मिडिल ईस्ट वॉर से बढ़ा तेल संकट, राज्यसभा में बोले एस. जयशंकर- ‘ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि’

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला कर रख दिया है। तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिसका भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर गहरा असर पड़ रहा है। इसी संकट के बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को राज्यसभा में एक महत्वपूर्ण बयान दिया, जिसमें उन्होंने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल कीमतों में वृद्धि को लेकर लापरवाही भरा रुख अपनाया है। ट्रंप ने कहा था कि, अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो बढ़ने दें, उनकी मुख्य प्राथमिकता युद्ध जीतना है।

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ऐसे में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के इस बयान को सुनकर ट्रंप को मिर्ची लग सकती है, क्योंकि भारत ने स्पष्ट रूप से ऊर्जा संकट को गंभीर चिंता का विषय बताया है और नागरिकों पर इसका न्यूनतम असर सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।

28 फरवरी को ईरान पर हुआ था हमला

उल्लेखनीय है कि गत 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य हमले किया। इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। इसके जवाब में ईरान ने मिडिल ईस्ट में स्थित कई अमेरिकी ठिकानों और इजरायल पर हमले तेज कर दिए। इस संघर्ष में होर्मुज जलडमरूमध्य भी प्रभावित हो रहा है।

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आपको बता दें कि, वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। वहीं भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है, और इसमें से आधा से ज्यादा होर्मुज जलडमरूमध्य से आता है।  संघर्ष शुरू होने के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़ीं और 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि, अगर यह संकट लंबा खिंचा, तो कीमतें 90 डॉलर या उससे ऊपर भी जा सकती हैं। इससे भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ेंगी, मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ेगा, रुपये पर असर पड़ेगा और व्यापार घाटा गहरा सकता है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, जहाजों की बीमा लागत में वृद्धि और शिपिंग रूट्स की अनिश्चितता ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।

स्थिति पर नजर बनाए है भारत

इन मुद्दों पर राज्यसभा में बयान देते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि, पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां से लंबे समय से तेल और गैस की बड़ी आपूर्ति होती रही है। उन्होंने स्पष्ट किया, क्षेत्र कई महत्वपूर्ण तेल और गैस आपूर्तिकर्ताओं का घर है। आपूर्ति में गंभीर व्यवधान और अस्थिरता का माहौल गंभीर चिंता का विषय है। जयशंकर ने जोर दिया कि सरकार की प्राथमिकता ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है, ताकि भारतीय नागरिकों पर इसका नकारात्मक प्रभाव कम से कम पड़े।

उन्होंने कहा, भारतीय उपभोक्ता की भलाई हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी। हम ऊर्जा बाजार में उपलब्धता, लागत और जोखिमों को संतुलित रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि संघर्ष के कारण ऊर्जा कीमतों में वृद्धि हुई है, लेकिन सरकार सतर्क है और बाजार के जोखिमों पर नजर रख रही है। विदेश मंत्री ने शांति की अपील भी की। उन्होंने सभी पक्षों से संवाद, कूटनीति और डी-एस्केलेशन का रास्ता अपनाने की मांग की। संवाद और कूटनीति ही विवादों को सुलझाने का सबसे बेहतर तरीका है। हम धैर्य बनाए रखने, गतिरोध खत्म करने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील करते हैं।उन्होंने याद दिलाया कि, भारत ने पहले भी 20 फरवरी और 28 फरवरी को सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की थी।

 कीमतें बढ़ती हैं तो बढ़ने दो- ट्रंप

इसके विपरीत, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान संचालन के दौरान तेल कीमतों में वृद्धि को लेकर चिंता जताने से इनकार किया। एक साक्षात्कार में ट्रंप ने कहा, मुझे इसकी कोई चिंता नहीं है। अगर कीमतें बढ़ती हैं, तो बढ़ने दें, लेकिन यह (युद्ध) गैसोलीन की कीमतों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व से तेल निकालने से भी इनकार किया और दावा किया कि संघर्ष खत्म होने पर कीमतें तेजी से गिरेंगी।

ट्रंप की टीम ने इसे अल्पकालिक व्यवधान बताया और कहा कि ईरान के रूड शासन को खत्म करने से लंबे समय में तेल उद्योग और उपभोक्ताओं को फायदा होगा। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि तेल कीमतों में वृद्धि अमेरिका और विश्व की सुरक्षा एवं शांति के लिए बहुत छोटी कीमत है। यह रुख भारत के लिए चिंताजनक है, क्योंकि भारत ऊर्जा आयात पर निर्भर है और कीमतों में स्थिरता चाहता है। जयशंकर का बयान ट्रंप के इस लापरवाह रवैये के ठीक उलट है, जहां भारत ने उपभोक्ता हितों को प्राथमिकता दी है।

67 हजार भारतीयों को लाया गया वापस

जयशंकर ने बताया कि युद्ध ग्रस्त क्षेत्र में करीब एक करोड़ भारतीय काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा सर्वोपर है। सरकार ने 67 हजार भारतीयों को सुरक्षित वापस ला चुकी है। ईरान में कुछ हजार भारतीय पढ़ाई या रोजगार के लिए हैं और विदेश मंत्रालय ने गैर-जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दी है।

भारत ने ईरान के साथ संपर्क बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन उच्च स्तर पर संपर्क मुश्किल हो गया है। जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री से फरवरी-मार्च में बात की। गल्फ देश भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार हैं, जहां सालाना लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार होता है। इधर, विपक्ष ने राज्यसभा में नियम 176 के तहत ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर विस्तृत चर्चा की मांग की है। संसद में हंगामा हुआ, लेकिन सरकार ने स्थिति पर नजर रखने और कूटनीतिक प्रयास जारी रखने का आश्वासन दिया।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किल समय

यह संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने पर तेल कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिससे मुद्रास्फीति, आर्थिक मंदी और व्यापार प्रभावित होगा। भारत के लिए यह ऊर्जा सुरक्षा, मुद्रास्फीति नियंत्रण और राजकोषीय स्थिरता की चुनौती है।

सरकार रूसी तेल जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है, लेकिन लंबे समय तक होर्मुज पर निर्भरता बनी रहेगी। जयशंकर का बयान भारत की संतुलित विदेश नीति को दर्शाता है न कि किसी पक्ष का समर्थन। उनका ये बयान बल्कि शांति, संवाद और राष्ट्रीय हितों की रक्षा से जुड़ा है।

 

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