
वाशिंगटन। हर तरह से शक्तिशाली माना जाने वाला अमेरिका इन दिनों ईरान के साथ युद्ध में व्यस्त है। इस युद्ध के कई महीने तक खिंचने की वजह से अमेरिका को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं। जैसे कि, वह ईरान के आगे कमजोर पड़ रहा है, उसके युद्ध भंडार में भारी कमी आई है, लेकिन इस महाशक्तिशाली देश ने एक बार फिर सैन्य शक्ति को लेकर अपनी आर्थिक और सामरिक ताकत का लोहा मनवाया है।
इसे भी पढ़ें- क्या जंग लड़ते-लड़ते खाली होने लगा अमेरिका का हथियार भंडार? वॉशिंगटन में हड़कंप
1.15 ट्रिलियन डॉलर का बजट पेश
दरअसल, अमेरिकी संसद के निचले सदन, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने हाल ही में 1.15 ट्रिलियन डॉलर यानी करीब 111 लाख करोड़ रुपए का रिकॉर्ड रक्षा विधेयक पारित कर दिया है। यह रकम इतनी बड़ी है कि, दुनिया के करीब 178 देशों की सालाना अर्थव्यवस्था भी इसके सामने बौनी नजर आती है।
दिलचस्प, बात यह है कि, अकेला अमेरिकी रक्षा बजट भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान की पूरी जीडीपी से भी तीन गुना ज्यादा है। आखिर इतनी बड़ी रकम कहां और क्यों खर्च की जा रही है। इसका असर दुनिया की राजनीति और भारत पर किस तरह पड़ सकता है, आइए विस्तार से समझते हैं।
रिकॉर्ड बजट, बेमिसाल आंकड़े
अमेरिकी संसद द्वारा पारित इस सैन्य बजट में न सिर्फ अमेरिकी थलसेना, वायुसेना और नौसेना के आधुनिकीकरण से जुड़ी चीजें हैं, बल्कि इसमें सैनिकों के वेतन, नए हथियारों की खरीद और रिसर्च व डेवलपमेंट का भी बड़ा हिस्सा शामिल है।

इसके अलावा ईरान के साथ बढ़ते तनाव और मिडिल ईस्ट में संभावित सैन्य टकराव की आशंका को देखते हुए इसमें अरबों डॉलर की आपातकालीन राशि भी अलग से सुरक्षित रखी गई है। बजट के पारित होते ही दुनियाभर के अर्थशास्त्रियों और सैन्य विशेषज्ञों के बीच इसकी तुलना अलग-अलग देशों की अर्थव्यवस्थाओं से किए जाने का सिलसिला शुरू हो गया है।
आपको बता दें कि, दुनियाभर में करीब 195 देश हैं, जो मान्यता प्राप्त है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक के जीडीपी आंकड़ों पर गौर करें, तो इनमें से मात्र 17 देश ही ऐसे हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था ही 1.15 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार करती है। इस सूची में अमेरिका, चीन, जर्मनी, जापान, भारत, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली जैसी बड़ी आर्थिक ताकतें शामिल हैं।
दूसरे शब्दों में कहें, तो दुनिया के बाकी बचे लगभग 178 देश साल-भर में जितना उत्पादन और कमाई करते हैं, अमेरिका उससे भी ज्यादा रकम अकेले अपनी सेना और रक्षा तैयारियों पर खर्च कर रहा है। यह आंकड़ा वैश्विक आर्थिक असमानता एक ऐसी बानगी पेश कर रहा है, जो ये सोचने पर मजबूर करती हैं कि हम कहां हैं?
पाकिस्तान की पूरी GDP से तीन गुना ज्यादा
भारत के पड़ोसी देशों और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं से इस बजट की तुलना करें, तो तस्वीर निकल कर आती है वह चौंकाने वाली है। पाकिस्तान अपनी कृषि, उद्योग, आईटी और सेवा क्षेत्र को मिलाकर साल-भर में जितनी कमाई करता है, अमेरिका का रक्षा बजट उससे तीन गुना से भी अधिक है। अमेरिका का सैन्य खर्च पाकिस्तान की पूरी अर्थव्यवस्था से कई गुना आगे हैं। वैश्विक स्तर पर कुल सैन्य खर्च करीब 3.4 ट्रिलियन डॉलर आंका जाता है, जिसमें अमेरिका अकेले लगभग 40 फीसदी हिस्सेदारी रखता है। यानी दुनिया के हर दस डॉलर के सैन्य खर्च में से चार डॉलर सिर्फ अमेरिका खर्च करता है।
कहां खर्च होगी इतनी बड़ी रकम
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस विशाल बजट का इस्तेमाल अमेरिका कई अहम क्षेत्रों में करेगा। जैसे…
मिडिल ईस्ट और ईरान से जुड़ी सुरक्षा
मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्षों, लाल सागर के अहम समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और ईरान के साथ संभावित सैन्य टकराव की स्थिति के लिए आपातकालीन फंड तैयार रखा गया है।
इंडो-पैसिफिक और चीन पर नजर
ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर में बढ़ते चीन के प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिकी नौसेना और लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों का बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण किया जाएगा।
AI और हाइपरसोनिक हथियार
अगली पीढ़ी के युद्ध की तैयारी के तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ड्रोन, साइबर वारफेयर क्षमताओं और हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक में भारी निवेश करने की योजना है, जो इसी बजट से होगी।
परमाणु हथियारों का आधुनिकीकरण
अमेरिका अपने न्यूक्लियर ट्राइएड यानी पनडुब्बी, बॉम्बर और अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों को अपग्रेड करने में भी बड़ी रकम खर्च करेगा।
वैश्विक राजनीति और भारत पर असर
अमेरिका के इस रिकॉर्ड रक्षा बजट के दूरगामी असर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने के आसार हैं।
पहला: माना जा रहा है कि, अमेरिका और चीन के बीच पहले से जारी सैन्य होड़ आने वाले समय में और तेज हो सकती है। इससे वैश्विक सुरक्षा समीकरण और जटिल होने की आशंका बढ़ जाएगी।
दूसरा: मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों और खर्च में इजाफे का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों और समुद्री व्यापार मार्गों पर पड़ सकता है, जिसका खामियाजा उन देशों को भुगतना पड़ सकता है, जिनकी अर्थव्यवस्था तेल आयात पर निर्भर है। भारत के लिए यह स्थिति दोतरफा मानी जा रही है। एक तरफ जहां अमेरिका का मजबूत रक्षा-औद्योगिक आधार भारत के साथ तकनीकी सहयोग और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में मददगार साबित हो सकता है। वहीं दूसरी ओर बढ़ती वैश्विक सैन्य होड़ और तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती भी बन सकते हैं।
अमेरिका के लिए यह बजट इतना अहम क्यों
एक्सपर्ट्स का कहना है कि, अमेरिका का ये 1.15 ट्रिलियन डॉलर के सैन्य बजट का आंकड़ा केवल एक वित्तीय संख्या भर नहीं है, बल्कि इस बात का स्पष्ट संकेत भी है कि, दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अपनी सैन्य सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक निवेश करने को तैयार है।

एक तरफ जहां दुनिया के कई देश आर्थिक संकटों और सीमित संसाधनों की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। वहीं, अकेले एक देश का इतना विशाल रक्षा बजट वैश्विक शक्ति संतुलन में मौजूद गहरी खाई को उजागर करता है। मौजूदा भू-राजनीतिक हालात को देखते हुए अमेरिकी नेतृत्व अपनी सुरक्षा और सैन्य क्षमताओं को लेकर किसी तरह की ढील देने के मूड में नजर नहीं आ रहा। साथ ही ईरान के साथ अब तक कोई स्थायी समझौता न होने के कारण यह अनिश्चितता भी बनी हुई है कि आने वाले समय में यह तनाव किस दिशा में जाएगा।
नई चुनैतियां भी और अवसर भी
अमेरिका का यह रिकॉर्ड रक्षा बजट केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और भविष्य की सुरक्षा रणनीतियों की एक झलक भी है। जहां एक ओर यह अमेरिका की सैन्य और तकनीकी बढ़त को और मजबूत करेगा। वहीं दूसरी ओर यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, तेल बाजार और भारत जैसे रणनीतिक साझेदार देशों के लिए भी नई चुनौतियां और अवसर दोनों लेकर आ सकता है। आने वाले महीनों में ईरान के साथ तनाव और चीन के साथ बढ़ती होड़ यह तय करेगी कि इस विशाल रकम का असल इस्तेमाल किस दिशा में होता है।
इसे भी पढ़ें- भयानक मोड़ पर पहुंची अमेरिका-ईरान जंग, मिडिल ईस्ट के कई शहरों में बरसे बम



