
पाकिस्तान। एक बार फिर से जंग की चपेट में आ चुका मध्य-पूर्व ड्रोन और मिसाइलों की गड़गड़ाहट से दहल रहा है। ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव ने न केवल खाड़ी देशों, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा समीकरणों को हिला कर रख दिया है। इस महायुद्ध की आग के बीच पाकिस्तान एक ऐसी धुरी पर खड़ा है, जहां उसके एक तरफ इस्लामिक ब्रदरहुड और पड़ोसी होने का दावा करने वाला ईरान है, तो दूसरी तरफ उसका सबसे बड़ा आर्थिक मददगार और रणनीतिक साझेदार सऊदी अरब।
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तेज हुई हलचल
रियाद में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर की हालिया मुलाकात ने वैश्विक कूटनीति के गलियारों में हलचल तेज कर दी है। ईरान की ओर से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ रियाद पहुंचे। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को यह भरोसा दिलाना था कि, संकट की इस घड़ी में पाकिस्तान उनके साथ चट्टान की तरह खड़ा है।

मुलाकात के दौरान शहबाज शरीफ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि, सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा पाकिस्तान के लिए सर्वोपरि है। उन्होंने क्राउन प्रिंस से कहा, इस्लामाबाद मुश्किल समय में किंगडम के साथ मजबूती से खड़ा रहेगा। हम क्षेत्र में शांति की बहाली के लिए आपके साथ मिलकर हर संभव प्रयास करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब ईरान ने न केवल सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया है, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य को भी बंद कर दिया है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति ठप होने का खतरा पैदा हो गया है।
एक हफ्ते में दूसरी बार हुआ दौरा
शहबाज शरीफ की इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर की उपस्थिति रही। असीम मुनीर एक हफ्ते के भीतर दूसरी बार रियाद पहुंचे हैं, जो इस बात की तरफ इशारा करे रहा है कि चर्चा केवल कूटनीतिक नहीं है, बल्कि सैन्य और रणनीतिक भी है।
स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट लागू करने का दबाव
गौरतलब है कि, पिछले साल यानी 2025 के सितंबर महीने में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट हुआ था। इस समझौते की सबसे बड़ी शर्त यह है कि, अगर सऊदी अरब पर हमला होता है तो वह हमला पाकिस्तान पर माना जाएगा। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब अब पाकिस्तान पर इस समझौते को पूरी तरह से लागू करने और ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में शामिल होने का दबाव बना रहा है। सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान ने सोशल मीडिया पर संकेत दिया है कि पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग को एक्टिवेट कर दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह निकाला जा रहा है कि, पाकिस्तान की सेना को सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए तैनात किया जा सकता है।
एक तरफ जहां सऊदी अरब पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ ईरान ने उसे गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेदेश्कियन ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से फोन पर बातचीत के दौरान स्पष्ट कहा था कि, यह युद्ध जायोनी शासन यानी इजरायल और अमेरिका की साजिश की वजह से हो रहा है।
ईरान ने पाकिस्तान को किया आगाह

पेदेश्कियन ने शहबाज शरीफ से कहा था कि, इस युद्ध को खत्म करने का एकमात्र रास्ता है कि ईरान के वैध अधिकारों को मान्यता दी जाए, उसे इस युद्ध में हुए नुकसान का हर्जाना दिया जाए और भविष्य में किसी भी हमले के खिलाफ मजबूत अंतरराष्ट्रीय गारंटी दी जाए। ईरान ने पाकिस्तान को आगाह किया है कि, अगर वह सऊदी अरब के पक्ष में युद्ध में शामिल होता है, तो इसके नतीजे उसके लिए विनाशकारी साबित होंगे। आपको बता दें कि, पाकिस्तान इस समय कांटों की सेज पर बैठा है। एक तरफ ईरान उसे धमका रहा है, तो दूसरे तरफ सऊदी अरब उस पर स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट को लागू करने का दबाव बना रहा है। उधर, शहबाज शरीफ सरकार और पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व किसी भी हाल में ईरान के साथ सीधा युद्ध नहीं करना चाहता है। इसके पीछे कई कारण हैं।
सांप्रदायिक संतुलन
दरअसल, पाकिस्तान में एक बड़ी संख्या में शिया आबादी है, जो ईरान को सपोर्ट करती है। ऐसे में ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल होने से देश आंतरिक अशांति फैल सकती है।
सीमा सुरक्षा
पाकिस्तान इस समय अफगानिस्तान सीमा पर तालिबान और टीटीपी से जूझ रहा है। ऐसे में ईरान के साथ नई मोर्चाबंदी उसकी सेना के लिए घातक साबित हो सकती है।
आर्थिक संकट
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अभी भी वेंटिलेटर पर है। वहां खाने के लाले हैं, ऐसे में एक और युद्ध का खर्च उठाना उसके बस की बात नहीं है।
इन्हीं सब वजहों से पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार और आर्मी चीफ लगातार अरब देशों के संपर्क में हैं और युद्ध को टालने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। ये सब करके पाकिस्तान खुद को एक मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है, लेकिन सऊदी अरब का सख्त रुख और ईरान के मिसाइल हमले पाकिस्तान के इस प्रयास को धराशायी करने में लगे हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद होने से बड़ी चिंता
इधर, ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने के निर्णय ने दुनिया भर की चिंताएं बढ़ा दी हैं। यह समुद्री रास्ता दुनिया के कुल तेल व्यापार के एक-तिहाई हिस्से का मार्ग है। इसके बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, जिसका सबसे बुरा असर पाकिस्तान जैसे विकासशील देशों पर पड़ रहा है। ऐसे में अगर यह तनाव और बढ़ा तो पाकिस्तान में महंगाई का एक ऐसा तूफान आएगा जिसे संभालना शहबाज सरकार के लिए न ना मुमकिन हो जायेगा और अंतर्कलह बढ़ जाएगी।
रियाद से जो बयान जारी किए गए हैं, उनमें घनिष्ठ समन्वय और शांति सुनिश्चित करने की बात कही गई है, लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई यह है कि, पाकिस्तान को अब एक बहुत बड़ा फैसला लेना होगा। क्या वह सऊदी अरब के भारी निवेश और कर्ज के बदले अपनी सेना को इस युद्ध की आग में झोंकेगा या वह ईरान की धमकियों के आगे झुककर अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद दोस्त सऊदी अरब को अकेला छोड़ देगा?
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