अब सिर्फ एक ब्लड टेस्ट से खुलेगा कैंसर का राज, MethylScan से जांच हुई आसान

चिकित्सा विज्ञान अब काफी तरक्की कर चुका है, पहले जहां बहुत सी बीमारियों का पता लगाना मुश्किल रहता था, लेकिन अब गंभीर से गंभीर बीमारियों को पहचानना बेहद सरल हो गया है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिल्स के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी अभूतपूर्व तकनीक विकसित की है, जो शरीर के भीतर छिपे कैंसर और अन्य घातक रोगों का शुरुआती स्तर पर ही पता लगा सकती है। यह नया लिक्विड बायोप्सी परीक्षण न केवल समय बचाएगा, बल्कि उन लाखों जिंदगियों को बचाने की उम्मीद जगाता है जो केवल इसलिए खत्म हो जाती हैं क्योंकि बीमारी का पता सही समय पर नहीं चल पाता। इस रिसर्च ने भविष्य की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक नई दिशा तय कर दी है।

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खून में तैर रहे डीएनए से होगी पहचान

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा की गई यह ऐतिहासिक रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित हुई है। शोधकर्ताओं का दावा है कि अब महज एक ब्लड सैंपल के जरिए पूरे शरीर की सेहत का सटीक आकलन किया जा सकता है।

Blood Test

चिकित्सा जगत में लंबे समय से यह चुनौती बनी हुई थी कि, कैंसर जैसी बीमारियों को उनके प्रथम चरण में कैसे पकड़ा जाए। वर्तमान में उपलब्ध अधिकांश जांचें या तो काफी महंगी हैं या फिर वे किसी एक अंग विशेष पर ही केंद्रित होती हैं। इसके अलावा, कई जांचें असुविधाजनक और दर्दनाक भी होती हैं। लेकिन UCLA की यह नई खोज इन सभी बाधाओं को पार करने की क्षमता रखती है।

इस नई और उन्नत तकनीक को “MethylScan” नाम दिया गया है। यह तकनीक खून में तैर रहे डीएनए के सूक्ष्म टुकड़ों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करती है। दरअसल, हमारे शरीर की कोशिकाएं जब नष्ट होती हैं, तो वे अपनी अनुवांशिक जानकारी खून में छोड़ देती हैं। MethylScan टेस्ट इन डीएनए टुकड़ों में मौजूद मिथाइलेशन पैटर्न को पढ़ता है। ये मिथाइलेशन पैटर्न एक तरह के केमिकल मार्कर होते हैं, जो कोशिका की स्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। एक स्वस्थ कोशिका और एक बीमार या कैंसरग्रस्त कोशिका का पैटर्न पूरी तरह अलग होता है। शोधकर्ता इसी अंतर को पहचानकर शरीर में पनप रही बीमारी का संकेत प्राप्त करते हैं।

बैकग्राउंड नॉइज की चुनौती का समाधान 

ब्लड-बेस्ड टेस्टिंग में अब तक की सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि रक्त में मौजूद अधिकांश डीएनए सामान्य और स्वस्थ कोशिकाओं का होता है। इसे वैज्ञानिकों की भाषा में बैकग्राउंड नॉइज कहा जाता है। इस शोर के बीच बीमार कोशिकाओं के संकेतों को ढूंढना वैसा ही है जैसे भूसे के ढेर में सुई तलाशना। इस चुनौती से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने एक अभिनव तरीका निकाला है, जिससे अनावश्यक डीएनए को फिल्टर करके केवल जानकारी देने वाले महत्वपूर्ण डीएनए पर ही फोकस किया जाता है। इससे न केवल जांच की सटीकता कई गुना बढ़ गई है, बल्कि जांच की लागत में भी भारी कमी आने की संभावना है।

परीक्षण के चौंकाने वाले परिणाम

इस तकनीक की विश्वसनीयता परखने के लिए 1000 से अधिक लोगों पर क्लिनिकल ट्रायल किया गया। इस समूह में कैंसर के मरीज, लिवर की बीमारियों से जूझ रहे लोग और पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति शामिल थे। डेटा के विश्लेषण के लिए एडवांस कंप्यूटर एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लिया गया। परिणामों ने वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया। टेस्ट ने लगभग 63 प्रतिशत कैंसर मामलों की सफल पहचान की। सबसे राहत की बात यह है कि शुरुआती स्टेज के आधे से ज्यादा कैंसर मामलों को इस टेस्ट ने पकड़ लिया। खासकर लिवर कैंसर के हाई-रिस्क मामलों में इस टेस्ट की सफलता दर 80 प्रतिशत तक दर्ज की गई।

अंग की पहचान भी होगी आसान

इस टेस्ट की एक और क्रांतिकारी विशेषता यह है कि, यह केवल यह नहीं बताता कि शरीर में कैंसर है, बल्कि यह भी संकेत दे सकता है कि शरीर का कौन सा अंग प्रभावित है। इससे डॉक्टरों के लिए आगे की जांच और सटीक उपचार करना बहुत आसान हो जाएगा। उन्हें अब अंधेरे में तीर नहीं चलाना पड़ेगा, बल्कि वे सीधे प्रभावित अंग पर फोकस कर सकेंगे।

Blood Test

हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तकनीक अभी शुरुआती और विकासशील चरण में है। इसे आम जनता के लिए उपलब्ध कराने से पहले अभी और अधिक व्यापक स्तर पर क्लिनिकल ट्रायल्स की आवश्यकता होगी। यदि यह तकनीक पूरी तरह सफल रहती है, तो आने वाले समय में वार्षिक हेल्थ चेकअप में केवल एक ब्लड टेस्ट के जरिए कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा टाला जा सकेगा।

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