क्रूड ऑयल ने दिखाए तेवर, 100 डॉलर पार पहुंचा दाम, जेब पर पड़ सकता है असर

 नई दिल्ली। देश की जनता पर एक बार फिर से बड़ा बोझ पड़ने की आशंका गहरा गई है। भारत के लिए पेट्रोल का अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क प्राइस इस महीने बढ़कर 133.05 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर जा पहुंच गया है, जो बीते 50 महीनों में सबसे ऊंचा आंकड़ा है। बता दें कि यह वही कीमत है, जिस पर भारत विदेशी बाजारों से पेट्रोल खरीदता है, और इसमें आई यह उछाल घरेलू बाजार के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।

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भारत पर क्यों पड़ता है सीधा असर

देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत अपनी खपत का 85% से भी अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में जब भी वैश्विक बाजार में कच्चे तेल या पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है, तो उसका सीधा और तत्काल असर भारतीय बाजार पर पड़ने लगता है। मौजूदा हालात में स्थिति और गंभीर होती जा रही है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर चुकी हैं।

Crude oil

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तेजी के पीछे कई भू-राजनीतिक कारण जिम्मेदार हैं। मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव, सऊदी अरब की एक प्रमुख पाइपलाइन का बंद होना और वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम माने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते सप्लाई में आ रही रुकावटें ये सभी क्रूड आयल के महंगे होने की असली वजह हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन मार्गों में गिना जाता है और इसमें किसी भी तरह की रुकावट सीधे तौर पर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करती है।

क्या कहते हैं आंकड़े

उपलब्ध आंकड़ों पर नजर डालें, तो 1 सितंबर से 18 सितंबर के बीच पेट्रोल की रोजाना औसत कीमत, अगस्त महीने की औसत कीमत यानी 110.87 डॉलर प्रति बैरल की तुलना में करीब 20 प्रतिशत ज्यादा दर्ज की गई है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि, इसने मई महीने में दर्ज हुए 129.63 डॉलर प्रति बैरल के पिछले उच्च स्तर को भी पीछे छोड़ दिया है।

गौरतलब है कि, मई में जब कीमतें इस स्तर पर पहुंची थीं, तब सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों को मजबूरन एक ही महीने के भीतर चार बार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी करनी पड़ी थी। ऐसे में मौजूदा हालात को देखते हुए एक बार फिर वैसी ही स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है।

सरकारी तेल कंपनियों को हो रहा भारी नुकसान

अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई इस अप्रत्याशित तेजी का सबसे ज्यादा असर सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के मुनाफे पर पड़ रहा है। लेकिन रिटेल बिक्री के मोर्चे पर इन कंपनियों को लगातार नुकसान झेलना पड़ रहा है। बाजार के जानकारों की मानें, तो मौजूदा समय में इन कंपनियों को पेट्रोल की बिक्री पर करीब 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल की बिक्री पर करीब 20 रुपये प्रति लीटर तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि, कंपनियां फिलहाल अपनी जेब से यह अतिरिक्त लागत वहन कर रही हैं, ताकि उपभोक्ताओं पर सीधा बोझ न पड़े।

उधर, डीजल के दामों का भी यही हाल है। जानकारों का कहना है कि, डीजल की औसत रोजाना बेंचमार्क कीमत बढ़कर 167.08 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंच चुकी है, जो पिछले चार महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। हालांकि, राहत की बात यह है कि, यह आंकड़ा अभी भी अप्रैल 2026 में दर्ज हुए 187.92 डॉलर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर से नीचे बना हुआ है।

आम उपभोक्ता कैसे होंगे प्रभावित

सोमवार, 21 सितंबर को देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें फिलहाल स्थिर बनी हुई हैं और उपभोक्ताओं को राहत मिली हुई है। लेकिन बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि, यह राहत ज्यादा समय तक टिकने वाली नहीं दिख रही। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में मौजूदा तनाव और आपूर्ति संबंधी बाधाएं ऐसे ही जारी रहती हैं, तो आने वाले दिनों में आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की रिटेल कीमतों में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है। तेल मार्केटिंग कंपनियां कब तक अपने स्तर पर यह नुकसान झेलती रहेंगी, यह देखने वाली बात होगी।

महंगाई पर भी पड़ेगा असर

कच्चे तेल की कीमतों में हो रही यह बढ़ोतरी सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा किए गए एक शोध के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होने पर देश की मुख्य मुद्रास्फीति यानी हेडलाइन इन्फ्लेशन में लगभग 49 बेसिस पॉइंट्स तक का इजाफा हो सकता है। यह आंकड़ा बताता है कि, तेल की कीमतों और महंगाई के बीच सीधा संबंध है।

Crude oil

दरअसल, जब भी पेट्रोल-डीजल महंगा होता है, तो इसका सबसे पहला असर ट्रांसपोर्टेशन लागत पर पड़ता है। माल ढुलाई महंगी होने से बाजार तक पहुंचने वाली हर वस्तु के दामों में बढ़ोत्तरी हो सकती है। इसका सीधा नतीजा यह होता है कि, फल, सब्जियां और रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली तमाम जरूरी वस्तुएं भी महंगी हो जाती हैं। यानी अगर पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर सीधे आम आदमी की रसोई और घरेलू बजट पर पड़ना तय है।

हालात सामान्य न हुए, तो होगी मुश्किल

फिलहाल, सरकार और तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और वैश्विक आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं को देखते हुए आने वाले हफ्तों में कीमतों की दिशा तय होगी। यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो आम उपभोक्ताओं को अपनी जेब पर अतिरिक्त बोझ उठाने के लिए तैयार रहना पड़ सकता है।

 

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