
नई दिल्ली। रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने वाले भारत और चीन जैसे देशों के लिए अमेरिका से एक बड़ी और चिंताजनक खबर आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नए कड़े कानून पर दस्तखत कर दिए हैं, जिससे अब भारत पर 100% तक भारी टैरिफ (Import Duty) लगाने का खतरा मंडराने लगा है। ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ नाम के इस विधेयक के कानून बनने के साथ ही अमेरिकी प्रशासन को रूस और उसके प्रमुख तेल-गैस खरीदारों पर सख्त प्रतिबंध और टैरिफ लगाने के व्यापक अधिकार मिल गए हैं। इस फैसले ने भारत के लिए नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं, क्योंकि नई दिल्ली रूसी कच्चे तेल की सबसे बड़ी खरीदारों में शुमार है।
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क्या है कानून में
हालांकि, ये यह कानून सीधे तौर पर भारतीय सामानों पर टैरिफ नहीं थोपता, लेकिन ट्रंप प्रशासन को तय शर्तों के आधार पर ऐसा करने का कानूनी अधिकार जरूर देता है। इसके दायरे में रूसी सरकारी अधिकारी, बैंकिंग व वित्तीय संस्थान, रक्षा नेटवर्क और प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल होने वाला तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ शामिल हैं। कानून की सबसे अहम धारा राष्ट्रपति को यह शक्ति देती है कि, वे रूसी पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस के शीर्ष पांच आयातक देशों के उत्पादों पर 100% तक शुल्क लगा सकें। साथ ही, यह ईरान पर लगे मौजूदा प्रतिबंधों को अगले पांच वर्षों तक बढ़ा देता है।

आपको बता दें कि, इस कानून को अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त को 86-11 मतों से और प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को 262-159 मतों से पारित किया था, जिसके बाद इसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा गया। इस कानून का नामकरण दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर किया गया है, जो इसके प्रमुख पैरोकार थे।
भारत की बदलती तेल-खरीद रणनीति
2022 में यूक्रेन युद्ध छिड़ने से पहले भारत अपनी जरूरत का 55% से ज्यादा कच्चा तेल खाड़ी देशों से आयात करता हा, जबकि रूस की हिस्सेदारी 15 फीसदी से भी कम थी। युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से बचने के लिए रूस ने सस्ते दामों पर तेल बेचना शुरू किया और भारत ने इस मौके का भरपूर फायदा उठाया। नतीजतन आज खाड़ी देशों की हिस्सेदारी घटकर 30% से नीचे आ गई है, जबकि रूस भारत का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि, दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात का करीब आधा हिस्सा चीन गया, इसके बाद भारत की हिस्सेदारी 37%, तुर्की की 5% और यूरोपीय संघ की 5% रही। भारतीय रिफाइनरियों ने अमेरिका, ब्राजील, कनाडा, वेनेजुएला और कुछ अफ्रीकी देशों से भी आयात बढ़ाया, लेकिन रूसी तेल अब भी भारत की आयात टोकरी का एक अहम हिस्सा बना हुआ है।
विदेश मंत्रालय और भारतीय राजदूत की प्रतिक्रिया
भारत सरकार ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा है कि, उसकी ऊर्जा नीति 140 करोड़ लोगों की आबादी को सस्ती और विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने पर आधारित है। विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया है कि, हाल के महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है और भारत ने साफ तौर पर बता दिया है कि, इसका असर सिर्फ द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है। मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि, देश अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए हरसंभव कदम उठाने को तैयार है।
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने इस मुद्दे पर तर्क दिया कि, भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल और करीब आधी प्राकृतिक गैस आयात करता है, इसलिए विविध स्रोतों से खरीद करना एक बुनियादी राष्ट्रीय आवश्यकता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि, दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था और तीसरे सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश होने के बावजूद एक औसत भारतीय का ऊर्जा उपयोग वैश्विक औसत के एक-तिहाई से भी कम और एक औसत अमेरिकी नागरिक के दसवें हिस्से के बराबर है, और आगे यह जरूरत बढ़नी ही है।
यह भारत पर दबाव बनाने की कोशिश
व्यापार मामलों के जानकारों ने इस कानून को भारत को झुकाने की एक रणनीतिक कोशिश करार दिया है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक और वाणिज्य मंत्रालय के पूर्व अधिकारी अजय श्रीवास्तव ने एक बातचीत में इसे भारत पर एकतरफा शर्तों पर द्विपक्षीय व्यापार समझौता करने का दबाव बनाने वाला कदम बताया। उनके अनुसार भारत रूस से तेल इसलिए खरीदता है ताकि अपने डेढ़ अरब से ज्यादा नागरिकों को किफायती ऊर्जा मिल सके, न कि युद्ध को वित्तीय मदद पहुंचाने के लिए, और इन खरीद ने वैश्विक आपूर्ति व कीमतों को स्थिर बनाए रखने में योगदान दिया है।

उन्होंने आगाह किया कि, भारी टैरिफ से भारतीय निर्यातकों के साथ-साथ अमेरिकी उपभोक्ताओं को भी नुकसान पहुंचेगा और व्यापार में रुकावटें बढ़ेंगी। जीटीआरआई का सुझाव है कि, जब तक रूस से तेल खरीदना व्यावसायिक रूप से लाभकारी है, भारत को अमेरिकी धमकियों के दबाव में आए बिना यह सिलसिला जारी रखना चाहिए और बिना एकतरफा रियायतें दिए वॉशिंगटन से बातचीत करनी चाहिए।
अमल में लाना इतना आसान नहीं
विशेषज्ञों का मानना है कि, तत्काल भारत पर 100% टैरिफ लागू होने की आशंका नहीं है। कानून राष्ट्रपति को यह अधिकार तो देता है, लेकिन यह खुद-ब-खुद भारत या चीन पर टैरिफ नहीं थोपता। चूंकि भारत रूसी तेल का बड़ा खरीदार है, इसलिए उस पर असर अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकता है। हालांकि, चीन इस मामले में सबसे बड़ा आयातक बना हुआ है। कानून राष्ट्रपति को राष्ट्रीय हित के आधार पर छूट देने का भी विकल्प देता है, बशर्ते इसकी पुष्टि कांग्रेस को दी जाए। इसका सीधा मतलब है कि, भारत पर वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि ट्रंप प्रशासन इन नए अधिकारों का प्रयोग किस तरह, किस दर और किन उत्पादों के लिए करता है।
यूक्रेन, रूस और चीन की प्रतिक्रियाएं
यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने इस कानून का स्वागत करते हुए प्रतिबंधों को रूस पर शांति वार्ता के लिए दबाव बनाने का अहम औजार बताया। दूसरी ओर, क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने इसे ‘अमित्रवत कदम’ बताते हुए आलोचना की और रॉयटर्स के मुताबिक कहा कि अमेरिका के किसी भी नए प्रतिबंध से यूक्रेन संकट के शांतिपूर्ण समाधान की कोशिशें और जटिल हो जाएंगी।
चीन ने भी इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया दी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि, बीजिंग किसी भी ऐसे ‘लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन’ का विरोध करता है, जिसे न तो अंतरराष्ट्रीय कानून का समर्थन प्राप्त है और न ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी। उन्होंने कहा कि चीन दुनियाभर के देशों के साथ समानता और परस्पर लाभ के सिद्धांत पर सामान्य आर्थिक सहयोग करता आया है, जो किसी तीसरे पक्ष को निशाना नहीं बनाता। गौरतलब है कि चीन भारत से भी अधिक रूसी तेल खरीदता है, लेकिन उसका ज्यादातर आयात दोनों देशों की साझा सीमा से गुजरने वाली पाइपलाइनों के जरिए होता है, न कि समुद्री मार्ग से।
यह नया अमेरिकी कानून भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में अनिश्चितता की एक और परत जोड़ता है। खासकर ऐसे समय में जब दोनों देश पहले से ही एक व्यापक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं और रूसी कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता अब भी काफी अधिक बनी हुई है।
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