8.5 करोड़ साल से समुद्र में छिपा है धरती का 8वां महाद्वीप, जानें भारत से कितना बड़ा है ‘जीलैंडिया’

स्कूल की भूगोल की किताबों से लेकर आम नक्शों तक, हम बचपन से ही यह पढ़ते आए हैं कि, धरती पर कुल सात महाद्वीप मौजूद हैं, लेकिन अब वैज्ञानिकों की एक नई और चौंकाने वाली खोज कर ली है, जिसने इस पारंपरिक धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। भूवैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि, धरती पर एक आठवां महाद्वीप भी मौजूद है, जो लगभग पूरी तरह समुद्र की गहराइयों में छिपा हुआ है।

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यह अनोखी खोज तब सामने आई जब भू-वैज्ञानिकों ने न्यूजीलैंड के आसपास चारों तरफ पानी से घिरे विशाल इलाके का गहन जियोलॉजिकल अध्ययन किया। इस अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों को यह जानकर हैरानी हुई कि, यहां समुद्र के नीचे एक पूरे महाद्वीप के आकार का भू-क्रस्ट (Crust) मौजूद है। आकार की दृष्टि से देखा जाए तो यह छिपा हुआ महाद्वीप भारत के क्षेत्रफल से लगभग दोगुना है, जो इस खोज की विशालता को दर्शा रहा है।

समुद्र के नीचे मिला ‘जीलैंडिया’ महाद्वीप

भूवैज्ञानिकों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति इस क्षेत्र को देखता है तो उसे न्यूजीलैंड, न्यू कैलेडोनिया और चारों ओर गहरे नीले पानी से घिरे कई छोटे-छोटे द्वीप ही नजर आते हैं, लेकिन हकीकत में ये सभी द्वीप किसी अलग-थलग भूभाग के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि वे एक विशाल छुपे हुए महाद्वीप की दिखाई देने वाली ऊंची चोटियां मात्र हैं। इस विशाल महाद्वीप को वैज्ञानिक भाषा में ‘टे रिउ-ए-माउई’ या ‘जीलैंडिया’ के नाम से जाना जाता है।

Zealandia, 8th Continent

दिलचस्प बात यह है कि ‘जीलैंडिया’ नाम कोई नया शब्द नहीं है और न ही इसे पहली बार बोला और सुना गया है। इस नाम को सबसे पहले वर्ष 1995 में प्रसिद्ध जियोफिजिसिस्ट ब्रूस लुयेंडिक ने सुझाया था। हालांकि, इस महाद्वीप को असली वैज्ञानिक पहचान और मान्यता मिलने में करीब दो दशक का समय लगा। वर्ष 2017 में जाकर भूवैज्ञानिक निक मोर्टिमर और उनकी शोध टीम ने प्रतिष्ठित पत्रिका ‘GSA टुडे’ में इसके ठोस जियोलॉजिकल सबूत प्रस्तुत किए, जिसके बाद वैज्ञानिक जगत ने इसे गंभीरता से लेना शुरू किया।

94% हिस्सा है पानी में

वैज्ञानिकों के जियोलॉजिकल अनुमान के मुताबिक, यह गायब महाद्वीप कुल मिलाकर लगभग 49 लाख वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्रफल में फैला हुआ है। हैरानी की बात यह है कि, इतने विशाल भूभाग का करीब 94 प्रतिशत हिस्सा समुद्र के जलस्तर से नीचे डूबा हुआ है और केवल छह प्रतिशत हिस्सा ही पानी की सतह के ऊपर दिखाई देता है। वैज्ञानिकों का स्पष्ट रूप से कहना है कि, न्यूजीलैंड और न्यू कैलेडोनिया इसी छिपे हुए महाद्वीप के सबसे बड़े और प्रमुख हिस्से हैं, जो समुद्र की सतह से ऊपर दिखाई पड़ते हैं।

यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि, भूवैज्ञानिकों ने इस महाद्वीप को वर्ष 2017 में पहली बार ‘खोजा’ नहीं था, जैसा कि आमतौर पर समझा जाता है। दरअसल, जहाजों, सैटेलाइट तकनीक और आसपास के तटीय देशों को इन समुद्री पहाड़ों की कतारों और पठारी क्षेत्रों के बारे में पहले से ही आंशिक जानकारी थी। असली चुनौती और नई बात इसका सही वैज्ञानिक वर्गीकरण करना था। वर्ष 2017 में भूवैज्ञानिकों ने पहली बार यह तर्क दिया कि, इन बिखरे और पानी में डूबे टुकड़ों को अलग-अलग भूभागों के रूप में नहीं, बल्कि 49 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले एक संपूर्ण और स्वतंत्र महाद्वीप के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।

समुद्र तल से ऊपर जमीन नहीं, बल्कि ‘क्रस्ट’ है असली महाद्वीप

आमतौर पर आम लोग समुद्र की तटरेखाओं को ही किसी भी महाद्वीप की प्राकृतिक और अंतिम सीमा मान लेते हैं, लेकिन जियोलॉजी यानी भूविज्ञान के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। वास्तव में, दुनिया के हर महाद्वीप का एक बड़ा हिस्सा समुद्र के भीतर ही छिपा होता है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार, किसी भी महाद्वीप को परिभाषित करने का असली आधार समुद्र तल से ऊपर दिखाई देने वाली जमीन नहीं, बल्कि उसके नीचे मौजूद ‘भू-क्रस्ट’ (Continental Crust) होता है।

Zealandia, 8th Continent B

अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका स्पेस डेली की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सामान्य समुद्री क्रस्ट काफी सघन और घनी होती है, जिसकी मोटाई औसतन करीब 7 किलोमीटर तक होती है। इसके उलट, जीलैंडिया क्षेत्र में किए गए भूकंपीय मापों से पता चलता है कि यहां की क्रस्ट सामान्य समुद्री क्रस्ट से कहीं अधिक मोटी है, यह आमतौर पर 10 से 30 किलोमीटर तक मोटी पाई गई है। इतना ही नहीं, न्यूजीलैंड के साउथ आइलैंड के कुछ विशेष हिस्सों के नीचे तो यह क्रस्ट 40 किलोमीटर से भी अधिक मोटी दर्ज की गई है, जो इसे एक स्पष्ट महाद्वीपीय क्रस्ट साबित करती है, न कि सामान्य समुद्री तल।

8.5 करोड़ साल पहले समुद्र से ऊपर था यह महाद्वीप

सबसे रोचक तथ्य यह है कि, जीलैंडिया हमेशा से समुद्र के नीचे डूबा हुआ नहीं था। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि, करीब 8.5 करोड़ साल पहले यह विशाल भूभाग समुद्र की सतह से पूरी तरह ऊपर हुआ करता था। भूवैज्ञानिक अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि इस क्षेत्र को लगभग 10 करोड़ से 8.5 करोड़ साल पहले के बीच भूगर्भीय विस्तार की प्रक्रिया ने गहराई से प्रभावित किया था।

इस प्राकृतिक प्रक्रिया के दौरान जीलैंडिया की क्रस्ट किसी आटे की तरह खिंचती चली गई, जिसके परिणामस्वरूप इसका महाद्वीपीय किनारा धीरे-धीरे बेहद पतला होता गया। इसके बाद जब समुद्र तल फैलना शुरू हुआ, तो इसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप तस्मान सागर का निर्माण हुआ।

इसके पश्चात लाखों वर्षों में हुई विभिन्न टेक्टोनिक यानी भूगर्भीय हलचलों ने इस महाद्वीप के विभिन्न हिस्सों को कई बार मोड़ा, उनमें गहरी दरारें डालीं, कुछ हिस्सों को ऊपर उठाया तो कुछ हिस्सों को नीचे धकेल दिया। अंततः इन्हीं लगातार चलती भूगर्भीय प्रक्रियाओं के चलते यह विशाल महाद्वीप धीरे-धीरे समुद्र की गहराइयों में समाता चला गया और आज यह जीलैंडिया के रूप में धरती के सबसे बड़े छिपे रहस्यों में से एक बना हुआ है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि जीलैंडिया की यह खोज न केवल पृथ्वी की भूगर्भीय संरचना को समझने में मदद करेगी, बल्कि यह भी दर्शाती है कि हमारी धरती के बारे में अभी भी बहुत कुछ जानना और खोजना बाकी है।

 

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