप में तैयार करने की कोशिश में भी उसने कोई कसर नहीं छोड़ी।
फर्श से अर्श तक पहुंचने वाले हैदर अली को अनपढ़ रह जाने का जीवनभर मलाल रहा। वह बड़ी मुश्किल से अपने नाम का पहला अक्षर लिखना ही सीख पाया था, और किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर की जरूरत पड़ने पर उसे उल्टा लगाया जाता था, जिसके बाद शाही मुहर लगाई जाती थी।
हालांकि भाषाओं की समझ और असाधारण याददाश्त के मामले में वह बेहद तेज था और कन्नड़, मराठी, तेलुगु और तमिल भाषाएं बोलने-समझने में माहिर था। फिर भी बुनियादी पढ़ाई-लिखाई न सीख पाना उसे हमेशा कचोटता रहा। खुद के लिए उसके पास अभावों और असुरक्षा में बीते बचपन का बहाना था, लेकिन वह नहीं चाहता था कि अगली पीढ़ी के पास ऐसा कोई बहाना बचे। इसीलिए वह खासतौर पर अपने उत्तराधिकारी टीपू की शिक्षा को लेकर बेहद सजग और गंभीर था।
शासन की जगह पढ़ाई गई मजहबी तालीम
लेखक विक्रम संपत ने अपनी किताब में इतिहासकार सी. हयवदन राव के हवाले से इस पूरे प्रसंग का जिक्र किया है। उनके मुताबिक हैदर अली को अपनी अशिक्षा का इतना गहरा दुख था कि उसने अपने बेटों को पढ़ाने के लिए फारसी और हिंदुस्तानी सिखाने वाले मौलवियों तक की नियुक्ति करवाई थी।
टीपू की शिक्षा का जिम्मा एक योग्य मुस्लिम शिक्षक को सौंपा गया, लेकिन सालों तक हैदर अली ने बेटे की प्रगति के बारे में कोई पूछताछ नहीं की। जब आखिरकार उसने खुद टीपू की सार्वजनिक परीक्षा ली, तो सच्चाई सामने आई कि एक भावी सैनिक और शासक के लिए जरूरी शिक्षा टीपू को दी ही नहीं गई थी। इसके बजाय उसे वह सब सिखाया गया था, जो एक अच्छा मौलवी बनने के लिए जरूरी होता है।
इस खुलासे के बाद हैदर अली का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने साफ कहा कि उसके बेटे को न तो युद्धकला सिखाई गई, न राज्य विस्तार और कूटनीति का ज्ञान दिया गया, और न ही शासन चलाने के तौर-तरीके बताए गए। इसके उलट, उसे एक कट्टर धार्मिक व्यक्ति बनाने की पूरी कोशिश की गई थी और उसके मन में इस्लाम से इतर हर चीज के प्रति नफरत भर दी गई थी।
कुशल सैन्य अधिकारी को बनाया टीपू का गुरु
हैदर अली इस नतीजे पर पहुंचा कि इस तरह की शिक्षा आगे चलकर परिवार और राज्य, दोनों के लिए खतरनाक साबित होगी। उसने तुरंत उस शिक्षक को हटाकर अपने सबसे भरोसेमंद और कुशल सैन्य अधिकारी गाजी खान को टीपू का नया गुरु नियुक्त किया, जिसने उसे घुड़सवारी, निशानेबाजी, तलवारबाजी और यूरोपीय युद्ध तकनीकों की बारीकियां सिखाईं। लेकिन इसके बावजूद टीपू के किशोर मन में शुरुआती शिक्षक द्वारा बोए गए असहिष्णुता के बीज पूरी तरह नहीं मिट सके, और आगे चलकर यही उसके विवादास्पद व्यक्तित्व का हिस्सा बन गए।
आज इतिहास में टीपू सुल्तान की छवि परस्पर विरोधी नजर आती है। एक तरफ उसे ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ डटकर लड़ने वाले आधुनिक सोच के योद्धा और नायक के रूप में देखा जाता है, तो दूसरी तरफ उसके शासनकाल में हुए कठोर दमन, जबरन धर्मांतरण और धार्मिक उत्पीड़न के आरोप उसे आलोचनाओं के घेरे में भी लाते हैं।
पिता-पुत्र की अलग-अलग राह
दिलचस्प यह है कि एक बहादुर योद्धा के तौर पर पहचान बनाने वाला टीपू सुल्तान धार्मिक सहिष्णुता के मामले में अपने पिता की राह पर नहीं चल सका। खासतौर पर जबरन धर्मांतरण के प्रयासों ने उसकी स्मृति में होने वाले आयोजनों को आज भी विवादों में उलझाए रखा है।
वहीं दूसरी ओर, हैदर अली ने भले ही मैसूर की गद्दी हड़प ली और अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए क्रूरता दिखाने से भी गुरेज नहीं किया, लेकिन उसने कभी अपने शासन पर धार्मिक कट्टरता हावी नहीं होने दी। उस दौर में मैसूर दरबार में तैनात रहे एक ब्रिटिश अधिकारी ने अपने लेखन में हैदर अली को मुस्लिम शासकों में सबसे अधिक सहिष्णु बताते हुए लिखा था कि वह धार्मिक कर्मकांडों से लगभग दूर रहता था और मानता था कि सभी धर्म ईश्वर की नजर में समान हैं।
मैसूर के मशहूर दशहरा उत्सव को भी हैदर अली ने कभी बाधित नहीं होने दिया। अपदस्थ राजपरिवार को उसने अपने पूर्वजों की तरह भव्यता से यह उत्सव मनाने दिया, क्योंकि वह जानता था कि बहुसंख्यक हिंदू जनता राजपरिवार का गहरा सम्मान करती है। यही वजह थी कि वह खुद भी दशहरे के शाही जुलूस में शामिल हुआ करता था, भले ही व्यक्तिगत तौर पर वह गैर-मुस्लिम रीति-रिवाजों से दूरी बनाए रखता था। यही फर्क आगे चलकर हैदर अली और टीपू सुल्तान की ऐतिहासिक विरासत को एक-दूसरे से बिल्कुल अलग खड़ा कर देता है।
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