रिसर्च में बड़ा खुलासा, युवाओं में 50% बढ़ा कोलन कैंसर का खतरा, जानलेवा साबित हो रहा प्लास्टिक

जिस प्लास्टिक को हम सुविधा का जरिया मानते हैं। वही अब हमें  बीमार कर रहा है या यूं कहें कि वह अब हमारे लिए ‘साइलेंट किलर’ साबित हो रहा है। एक तरफ जहां चिकित्सा विज्ञान ने दुनिया भर में कई तरह के कैंसर पर लगाम कसी है, वहीं दूसरी ओर ‘कोलोरेक्टल कैंसर’ (आंत और मलाशय का कैंसर) युवाओं को तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है।

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खून और आंतों तक पहुंच रहा ‘माइक्रोप्लास्टिक

यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न कैलिफोर्निया की हालिया स्टडी ने एक डरावना सच उजागर किया है। इस शोध के अनुसार, हमारे पर्यावरण में मौजूद ‘माइक्रोप्लास्टिक’ अब हमारे खून और आंतों तक पहुंच चुके हैं, जो युवाओं में कैंसर के जोखिम को तेजी से बढ़ा रहे हैं।   विश्व स्वास्थ्य संगठन और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के हालिया आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले 20 वर्षों में 50 साल से कम उम्र के लोगों में कोलोरेक्टल कैंसर के मामलों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। अमेरिका, यूरोप और एशिया के देशों में अब यह बीमारी 20 से 40 साल के युवाओं में सामान्य होती जा रही है।

कोलन कैंसर

भारत की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। AIIMS (दिल्ली) और टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल (मुंबई) के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पिछले एक दशक में युवा मरीजों की संख्या में भारी उछाल आया है। पहले यह बीमारी 60-70 की उम्र में देखी जाती थी, लेकिन अब 25-30 साल के युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।

5 मिलीमीटर से छोटे होते हैं प्लास्टिक कण 

यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न कैलिफोर्निया की प्रोफेसर ट्रेसी जे. वुडरफ और उनकी टीम ने हजारों वैज्ञानिक अध्ययनों का गहन विश्लेषण किया है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक ‘वे प्लास्टिक कण जो 5 मिलीमीटर से छोटे होते हैं’ अब केवल कचरे के ढेरों तक सीमित नहीं हैं।

भोजन और पानी: प्लास्टिक की बोतलों में बंद पानी और माइक्रोवेव में गर्म किए गए प्लास्टिक डिब्बों का खाना।

श्वसन: हवा में मौजूद सूक्ष्म फाइबर जो सांस के जरिए फेफड़ों में जाते हैं।

समुद्री भोजन: मछलियों और अन्य समुद्री जीवों के शरीर में जमा प्लास्टिक, जो अंततः हमारे पेट तक पहुंचता है।

प्रोफेसर वुडरफ का कहना है, ये कण शरीर के अंदर जाकर ‘क्रोनिक इन्फ्लेमेशन’ पैदा करते हैं यानी लगातार रहने वाली सूजन। आंतों के अंदर ये कण माइक्रोबायोम यानी अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बिगाड़ देते हैं और हानिकारक रसायनों को रिलीज करते हैं, जिससे कैंसर कोशिकाओं के पनपने का रास्ता साफ हो जाता है।

शोध में पाया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक अब पृथ्वी के सबसे दुर्गम कोनों—अंटार्कटिका की बर्फ और समुद्र की गहराइयों तक पहुँच चुका है। मानव शरीर के भीतर, ये कण केवल आंतों तक सीमित नहीं हैं; ये मानव प्लेसेंटा (गर्भनाल), ब्रेस्ट मिल्क, लिवर और फेफड़ों में भी पाए गए हैं। हालांकि अभी तक कोई सीधा ‘कजुअल लिंक’ (कारण-प्रभाव संबंध) पूरी तरह साबित नहीं हुआ है, लेकिन पशुओं पर किए गए प्रयोगों में माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क से आंतों में ट्यूमर जैसी असामान्य वृद्धि देखी गई है।

डॉक्टरों के अनुसार, युवाओं में इस कैंसर के बढ़ने का एक बड़ा कारण लक्षणों को पहचान न पाना है। अक्सर युवा इन्हें गैस या गलत खान-पान समझकर इग्नोर कर देते हैं।

इन लक्षणों को न करें इग्नोर
  •  पेट में दर्द: बार-बार होने वाला पेट दर्द या ऐंठन।
  • मल में बदलाव: लगातार दस्त या कब्ज बने रहना या मल के आकार में बदलाव।
  • खून आना: मल त्याग के समय लाल या गहरे काले रंग का खून आना।
  • अचानक वजन कम होना: बिना किसी डाइटिंग या जिम के वजन का तेजी से गिरना।
  • अत्यधिक थकान: पर्याप्त नींद के बाद भी शरीर में कमजोरी और एनीमिया (खून की कमी)।
  • गांठ महसूस होना: पेट या आंतों के हिस्से में किसी भी प्रकार की गांठ का महसूस होना।
चेतावनी

यदि इनमें से कोई भी लक्षण 2 हफ्ते से ज्यादा बना रहे, तो इसे IBS (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम) समझकर खुद से इलाज न करें, बल्कि तुरंत कोलोनोस्कोपी की सलाह लें।  माइक्रोप्लास्टिक के अलावा, हमारी बदलती लाइफस्टाइल भी इस आग में घी डालने का काम कर रही है।

कोलन कैंसर

  • रेड मीट और प्रोसेस्ड फूड: पिज्जा, बर्गर, सॉसेज और अधिक मात्रा में लाल मांस का सेवन आंतों के स्वास्थ्य के लिए घातक है।
  • फाइबर की कमी: हमारे भोजन से फल, हरी सब्जियां और साबुत अनाज कम हो गए हैं।
  • मोटापा और निष्क्रियता: शारीरिक व्यायाम की कमी और घंटों एक जगह बैठकर काम करना।
  • नशा: धूम्रपान और शराब का अत्यधिक सेवन सीधे तौर पर आंतों की कोशिकाओं को डैमेज करता है।
  • जेनेटिक्स: लगभग 5-10 फीसदी मामलों में परिवार का इतिहास या ‘लिंच सिंड्रोम’ जैसे जेनेटिक विकार जिम्मेदार होते हैं। कैंसर विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता और शुरुआती जांच ही इस खतरे से बचने का एकमात्र रास्ता है।
  •  प्लास्टिक से तौबा: प्लास्टिक पैकेज्ड फूड और प्लास्टिक बोतलों के इस्तेमाल को न्यूनतम करें। कांच या स्टील के बर्तनों का उपयोग करें।
  • फाइबर रिच डाइट: अपने भोजन में चोकर युक्त आटा, दालें, फल और सब्जियां शामिल करें। फाइबर आंतों की सफाई करने वाले ‘झाड़ू’ की तरह काम करता है।
  • नियमित एक्सरसाइज: रोजाना कम से कम 30-45 मिनट की शारीरिक गतिविधि मोटापे को दूर रखती है।
  • स्क्रीनिंग: यदि परिवार में कैंसर का इतिहास है, तो 45 साल (या उससे पहले) स्क्रीनिंग (कोलोनोस्कोपी) जरूर कराएं।
  • पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी: प्लास्टिक के कचरे को कम करें ताकि वह खाद या पानी के जरिए वापस आपकी थाली तक न पहुंचे।

हेल्थ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि, माइक्रोप्लास्टिक का खतरा सिर्फ कैंसर तक सीमित नहीं है। यह हमारे हार्मोनल असंतुलन, इम्यून सिस्टम की कमजोरी और प्रजनन स्वास्थ्य को भी बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। USC की स्टडी ने वैश्विक स्तर पर नीति निर्माताओं से मांग की है कि माइक्रोप्लास्टिक के उत्पादन पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाएं और इस विषय पर रिसर्च के बजट को बढ़ाया जाए।

युवाओं में बढ़ता कोलन कैंसर केवल एक मेडिकल इमरजेंसी नहीं, बल्कि एक पर्यावरणीय चेतावनी है। हम जिस ‘डिस्पोजेबल’ संस्कृति में जी रहे हैं, वह अब हमारी सेहत को भी ‘डिस्पोजेबल’ बना रही है। माइक्रोप्लास्टिक के इस अदृश्य खतरे से बचने के लिए हमें अपनी जीवनशैली को वापस ‘प्रकृति’ की ओर मोड़ना होगा। याद रखें, आज का थोड़ा सा परहेज कल की बड़ी त्रासदी को टाल सकता है।

 

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