निमंत्रण के बावजूद भारत से दूरी, क्या BNP की पुरानी नीति पर हैं तारिक रहमान?

नई दिल्ली। भारत की तरफ से बार-बार निमंत्रण दिए जाने के बावजूद बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की दिल्ली यात्रा को लेकर अब तक कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला है। दूसरी तरफ, वे दूसरे देशों को दौरों को लेकर लगातार सक्रिय हैं। खबर है कि, रहमान अक्टूबर और नवंबर में जापान, सऊदी अरब और तुर्की की यात्रा पर जाने वाले हैं। पड़ोसी देश के नए नेतृत्व की यह प्राथमिकता सूची कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।

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पहले मलेशिया, फिर चीन, अब न्यूयॉर्क

प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद रहमान ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए 21-22 जून को मलेशिया को चुना। इसके बाद वे चीन गए। हाल ही में वे न्यूयॉर्क में थे, जहां उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया। यानी अब तक की उनकी विदेश यात्राओं की सूची में दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन और संयुक्त राष्ट्र का मंच शामिल है, लेकिन भारत का नाम नहीं है।

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भारत-बांग्लादेश संबंधों पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि, नवंबर-दिसंबर में रहमान के भारत दौरे की संभावना पर काफी चर्चा है। हालांकि, अभी तक कोई तारीख तय नहीं हुई है और न ही दोनों देशों की ओर से आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि की गई है। कूटनीति में तारीख तय होने से पहले की चर्चाएं अक्सर अटकलों तक ही सीमित रह जाती हैं।

ब्रिक्स सम्मेलन में भी नहीं पहुंचे

भारत में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में रहमान की गैर-मौजूदगी ने भी ध्यान खींचा। भारत ने उन्हें ‘बहुक्षेत्रीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल’ (बिम्सटेक) के अध्यक्ष की हैसियत से सम्मेलन में शामिल होने का न्योता दिया था। यह निमंत्रण अपने आप में एक बहुपक्षीय मंच के जरिए संवाद का रास्ता खोलने की कोशिश थी। इतना ही नहीं, फरवरी से ही उन्हें एक अलग द्विपक्षीय निमंत्रण भी भेजा जा चुका है। यानी नई दिल्ली ने एक नहीं, दो-दो रास्ते खुले रखे, फिर भी ढाका की ओर से अब तक कोई ठोस जवाब नहीं आया।

क्या पुरानी बीएनपी नीति पर लौट रहे हैं रहमान

राजनयिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि, क्या रहमान बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की परंपरागत विदेश नीति को ही आगे बढ़ा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि, बीएनपी की परंपरागत रणनीति भारत को दरकिनार कर अलग-अलग बाहरी शक्तियों से संबंध मजबूत करने की रही है। मौजूदा यात्राओं का पैटर्न इसी दिशा की ओर इशारा करता दिख रहा है।

विश्लेषकों के मुताबिक, अतीत में इस नीति से बांग्लादेश को कोई खास फायदा नहीं हुआ है। भौगोलिक रूप से भारत तीन तरफ से बांग्लादेश को घेरता है। व्यापार, ऊर्जा, नदी जल और सीमा प्रबंधन जैसे मुद्दे सीधे नई दिल्ली से जुड़े हैं। ऐसे में पड़ोसी को नजरअंदाज कर दूर के साझेदार तलाशने की रणनीति की सीमाएं स्पष्ट हैं। इसके बावजूद ऐसा लगता है कि, रहमान बीएनपी के पारंपरिक नजरिए से बाहर निकलने के मूड में नहीं हैं।

बांग्लादेश सरकार का रुख

हालांकि, बांग्लादेश सरकार का आधिकारिक रुख इससे अलग है। विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर का कहना है कि, ढाका नई दिल्ली के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से शुरू करना चाहता है। उनके अनुसार बांग्लादेश भारत के साथ संबंधों को पुन: परिभाषित करने का इच्छुक है और आपसी हितों के आधार पर नए द्विपक्षीय संबंध बनाना चाहता है।

लेकिन सवाल यह है कि, क्या शब्द और व्यवहार में तालमेल है। कूटनीति में बयानों से ज्यादा वजन कदमों का होता है और फिलहाल बांग्लादेश का रवैया एक अलग ही कहानी बयां कर रहा है। निमंत्रणों पर चुप्पी और दूसरे देशों की यात्राओं की झड़ी, दोनों मिलकर उस आधिकारिक भाषा से मेल नहीं खाते जिसमें रिश्तों को नई शुरुआत देने की बात कही जा रही है।

शेख हसीना का मुद्दा बना तनाव की वजह

भारत-बांग्लादेश संबंधों में खटास की सबसे बड़ी वजह अगस्त 2024 के घटनाक्रम से जुड़ी है। उस समय जेन जी आंदोलन के बाद सत्ता से बेदखल हुईं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत चली आई थीं। नई दिल्ली द्वारा उन्हें शरण दिए जाने के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बना हुआ है। बांग्लादेश में एक वर्ग इसे अपने आंतरिक मामलों से जुड़े मुद्दे के रूप में देखता है, जबकि भारत के लिए यह मानवीय और रणनीतिक दोनों दृष्टि से जटिल स्थिति है।

यही पृष्ठभूमि रहमान की भारत नीति को और संवेदनशील बना देती है। घरेलू राजनीति में भारत के प्रति सख्त रुख कई बार लोकप्रिय माना जाता है, ऐसे में दिल्ली यात्रा की घोषणा में जल्दबाजी दिखाना उनके लिए राजनीतिक जोखिम भी हो सकता है। संभव है कि यही कारण हो कि ढाका फिलहाल इंतजार और नजर रखने की नीति अपना रहा है।

 नवंबर-दिसंबर पर टिकी निगाहें

अब सबकी निगाहें नवंबर-दिसंबर पर टिकी हैं। अगर रहमान इस अवधि में दिल्ली आते हैं, तो इसे दोनों देशों के रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने की शुरुआत माना जाएगा। वहीं, यदि जापान, सऊदी अरब और तुर्की के दौरों के बाद भी भारत का कार्यक्रम तय नहीं होता, तो यह संदेश जाएगा कि ढाका फिलहाल दिल्ली से दूरी बनाए रखना चाहता है। फिलहाल स्थिति यह है कि नई दिल्ली के दरवाजे खुले हैं, निमंत्रण भी भेजा जा चुका है, लेकिन ढाका दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है।

 

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