
नई दिल्ली। स्वास्थ्य और आयुर्वेद की दुनिया में किंग ऑफ हर्ब्स के नाम से मशहूर अश्वगंधा इन दिनों चर्चा के केंद्र में है, लेकिन किसी नए फायदे की वजह से नहीं बल्कि सरकार द्वारा लगाए गए एक महत्वपूर्ण प्रतिबंध के कारण है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) और आयुष मंत्रालय ने एक संयुक्त कदम उठाते हुए अश्वगंधा की पत्तियों के व्यावसायिक उपयोग पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
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आयुर्वेद में होता है इस्तेमाल
यह फैसला उन लाखों उपभोक्ताओं के लिए एक चेतावनी की तरह है जो बिना सोचे-समझे हर्बल सप्लीमेंट्स का सेवन कर रहे हैं। हालांकि, राहत की बात यह है कि, अश्वगंधा की जड़, जिसका उपयोग सदियों से आयुर्वेद में होता आ रहा है, पूरी तरह सुरक्षित है और उस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। इस आदेश के बाद अब वेलनेस इंडस्ट्री और सप्लीमेंट बनाने वाली कंपनियों के बीच हड़कंप मच गया है, क्योंकि अब उन्हें अपने उत्पादों की पारदर्शिता और सुरक्षा मानकों पर नए सिरे से काम करना होगा।

अश्वगंधा यानी विथानिया सोमनीफेरा भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति का एक अभिन्न हिस्सा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर वैश्विक महामारी के बाद, इम्युनिटी बढ़ाने और तनाव कम करने की होड़ में अश्वगंधा की मांग वैश्विक स्तर पर कई गुना बढ़ गई है।
बाजार की इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कई कंपनियों ने पौधे के विभिन्न हिस्सों का उपयोग करना शुरू कर दिया था, जिसमें जड़ के साथ-साथ पत्तियां भी शामिल थी, लेकिन हालिया वैज्ञानिक शोधों और नियामक संस्थाओं की जांच में कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने सरकार को सख्त रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है। FSSAI द्वारा 16 अप्रैल को जारी किए गए आधिकारिक निर्देश में यह साफ कर दिया गया है कि अब से किसी भी खाद्य उत्पाद या सप्लीमेंट में अश्वगंधा की पत्तियों या उनके एक्सट्रैक्ट का इस्तेमाल गैर-कानूनी माना जाएगा।
पेठ से जुड़ी बीमारियों का खतरा
इस प्रतिबंध के पीछे का सबसे प्रमुख कारण वैज्ञानिक सुरक्षा और टॉक्सिसिटी प्रोफाइल है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों, जैसे चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में हमेशा अश्वगंधा की जड़ (मूला) के चूर्ण का ही उल्लेख मिलता है। पारंपरिक चिकित्सा में पत्तियों का उपयोग कभी-कभार केवल बाहरी लेप के तौर पर किया जाता रहा है, लेकिन इन्हें खाने की सलाह कभी नहीं दी गई।
आधुनिक रिसर्च में पाया गया है कि पत्तियों में विदेनोलाइड्स नाम के यौगिकों की सांद्रता जड़ के मुकाबले बहुत अधिक और अलग होती है। विशेष रूप से विदाफेरिन-ए की अत्यधिक मात्रा पत्तियों में पाई जाती है। यह तत्व यदि नियंत्रित मात्रा से अधिक शरीर में जाए, तो यह लिवर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है, जिसे मेडिकल भाषा में हेपेटोटॉक्सिसिटी कहा जाता है। इसके अलावा, इसके अधिक सेवन से नर्वस सिस्टम यानी तंत्रिका तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने और जठरांत्र संबंधी (पेट से जुड़ी) गंभीर समस्याओं की संभावना बनी रहती है।
बाजार में उपलब्ध कई ब्रांड्स कम लागत में अधिक मुनाफा कमाने के लिए पत्तियों के अर्क का उपयोग कर रहे थे, क्योंकि जड़ की तुलना में पत्तियां सस्ती और आसानी से उपलब्ध होती हैं। सरकार के इस फैसले का एक बड़ा उद्देश्य उपभोक्ताओं को इस ‘हिडन रिस्क’ से बचाना है।
दवा के लेबल पर देनी होगी जानकारी
अब कंपनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे अपने लेबल पर स्पष्ट रूप से घोषणा करें कि उन्होंने अश्वगंधा के किस हिस्से का उपयोग किया है। यदि किसी उत्पाद में पत्तियों का अंश पाया जाता है, तो संबंधित राज्य की नियामक संस्थाएं उस कंपनी के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई करने के लिए अधिकृत हैं। यह कदम उपभोक्ताओं के ‘जानने के अधिकार’ को मजबूत करता है, जिससे वे यह तय कर सकेंगे कि वे जो सप्लीमेंट ले रहे हैं, वह सुरक्षित आयुर्वेद के मानकों पर खरा उतरता है या नहीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रतिबंध पूरी तरह से प्रिकॉशनरी एप्रोच यानी एहतियाती दृष्टिकोण पर आधारित है। चिकित्सा जगत में यह माना जाता है कि किसी भी प्राकृतिक चीज का मतलब यह नहीं है कि वह हर हाल में सुरक्षित ही हो।
न्यूट्रास्युटिकल बाजार पर पड़ेगा असर
डाइटिशियन और हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि अश्वगंधा एक एडाप्टोजेन है, जो शरीर को कोर्टिसोल हार्मोन को नियंत्रित कर तनाव से लड़ने की शक्ति देता है, लेकिन जब हम इसके पारंपरिक रूप (जड़) को छोड़कर आधुनिक निष्कर्षण (पत्तियों के अर्क) की ओर भागते हैं, तो शरीर की जैव-रासायनिक प्रक्रियाएं बिगड़ सकती हैं। जड़ को सुरक्षित इसलिए माना जाता है क्योंकि इसमें औषधीय तत्वों का संतुलन प्राकृतिक रूप से बना रहता है, जिसे मानव शरीर हजारों सालों से पचाने और अवशोषित करने का आदी है।
इस फैसले का सीधा असर भारत के तेजी से बढ़ते न्यूट्रास्युटिकल बाजार पर पड़ेगा। कई बड़ी कंपनियां जो वैश्विक स्तर पर अश्वगंधा का निर्यात करती हैं, उन्हें अब अपनी पूरी सप्लाई चेन और फॉर्मूलेशन की समीक्षा करनी होगी।
आयुर्वेद हब है भारत
आयुष मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि भारत की छवि एक वैश्विक आयुर्वेद हब के रूप में है, और हम सुरक्षा मानकों के साथ कोई समझौता नहीं कर सकते। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय अश्वगंधा को लेकर लिवर डैमेज जैसी खबरें आती हैं, तो इससे पूरे देश की साख पर बट्टा लग सकता है। इसलिए, यह प्रतिबंध न केवल स्थानीय स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए जरूरी है, बल्कि भारतीय आयुर्वेद की गुणवत्ता को वैश्विक स्तर पर प्रमाणित करने के लिए भी अनिवार्य कदम है।
उपभोक्ताओं के लिए सलाह यही है कि वे किसी भी अश्वगंधा उत्पाद को खरीदने से पहले उसके पीछे लिखे इंग्रेडिएंट्स को ध्यान से पढ़ें। यदि वहां ‘Withania somnifera leaves’ या ‘Leaf Extract’ लिखा है, तो उसे खरीदने से बचें। केवल ‘Root Powder’ या ‘Root Extract’ वाले उत्पादों को ही प्राथमिकता दें।
यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को जड़ वाले अश्वगंधा का सेवन भी डॉक्टर या अनुभवी आयुर्वेदाचार्य की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए। अंततः, सरकार का यह हस्तक्षेप वेलनेस के नाम पर चल रहे अनियंत्रित व्यापार पर लगाम लगाने और आयुर्वेद की मूल शुद्धता को वापस लाने की दिशा में एक साहसिक प्रयास है।
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