
बीजिंग। दक्षिण एशिया के आसमान में इन दिनों कुछ ऐसा घटित हो रहा है, जिसने मौसम विज्ञानियों से लेकर आम लोगों तक की निगाहें अंतरिक्ष से आ रही तस्वीरों की तरफ मोड़ दी हैं। सैटेलाइट से खींची गई तस्वीरों में उत्तरी भारत से लेकर एशिया के भीतरी इलाकों तक फैली बादलों की एक ऐसी विशाल पट्टी दिखाई दी है, जिसे अब लोग ‘मानसून रेन हाईवे’ का नाम दे रहे हैं।
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यह कोई मामूली बादल का टुकड़ा नहीं, बल्कि करीब पांच हजार किलोमीटर के दायरे में फैला एक ऐसा वायुमंडलीय गलियारा है, जो पाकिस्तान से शुरू होकर भारत होते हुए चीन तक पहुंचता दिख है। इससे ये स्पष्ट हो रहा है कि, आने वाले दिनों में इस पूरे क्षेत्र में भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है।
वेबसाइट विंडी ने सार्वजनिक कीं तस्वीरें
मौसम पर नजर रखने वाली वेबसाइट विंडी ने हाल ही में सैटेलाइट की इन तस्वीरों को सार्वजनिक किया था, जिसके बाद इस विषय पर जोरदार चर्चा शुरू हो गई है। तस्वीर में दिख रहा दृश्य किसी एक विशाल तूफानी बादल का नहीं है, जैसा कि पहली नजर में लग सकता है।

दरअसल, यह मानसून की हवाओं के बहाव से जुड़ी गहरी कन्वेक्शन प्रक्रिया, यानी हवा के ऊपर उठने की प्रक्रिया, और उससे बने बादलों का एक लंबा-चौड़ा क्षेत्र है। इस पूरी पट्टी में कई जगहों पर अलग-अलग तूफान और बारिश लाने वाले बादलों के समूह मौजूद हैं, जो आपस में मिलकर एक कड़ी के रूप में नजर आ रहे हैं।
क्या है मानसून रेन हाईवे
विशेषज्ञों के मुताबिक, सैटेलाइट तस्वीरों में जो पांच हजार किलोमीटर लंबी बादलों की पट्टी दिखाई दे रही है, वह असल में पूरे मानसून सिस्टम के विराट आकार को उजागर कर रही है। यह गलियारा पाकिस्तान की सीमाओं से शुरू होकर उत्तर भारत के मैदानी इलाकों को पार करते हुए चीन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। चूंकि अंतरिक्ष से देखने पर इसका फैलाव किसी लंबे राजमार्ग जैसा नजर आ रहा है, इसीलिए इसे मानसून रेन हाईवे नाम दिया गया है।
इस विशाल गलियारे के भीतर हवा के बड़े रास्ते, जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में एटमॉस्फेरिक कॉरिडोर कहा जाता है, बन रहे हैं और उनके साथ-साथ कई बादल व तूफानी सिस्टम भी आकार ले रहे हैं। जब किसी एक इलाके में कई तूफान एक साथ बनते हैं, तो उनके बादल धीरे-धीरे आपस में फैलकर आपस में जुड़ जाते हैं। यही वजह है कि, अंतरिक्ष से यह पूरा नजारा बादलों की एक बेहद लंबी और चौड़ी पट्टी जैसा दिखाई दे रहा है, जिसे सैटेलाइट के जरिए हजारों किलोमीटर की दूरी तक साफ-साफ देखा जा सकता है।
कैसे बनता है ये विशाल सिस्टम
दक्षिण एशिया का मानसून मूल रूप से हिंद महासागर से उठने वाली नमी और पानी की भाप के बड़े पैमाने पर एशिया की ओर बहाव की वजह से आकार लेता है। जब मानसून का मौसम अपने चरम पर होता है, तब नमी से भरी हवा की धाराएं भारतीय उपमहाद्वीप के भीतरी हिस्सों तक पहुंचती हैं।
इसके बाद जैसे-जैसे हवा के ये विशाल हिस्से, जिन्हें एयर मासेज कहा जाता है, ऊपर की ओर उठते हैं और वायुमंडल की ऊंची परतों के साथ-साथ जमीन के संपर्क में आते हैं, वैसे-वैसे विशाल बादल और भारी बारिश देने वाले सिस्टम बनने लगते हैं। यही प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है और नतीजा यह होता है कि पूरे क्षेत्र में एक के बाद एक बारिश के सिस्टम बनते चले जाते हैं, जो अंत में आपस में जुड़कर एक विशाल कॉरिडोर का रूप ले लेते हैं।
बेहद खास है ये बादलों की पट्टी
मौसम विज्ञानियों का कहना है कि, सैटेलाइट इमेजिंग की दुनिया में पांच हजार किलोमीटर लंबी बादलों की यह पट्टी अपने आप में बेहद खास अहमियत रखती है। यह तस्वीर बताती है कि, सक्रिय मानसून के मौसम में अलग-अलग इलाकों के मौसमी सिस्टम एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़े होते हैं और एक-दूसरे पर कितने निर्भर होते हैं।
जमीन पर रहने वाले लोगों के लिए बारिश अक्सर सिर्फ अपने शहर या राज्य तक सीमित एक स्थानीय घटना जैसी महसूस होती है, लेकिन जब यही नजारा अंतरिक्ष से देखा जाता है, तो इसके पीछे चल रही वायुमंडलीय हलचल का असली और पूरा दायरा सामने आता है, जो सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों किलोमीटर तक फैला होता है।
एक महाद्वीप को जोड़ता मानसून का नजारा
सैटेलाइट तस्वीरों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि, दक्षिण एशियाई मानसून को केवल अलग-अलग जगहों पर बनने वाले बारिश के तूफानों का एक साधारण समूह मानना पूरी तरह सही नहीं होगा। असल में यह हजारों किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ एक विशाल और जटिल वायुमंडलीय सिस्टम है, जिसकी हलचल एक साथ कई देशों की सीमाओं को पार करती है।

सैटेलाइट से नजर आई इस रेन हाईवे की तस्वीर इस बात को बखूबी दर्शाती है कि, किस तरह बादल और तूफान पूरे एशियाई महाद्वीप पर मानो एक कतार में खड़े होकर आगे बढ़ते हैं। यह कतार पाकिस्तान से शुरू होकर भारत होते हुए चीन तक पहुंचती है और इस रास्ते में पड़ने वाले सभी इलाकों की मौसमी गतिविधियों को आपस में जोड़ देती है।
घटनाक्रम पर मौसम विज्ञानियों की नजर
इस पूरे घटनाक्रम के बाद मौसम विभाग और विशेषज्ञ इस बात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं कि, आने वाले दिनों में यह सिस्टम किस तरह आगे बढ़ता है और किन-किन इलाकों में भारी बारिश का कारण बनता है। भारत, पाकिस्तान और चीन जैसे घनी आबादी वाले देशों के लिए यह जानकारी खासतौर पर अहम मानी जा रही है, क्योंकि सक्रिय मानसून पैटर्न का सीधा असर खेती, जलस्तर, बाढ़ की आशंका और आम जनजीवन पर पड़ सकता है।
फिलहाल सैटेलाइट से मिल रही तस्वीरें मौसम विज्ञानियों को इस विशाल सिस्टम की गतिविधियों को बेहतर ढंग से समझने और आगे की चेतावनी जारी करने में मदद कर रही हैं, ताकि संबंधित इलाकों में समय रहते जरूरी एहतियात बरते जा सकें।
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