
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर व्यापार क्षेत्र पर बड़ा हंटर चलाया है। चीन पर अमेरिका की निर्भरता कम करने के उद्देश्य से उन्होंने विदेशों से आयात किए जाने वाले ड्रोन और उनके पार्ट्स पर 100% तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया है। ट्रंप प्रशासन के इस फैसले से वैश्विक व्यापार जगत में खलबली मच गई है। खासकर उन देशों में जो अमेरिका को बड़े पैमाने पर ड्रोन और उनके कलपुर्जे निर्यात करते हैं। यह घोषणा ऐसे समय पर हुई है जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव चरम पर हैं और दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ लगातार सख्त कदम उठा रहे हैं।
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25% लगाया जायेगा टैरिफ
व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि, यह फैसला विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। बयान के मुताबिक, यह भारी टैरिफ खासतौर पर उन संवेदनशील श्रेणी के ड्रोनों पर लागू होगा जिनका वजन 25 किलोग्राम से अधिक है या जिनमें थर्मल इमेजिंग जैसी उन्नत और संवेदनशील सुरक्षा तकनीकें लगी हुई हैं।

ऐसे ड्रोन सैन्य निगरानी, सीमा सुरक्षा और संवेदनशील क्षेत्रों की जासूसी जैसे कार्यों में इस्तेमाल किए जा सकते हैं, इसलिए इन्हें अमेरिकी प्रशासन ने खतरे की श्रेणी में रखा है। हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में न आने वाले छोटे और सामान्य इस्तेमाल वाले ड्रोनों पर अपेक्षाकृत कम, यानी 25 प्रतिशत का टैरिफ लगाया जाएगा। इस तरह ट्रंप प्रशासन ने ड्रोन इंडस्ट्री को दो अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर टैरिफ की दरें तय की हैं, जिससे साफ है कि, निशाना खासतौर पर हाई-टेक और संवेदनशील ड्रोन तकनीक पर है।
असली निशाना चीन
हालांकि, यह नया टैरिफ नियम तकनीकी तौर पर दुनिया के सभी देशों से आयात होने वाले ड्रोनों पर लागू होता है, लेकिन विशेषज्ञों और व्यापार जगत के जानकारों का कहना है कि, इसका मुख्य निशाना चीन ही है। यह भारी-भरकम टैरिफ खासतौर पर उन्हीं श्रेणियों के ड्रोनों पर लगाया गया है, जिनमें चीन का लगभग एकाधिकार जैसा वर्चस्व है। यह वैश्विक मानव-रहित विमान यानी अनमैन्ड एयरक्राफ्ट बाजार पर चीन का दबदबा लंबे समय से बना हुआ है और अमेरिका इसी वर्चस्व को कोशिश कर रहा है।
आंकड़े बताते हैं कि, अमेरिका के कमर्शियल ड्रोन मार्केट में करीब 80 प्रतिशत ड्रोन सीधे चीन से ही आयात होते हैं। इतना ही नहीं, अमेरिका में हॉलीवुड की फिल्म शूटिंग से लेकर डिजिटल कंटेंट क्रिएशन, रियल एस्टेट फोटोग्राफी और कृषि क्षेत्र तक, हर जगह चीनी ड्रोन तकनीक का व्यापक इस्तेमाल हो रहा है।
इस पूरे बाजार में चीनी टेक कंपनी DJI यानी दा-जियांग इनोवेशंस की स्थिति सबसे मजबूत है। दुनियाभर के कमर्शियल ड्रोन बाजार में अकेले DJI की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से भी ज्यादा है, जो इस कंपनी को इस क्षेत्र की निर्विवाद बादशाह बनाती है। जाहिर है, अमेरिका के इस कदम से DJI समेत अन्य चीनी ड्रोन निर्माता कंपनियों को अमेरिकी बाजार में सीधी चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना
व्हाइट हाउस के बयान में यह भी स्पष्ट किया गया है कि, इन नए टैरिफ उपायों का मूल मकसद अमेरिका के अंदर ही ड्रोन और उनके कलपुर्जों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है, ताकि विदेशी सप्लाई चेन, खासकर चीन पर अमेरिका की निर्भरता को धीरे-धीरे कम किया जा सके।
अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि, रक्षा और सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील उपकरणों के लिए विदेशी आपूर्ति पर निर्भर रहना दीर्घकाल में देश के हितों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। इस नीति के तहत ज्यादातर नए टैरिफ नियम आगामी 3 सितंबर से प्रभावी होने वाले हैं, जिसके बाद अमेरिकी बाजार में इन उत्पादों की कीमतों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
चीन ने की जवाबी कार्रवाई
यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े व्यापारिक टकराव की कड़ी के रूप में सामने आया है। गौरतलब है कि, पिछले हफ्ते ही चीन ने जबरन मजदूरी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं का हवाला देते हुए, अमेरिका द्वारा लगाए गए व्यापारिक प्रतिबंधों के जवाब में अमेरिका को ड्रोन निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। इसके साथ ही चीन ने छह अमेरिकी कंपनियों को भी अपनी ब्लैकलिस्ट में डाल दिया था, जिससे इन कंपनियों का चीन के साथ किसी भी तरह का व्यापार प्रभावित हुआ।

दिलचस्प बात यह है कि, चीन ने यह सख्त कदम उस समय उठाया था, जब अमेरिका ने कुछ ही दिन पहले चीन समेत 59 अन्य देशों पर नए टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। इस तरह दोनों वैश्विक महाशक्तियों के बीच टैरिफ को लेकर एक-दूसरे को जवाब देने का सिलसिला लगातार जारी है, जिसका सीधा असर वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ रहा है।
भारत के लिए अहम संकेत
इस पूरे घटनाक्रम में भारत के लिए भी कई महत्वपूर्ण संकेत छिपे हुए हैं। हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने भारत को 100 प्रतिशत टैरिफ वाली सबसे सख्त श्रेणी में शामिल नहीं किया है, लेकिन भारतीय ड्रोन निर्यातकों पर दबाव पूरी तरह कम नहीं हुआ है। दरअसल, अमेरिका भारतीय कमर्शियल और छोटे ड्रोनों पर भी 25 प्रतिशत का टैरिफ लगा रहा है, जिससे भारतीय कंपनियों को भी अमेरिकी बाजार में कुछ अतिरिक्त लागत का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि, इस स्थिति का एक सकारात्मक पहलू भी है। जानकारों का मानना है कि, अमेरिकी कमर्शियल ड्रोन बाजार में चीन का दबदबा जैसे-जैसे कमजोर होगा, वैसे-वैसे यह भारतीय ड्रोन कंपनियों के लिए एक सुनहरा अवसर साबित हो सकता है। ideaForge, Drone Acharya और Garuda Aerospace जैसी उभरती भारतीय ड्रोन निर्माता कंपनियों के पास अब अमेरिकी बाजार में अपने पैर मजबूती से जमाने का बेहतर मौका होगा।
अगर ये कंपनियां इस अवसर का सही तरीके से फायदा उठा पाईं, तो आने वाले समय में भारत वैश्विक ड्रोन उद्योग में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनकर उभर सकता है, और अमेरिका-चीन के इस व्यापारिक टकराव से भारत को दीर्घकालिक फायदा भी मिल सकता है।
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