
इस्लामाबाद/बीजिंग। भारत को घेरने और अपनी समुद्री राह आसान करने के मकसद से चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर में अरबों डॉलर की लागत से जिस बंदरगाह का निर्माण शुरू किया था, अब वही प्रोजेक्ट उसके लिए बोझ बन गया है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ये महत्वाकांक्षी परियोजना अब लगभग डूबने की कगार पर है। एक समय था जब इसे चीन के लिए ‘खतरनाक’ मलक्का जलडमरूमध्य को बायपास करने का सबसे कारगर समुद्री शॉर्टकट माना जाता था, लेकिन अब यह गहरे समुद्र वाला बंदरगाह भू-राजनीतिक संपत्ति के बजाय आर्थिक और सुरक्षा के लिहाज से बोझ में बदलता जा रहा है।
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चीन का ग्वादर से मोहभंग
ग्वादर बंदरगाह का मुख्य मकसद चीन के जमीन से घिरे पश्चिमी प्रांत शिनजियांग को सीधे अरब सागर से जोड़ना था, लेकिन जिस भौगोलिक और भू-राजनीतिक इलाके से यह व्यापारिक मार्ग गुजरता है, वह इसे दुनिया के सबसे खतरनाक लॉजिस्टिक गलियारों में से एक बना देता है।

शिनजियांग से ग्वादर तक सामान पहुंचाने के लिए ट्रकों के काफिलों को काराकोरम हाईवे से गुजरना पड़ता है, जो 4,600 मीटर से भी ज्यादा की ऊंचाई पर स्थित है। यहां भूस्खलन, हिमस्खलन और बेहद खराब मौसम की चुनौती लगातार बनी रहती है। ऐसे में यह रास्ता भारी मात्रा में कंटेनर और माल ढोने के लायक ही नहीं है।
पहाड़ों के बाद हिंसा प्रभावित इलाके
ऑस्ट्रेलिया के थिंक टैंक लोवी इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में विश्लेषक जयदीप साइकिया ने लिखा है कि, पहाड़ों को पार करने के बाद यह मार्ग गिलगित-बाल्टिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान से होकर गुजरता है। इन इलाकों में जबरदस्त सांप्रदायिक हिंसा, तालिबान की गतिविधियां और गहरा स्थानीय विद्रोह है। बलूच विद्रोहियों के निशाने पर चीनी नागरिक और चीनी निवेश हमेशा से रहे हैं।
BLA के हमलों ने बढ़ाई मुश्किल
आपको बता दें कि, ग्वादर पाकिस्तान के सबसे अशांत प्रांत बलूचिस्तान में स्थित है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) और अन्य विद्रोही समूह CPEC को अपने प्राकृतिक संसाधनों के साम्राज्यवादी शोषण के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि, चीनी इंजीनियरिंग यूनिट्स, काफिले और बुनियादी ढांचा आत्मघाती धमाकों और गुरिल्ला हमलों के मुख्य निशाने पर आ गए हैं।
बताया जाता है कि BLA की मजीद ब्रिगेड चीनी इंजीनियरों और काफिलों पर आत्मघाती हमले कर रही है। पाकिस्तान की विशेष सुरक्षा व्यवस्था भी चीनी नागरिकों को पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख पा रही, जिससे बीजिंग में नाराजगी और चिंता है। साइकिया के मुताबिक, बीएलए के हमलों ने पाकिस्तान को ‘स्पेशल सिक्योरिटी डिवीजन’ (SSD) बनाने पर मजबूर किया, लेकिन यह डिवीजन भी चीनी इंफ्रास्ट्रक्चर को अलग-अलग खतरों से पूरी तरह बचाने में नाकाम रहा है।
महंगा सौदा साबित हो रहा कारोबार
समुद्री रास्ते की तुलना में पाइपलाइन और जमीनी मार्ग से माल ढुलाई कहीं ज्यादा महंगी पड़ती है। ग्वादर से शिनजियांग तक हजारों किलोमीटर के पहाड़ी इलाके में तेल को ऊपर की ओर पंप करने के लिए भारी ऊर्जा की जरूरत होगी, जिससे इस रास्ते की व्यावसायिक व्यवहार्यता ही खत्म हो जाती है।

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के दुर्गम इलाकों से गुजरने वाली करीब 3,000 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन या रेलवे को सुरक्षित रखना लगभग नामुमकिन है। यह हमलावरों के लिए आदर्श ठिकाना बन सकता है। इतना ही नहीं, अगर तेल ग्वादर पहुंच भी जाए, तो टैंकरों को हिंद महासागर से गुजरना होगा, जहां भारतीय नौसेना का दबदबा है।
पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था
CPEC को सहारा देने वाला आर्थिक ढांचा भी मूल रूप से कमजोर बताया गया है। पाकिस्तान ‘बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स’ के ऐसे संकट में फंसा है, जो उसकी अर्थव्यवस्था की बनावट से जुड़ा है। इससे निपटने के लिए वह बार-बार IMF की आर्थिक मदद और चीन से कर्ज चुकाने में राहत पर निर्भर रहता है।
91% कमाई की शर्त
मौजूदा 40 साल की लीज के तहत ग्वादर बंदरगाह की कमाई का 91 फीसदी हिस्सा चीन को मिलना है, लेकिन बंदरगाह न के बराबर कमाई हो रही है, इसलिए चीन को कोई रिटर्न नहीं मिल रहा। उलटे उसे अपनी फंसी हुई संपत्तियों की सुरक्षा पर भारी खर्च करना पड़ रहा है। इसके अलावा कोविड संकट के बाद से चीन खुद आर्थिक दबाव में है और ज्यादा जोखिम वाले मेगा प्रोजेक्ट्स से बचना चाहता है।
चुपचाप पीछे हट सकता है चीन
लोवी इंस्टीट्यूट के लेख के मुताबिक, ग्वादर अब निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है। पाकिस्तान इसकी सुरक्षा और रखरखाव का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं है, जबकि चीन अपनी पूंजी और नागरिकों की जान को और दांव पर नहीं लगाना चाहता।
लेख में कहा गया है कि, यह बंदरगाह जल्द ही चीन के हाथ से निकल सकता है, जरूरी नहीं कि इसके पीछे कोई बड़ा सैन्य टकराव हो, बल्कि यह बीजिंग के चुपचाप पीछे हटने से भी हो सकता है। संभव है कि, चीन अपने ऑपरेशन का दायरा घटा दे और ग्वादर को बड़े कमर्शियल मेगा-पोर्ट से बदलकर एक छोटे, भारी सुरक्षा वाले नौसैनिक रीफ्यूलिंग स्टेशन का रूप दे दे, या नुकसान कम करने के लिए लीज की शर्तों में बदलाव कर ले।
विश्लेषक के अनुसार भूगोल और अर्थशास्त्र ने ग्वादर को एक ऐसे भू-राजनीतिक भ्रम के रूप में उजागर कर दिया है, जो लंबे समय तक टिकने वाला नहीं है।
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