
भारत का सामाजिक ताना-बाना वर्तमान में एक ऐसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा है, जिसने अनगिनत परिवारों की खुशियों को निगल लिया है। हम बात कर रहे हैं ‘दहेज प्रथा’ की, जो व्यवस्था कभी माता-पिता द्वारा अपनी बेटी को आर्थिक संबल देने और उसके भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी, वह आज एक जानलेवा सौदेबाज़ी और सामाजिक अभिशाप में तब्दील हो चुकी है।
हर साल हज़ारों बेटियां इस कुप्रथा की बलि चढ़ जाती हैं और लाखों परिवार कर्ज के दलदल में धकेल दिए जाते हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि, जिस देश में नारी को शक्ति का रूप माना गया, वहां यह प्रथा इतनी विकृत और हिंसक कैसे हो गई? आइए इतिहास के पन्नों को पलटकर समझें कि स्त्रीधन की पवित्र अवधारणा से लेकर आधुनिक दहेज के खौफनाक रूप तक का यह सफर कैसे तय हुआ।
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प्राचीन काल: दहेज नहीं, स्वैच्छिक ‘स्त्रीधन’ का दौर
इतिहास और प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि, वैदिक काल (लगभग 1500-500 ईसा पूर्व) में आज जैसी जबरन मांग या लालच पर आधारित दहेज प्रथा का कोई नामो-निशान नहीं था। उस दौर में विवाह को एक पवित्र धार्मिक और सामाजिक संस्कार माना जाता था।

कन्यादान के समय वर को उपहार या वर-दक्षिणा दी जाती थी, लेकिन यह पूरी तरह से स्वैच्छिक थी। इस काल में सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था थी स्त्रीधन। विवाह के अवसर पर माता-पिता, रिश्तेदार और भाई-बहन अपनी खुशी से दुल्हन को आभूषण, वस्त्र, बर्तन या भूमि-पशु उपहारस्वरूप देते थे। यह संपत्ति पूरी तरह से महिला के निजी अधिकार में होती थी। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों में यह स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि स्त्रीधन पर पति या उसके परिवार का कोई अधिकार नहीं होगा और इसकी सुरक्षा सर्वोपरि है।
विदेशी यात्रियों जैसे मेगस्थनीज और अर्रियन के यात्रा वृत्तांत भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्राचीन भारत में विवाह के लिए कोई मूल्य चुकाने या जबरन वसूली की प्रथा नहीं थी। कई समुदायों में तो वर पक्ष द्वारा कन्या शुल्क देने का रिवाज था। कुल मिलाकर, प्राचीन काल में दिए जाने वाले उपहार बेटी की आर्थिक स्वतंत्रता के लिए थे, न कि वर पक्ष की मांग को पूरा करने के लिए।
सामाजिक प्रतिष्ठा और विकृति की शुरुआत
जैसे-जैसे समय बीता, मध्यकाल में सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य बदलने लगा। बाहरी आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता के कारण समाज में महिलाओं की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन गई। इसी दौर में पितृसत्तात्मक सोच और अधिक मजबूत हुई।
राजपूतों और उच्च कुलीन परिवारों में बेटियों के विवाह को सामाजिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक संबंधों को मजबूत करने का माध्यम माना जाने लगा। बड़े घरानों द्वारा अपनी बेटियों के साथ भारी मात्रा में धन, सोने-चांदी के गहने और सेवक भेजने की परंपरा शुरू हुई। यहीं से स्त्रीधन का मूल स्वरूप धुंधला पड़ने लगा और यह वर पक्ष को आकर्षित करने या अपनी हैसियत दिखाने के साधन में बदलने लगा। फिर भी, मध्यकाल तक यह प्रथा व्यापक नहीं थी और सामान्य वर्ग इससे काफी हद तक अछूता था।
दहेज का जन्म
भारत में आज जिस दहेज प्रथा का विभत्स रूप हम देख रहे हैं, उसकी नींव मुख्य रूप से ब्रिटिश शासनकाल में रखी गई। 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा लागू की गई इस्तमरारी बंदोबस्त और नई भू-राजस्व नीतियों ने भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे को पूरी तरह हिलाकर रख दिया।
संपत्ति अधिकारों में बदलाव
अंग्रेजों की कानून व्यवस्था के तहत जमीन का मालिकाना हक मुख्य रूप से पुरुषों के नाम दर्ज किया गया। इसके चलते महिलाओं के पारंपरिक संपत्ति अधिकार खत्म हो गए और स्त्रीधन की कानूनी ताकत कमजोर पड़ गई।
बेटी बनी आर्थिक बोझ
जब महिलाओं के पास संपत्ति का कोई अधिकार नहीं रहा, तो उन्हें परिवार पर आर्थिक बोझ माना जाने लगा। विवाह के जरिए इस बोझ को दूसरे परिवार को सौंपने के लिए वर पक्ष को नकद राशि देने की प्रवृत्ति शुरू हुई।
योग्यता का रेट कार्ड
20वीं सदी के आगमन के साथ ही शिक्षा, सरकारी नौकरियों और शहरीकरण का दौर शुरू हुआ। उच्च शिक्षित और सरकारी नौकरी वाले वरों की मांग बढ़ गई। नतीजतन, वरों की बोली लगने लगी।
‘संस्कृतीकरण’ की प्रक्रिया के तहत निम्न और मध्यम वर्गों ने भी उच्च जातियों की इस प्रथा का अनुकरण करना शुरू कर दिया। आंकड़ों के अनुसार, जहां 1920 के दशक में केवल 38% विवाहों में दहेज का लेनदेन होता था, वहीं 1975 तक यह आंकड़ा बढ़कर 88% तक पहुंच गया और दहेज की औसत राशि में तीन गुना से अधिक का उछाल आया।
कानून बने, लेकिन कुरीति नहीं रुकी
आजाद भारत में इस सामाजिक अभिशाप को खत्म करने के लिए 1961 में ‘दहेज निषेध अधिनियम’ लागू किया गया, जिसके तहत दहेज लेना और देना दोनों अपराध घोषित कर दिए गए। बाद में परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए भारतीय दंड संहिता में धारा 304B (दहेज मृत्यु) और धारा 498A (पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) जैसे कड़े प्रावधान जोड़े गए।

हालांकि, कागजी कड़ाई के बावजूद यह बीमारी समाज की जड़ों में गहराई तक फैल चुकी थी। सामाजिक सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 1960 से 2008 के बीच देश में हुए 95 प्रतिशत से अधिक विवाहों में किसी न किसी रूप में दहेज का लेनदेन जारी रहा।
समाज पर गहराता नासूर
दहेज प्रथा ने भारतीय समाज को मानसिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से गहरा जख्म दिया है। इसके दुष्परिणाम केवल एक परिवार तक सीमित न रहकर पूरे समाज को खोखला कर रहे हैं।
दहेज हत्या और प्रताड़ना
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े डरावनी तस्वीर पेश करते हैं। देश में आज भी औसतन हर दिन 15 से 20 महिलाएं दहेज की बलि चढ़ जाती हैं या फिर प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या करने पर मजबूर होती हैं।
कन्या भ्रूण हत्या और बिगड़ता लिंगानुपात
बेटी के जन्म लेते ही माता-पिता को उसके विवाह के दहेज की चिंता सताने लगती है। इसी खौफ के कारण समाज में कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा मिला, जिससे देश का लिंगानुपात गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है।
आर्थिक तबाही
अपनी बेटियों का विवाह करने के लिए गरीब और मध्यम वर्गीय माता-पिता को अपनी गाढ़ी कमाई, जमीन-जायदाद बेचनी पड़ती है या फिर साहूकारों के भारी कर्ज के जाल में फंसना पड़ता है।
घरेलू हिंसा और मानसिक तनाव
विवाह के वर्षों बाद भी जब ससुराल पक्ष की अतृप्त मांगे पूरी नहीं होतीं, तो महिलाओं के साथ मार-पीट, मानसिक उत्पीड़न और अंततः तलाक या परित्यक्ता जैसी स्थितियां बनती हैं।
व्यावसायीकरण
आज शिक्षा और पद का उपयोग दहेज का रेट बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस अधिकारियों के विवाह में करोड़ों रुपये की मांग की खबरें समाज के दोहरे चरित्र को उजागर करती हैं।
बदलाव जरूरी
कानून अपना काम कर रहा है, लेकिन केवल कानूनी डंडे से इस सामाजिक बुराई का खात्मा नहीं हो सकता। जब तक समाज की सोच में परिवर्तन नहीं आएगा, तब तक स्थितियां नहीं बदलेंगी।
इसके लिए सबसे पहले बेटियों को केवल साक्षर बनाने के बजाय उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना होगा। बेटों को यह सिखाना होगा कि दहेज मांगना उनकी योग्यता का नहीं, बल्कि उनकी अयोग्यता का प्रमाण है। युवा पीढ़ी को आगे आकर ‘दहेज-रहित विवाह’ का संकल्प लेना होगा।
इतिहास हमें सिखाता है कि जो ‘स्त्रीधन’ कभी महिला की सुरक्षा और सम्मान की ढाल था, वह लालच के कारण उसकी जान का दुश्मन बन गया। अब समय आ गया है कि हम इस प्रथा के काले इतिहास को पीछे छोड़ें और बेटियों को ‘बोझ’ नहीं, बल्कि समाज की असली ‘शक्ति’ स्वीकार करें।
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