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फिर सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर 134 साल पुराना कावेरी विवाद, तमिलनाडु ने मांगा पानी

नई दिल्ली। भारत के दो प्रमुख दक्षिणी राज्यों तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच दशकों पुराना कावेरी जल विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। दरअसल, तमिलनाडु सरकार ने कावेरी नदी से अपने हिस्से का पानी छोड़े जाने की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायलय का दरवाजा खटखटाया है। 17 अगस्त को इस संवेदनशील मुद्दे पर सुनवाई हुई, जिसमें कोर्ट ने दोनों राज्यों से आंकड़ों सहित विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि, इस पुराने और जटिल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट आगे किस तरह का रुख अपनाता है, क्योंकि कर्नाटक और तमिलनाडु लंबे समय से कावेरी जल के मुद्दे को लेकर आमने सामने हैं।

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ताजा विवाद की वजह

गौरतलब है कि, कावेरी जल विनियमन समिति ने कर्नाटक सरकार को यह निर्देश दिया था कि, वह बीते 29 जुलाई से लगातार 15 दिनों तक प्रतिदिन 3500 क्यूसेक पानी तमिलनाडु के लिए छोड़े, लेकिन यह निर्देश अमल में नहीं लाया जा सका, जिसके बाद तमिलनाडु सरकार ने न्याय की उम्मीद में सर्वोच्च अदालत का सहारा लिया।

Cauvery water dispute

इस ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर उस पुराने सवाल को हवा दे दी है कि, आखिर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच यह कावेरी जल विवाद शुरू कहां से हुआ था और यह अब तक क्यों नहीं सुलझ पाया है।

सबसे पुराने अंतरराज्यीय विवादों में शुमार

कावेरी जल विवाद भारत के सबसे पुराने और सबसे जटिल अंतरराज्यीय जल विवादों में गिना जाता है। यह मुख्य रूप से कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच का मामला है। हालांकि, केरल और पुडुचेरी भी कावेरी बेसिन में हिस्सेदार राज्यों में शामिल हैं। इस विवाद का मूल प्रश्न यह है कि, नदी के पानी में किस राज्य का कितना हिस्सा होना चाहिए और खासतौर पर सूखे के समय इस सीमित पानी का बंटवारा किस तरह किया जाए।

कावेरी नदी का उद्गम कर्नाटक के कोडगु जिले में स्थित पश्चिमी घाट से होता है। यहां से बहती हुई यह नदी कर्नाटक से होकर तमिलनाडु में प्रवेश करती है। अंततः बंगाल की खाड़ी में जाकर मिल जाती है। तमिलनाडु के डेल्टा क्षेत्र में धान की खेती पूरी तरह कावेरी के पानी पर निर्भर है, जबकि दूसरी तरफ कर्नाटक अपने सिंचाई क्षेत्रों, बेंगलुरु शहर की पेयजल जरूरतों और नई जलाशय परियोजनाओं का हवाला देता है। यह विवाद केवल पानी बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें खेती, पेयजल आपूर्ति, मानसून की अनिश्चितता, पर्यावरण संरक्षण, संघीय ढांचे और क्षेत्रीय राजनीति जैसे कई पहलू भी गहराई से जुड़े हुए हैं।

अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है विवाद

कावेरी जल बंटवारे को लेकर सबसे पुराने समझौते ब्रिटिश शासनकाल के दौरान हुए थे। उस समय मैसूर रियासत आज के कर्नाटक के बड़े भूभाग को नियंत्रित करती थी, जबकि मद्रास प्रेसीडेंसी आज के तमिलनाडु के अधिकांश हिस्से पर शासन करती थी। इस दिशा में पहला बड़ा समझौता वर्ष 1892 में हुआ, जिसके तहत मैसूर को कावेरी की सहायक नदियों पर नई सिंचाई परियोजनाएं शुरू करने से पहले मद्रास प्रशासन से सहमति लेनी अनिवार्य थी।

कर्नाटक हमेशा से यह तर्क देता आया है कि, यह समझौता एकतरफा और असंतुलित था, क्योंकि उस दौर में ऊपरी तटवर्ती क्षेत्र के हितों को उचित महत्व नहीं दिया गया। इसके बाद दूसरा और अधिक चर्चित समझौता 1924 में हुआ, जिसे 50 वर्षों के लिए मान्य किया गया था। इस समझौते के तहत मैसूर को कृष्णराज सागर बांध बनाने की अनुमति मिली, जबकि मद्रास को मेट्टूर बांध जैसी बड़ी परियोजनाओं की मंजूरी दी गई। वर्ष 1974 के आसपास इस समझौते की अवधि समाप्त हो गई, जिसके बाद यह विवाद और अधिक तेज होता चला गया।

क्या है विवाद का मुख्य मुद्दा 

इस पूरे विवाद की जड़ में भौगोलिक स्थिति भी एक बड़ी भूमिका निभाती है। कर्नाटक नदी के ऊपरी हिस्से में स्थित होने की वजह से बांधों और जलाशयों के माध्यम से पानी को रोकने की क्षमता रखता है, जबकि तमिलनाडु नदी के निचले हिस्से में होने के कारण अपनी सिंचाई और डेल्टा क्षेत्र की जरूरतों के लिए समय पर पानी की उपलब्धता पर निर्भर रहता है। अच्छे मानसून वाले वर्षों में यह तनाव अपेक्षाकृत कम देखने को मिलता है, लेकिन जब मानसून कमजोर रहता है या जल-प्रवाह कम होता है, तो यह विवाद और गहरा जाता है।

 दोनों देशों के अपने-अपने तर्क

तमिलनाडु का मुख्य पक्ष यह है कि, कावेरी डेल्टा क्षेत्र में लाखों किसानों की आजीविका इस नदी पर पूरी तरह निर्भर है और धान जैसी फसलों को तय मौसम में ही पानी की आवश्यकता होती है। उसका कहना है कि, देर से छोड़ा गया पानी फसलों के लिए उतना उपयोगी साबित नहीं होता। कर्नाटक द्वारा पानी रोके जाने से निचले क्षेत्रों के खेत, भूजल स्तर और डेल्टा की पारिस्थितिकी पर गंभीर असर पड़ता है।

Cauvery water dispute

वहीं दूसरी ओर कर्नाटक का तर्क है कि पुराने समझौते उस दौर में किए गए थे जब उसकी सिंचाई और शहरी विकास संबंधी जरूरतें काफी सीमित थीं। अब राज्य की आबादी काफी बढ़ चुकी है और बेंगलुरु जैसे बड़े महानगर की पेयजल जरूरतें भी बहुत अधिक हो गई हैं। कर्नाटक का यह भी कहना है कि, पानी के वास्तविक प्रवाह, जलाशयों की स्थिति और वर्षा के आधार पर ही निर्णय लिया जाना चाहिए।

 सुप्रीम कोर्ट का फैसला

केंद्र सरकार ने वर्ष 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया था, जिसने कई वर्षों की सुनवाई के बाद 2007 में अपना फैसला सुनाया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इस फैसले में कुछ संशोधन करते हुए कर्नाटक के हिस्से को बढ़ाया और तमिलनाडु के हिस्से में मामूली कटौती की। संशोधित व्यवस्था के अनुसार कर्नाटक को 284.75 टीएमसी, तमिलनाडु को 404.25 टीएमसी, केरल को 30 टीएमसी और पुडुचेरी को 7 टीएमसी पानी आवंटित किया गया।

मेकेदातु परियोजना बनी नये विवाद की वजह

इस पूरे विवाद में एक नया आयाम कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना ने जोड़ दिया है। कर्नाटक इसे बेंगलुरु की पेयजल और बिजली जरूरतों के लिए आवश्यक बताता है, जबकि तमिलनाडु को आशंका है कि, इससे कावेरी का स्वाभाविक प्रवाह प्रभावित हो सकता है। यही मतभेद अब मेकेदातु मुद्दे को भी व्यापक कावेरी विवाद का एक अहम हिस्सा बना चुका है, जो आने वाले समय में दोनों राज्यों के बीच तनाव का एक और कारण बन सकता है।

 

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