डेंगू के खिलाफ भारत की बड़ी जीत, पहली वैक्सीन ‘Qdenga’ को मिली मंजूरी

नई दिल्ली। भारत में हर साल मानसून की दस्तक के साथ ही एक डर जो सबसे ज्यादा आम लोगों और प्रशासन को सताता है, वह है डेंगू का प्रकोप। मच्छरों से फैलने वाली यह बीमारी अब तक केवल इलाज और सावधानी के भरोसे थी, लेकिन अब देश के चिकित्सा इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। भारत को अपनी पहली डेंगू वैक्सीन मिल गई है, जो न केवल अस्पतालों पर बढ़ते बोझ को कम करेगी बल्कि हजारों मासूम जिंदगियों को समय से पहले काल के गाल में समाने से बचाएगी।

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डीसीजीआई ने दी हरी झंडी

ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया यानी डीसीजीआई की विशेषज्ञ समिति ने इस बहुप्रतीक्षित टीके के इस्तेमाल को हरी झंडी दे दी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारत में डेंगू के मामलों ने पिछले कुछ वर्षों में अपने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। देश के स्वास्थ्य ढांचे के लिए यह खबर किसी संजीवनी से कम नहीं है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बेहद डराने वाले रहे हैं।

Dengue Vaccine

अगर हम सरकारी दस्तावेजों पर नजर डालें तो साल 2020 में देश में लगभग 44 हजार मामले सामने आए थे, जो उस समय भी एक बड़ी चुनौती थे, लेकिन स्थिति तब और बिगड़ गई जब 2023 और 2024 के दौरान यह आंकड़ा बढ़कर 2.3 लाख के पार पहुंच गया। साल 2025 में भी नवंबर महीने तक ही 1.13 लाख से अधिक केस दर्ज किए जा चुके थे।

चिकित्सा विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि, असल संख्या सरकारी डेटा से कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि देश के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में कई बार मरीज अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते या उनकी बीमारी की सही रिपोर्टिंग नहीं हो पाती है।

क्यूडेंगा ने बदला विज्ञान

अब बात करते हैं उस सुरक्षा कवच की जो इस खतरे से लड़ने के लिए तैयार किया गया है। भारत में जिस वैक्सीन को मंजूरी मिली है उसका नाम क्यूडेंगा (Qdenga) है, जिसे तकनीकी रूप से TAK-003 कहा जाता है। इस टीके का विकास जापान की प्रसिद्ध टाकेडा फार्मास्युटिकल कंपनी लिमिटेड ने किया है।

इस वैक्सीन की सबसे बड़ी और विशेषता यह है कि इसे लगाने से पहले यह जांचने की आवश्यकता नहीं है कि, व्यक्ति को पहले कभी डेंगू हुआ है या नहीं। इससे पहले जो भी वैक्सीन प्रयोग के स्तर पर थीं, उनमें यह एक बड़ी बाधा थी कि, वे केवल उन्हीं को दी जा सकती थीं जिन्हें पहले संक्रमण हो चुका हो, लेकिन क्यूडेंगा ने इस विज्ञान को बदल दिया है। यह वैक्सीन डेंगू के उन चारों सेरोटाइप से लड़ने में सक्षम है जो इंसानों के लिए घातक साबित होते हैं।

विशेषज्ञों की समिति ने इस टीके को 4 साल के बच्चे से लेकर 60 साल तक के बुजुर्गों के लिए पूरी तरह सुरक्षित और प्रभावी पाया है। इसकी कार्यप्रणाली पर गौर करें, तो इसे दो खुराकों यानी डोज में दिया जाएगा। पहली और दूसरी डोज के बीच तीन महीने का अंतराल रखा गया है, ताकि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यून सिस्टम इस वायरस के खिलाफ मजबूती से तैयार हो सके।

चार साल बीमारी से सुरक्षित रहेगा इंसान

क्लिनिकल ट्रायल के नतीजों ने डॉक्टरों को काफी उत्साहित किया है क्योंकि यह पाया गया है कि वैक्सीन लगने के बाद व्यक्ति कम से कम चार साल तक इस बीमारी से सुरक्षित रह सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी उन देशों के लिए इस टीके की सिफारिश की है जहां डेंगू एक स्थानिक समस्या बन चुका है और भारत निश्चित रूप से उस सूची में शीर्ष पर है।

Dengue Vaccine

डॉक्टर का कहना है कि, भारत दुनिया की उस एक-तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जो डेंगू के सबसे ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्र में रहती है। उनके अनुसार, यह वैक्सीन सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। हालांकि, वह यह चेतावनी देना भी नहीं भूलते कि यह कोई जादू की छड़ी नहीं है जो रातों-रात डेंगू को जड़ से मिटा, देगी। डेंगू की गंभीरता अक्सर इस बात पर निर्भर करती है कि शरीर का इम्यून सिस्टम दूसरी बार होने वाले इंफेक्शन पर कैसी प्रतिक्रिया देता है, इसलिए वैक्सीन सुरक्षा का एक मजबूत स्तर तो प्रदान करेगी लेकिन सावधानी का विकल्प नहीं बनेगी।

टीकाकरण अभियान को मिलेगी दिशा

इस खबर का एक और सुखद पहलू यह है कि, इस वैक्सीन का उत्पादन अब भारत की धरती पर ही होगा। जापानी कंपनी टाकेडा ने इसके लिए हैदराबाद की मशहूर कंपनी बायोलॉजिकल ई. लिमिटेड के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता किया है। इस साझेदारी का सीधा फायदा आम भारतीय नागरिक को मिलेगा क्योंकि स्थानीय स्तर पर उत्पादन होने से टीके की उपलब्धता आसान होगी और इसकी कीमत भी आम आदमी की जेब के अनुकूल रहने की उम्मीद है। जब कोई जीवन रक्षक दवा देश के भीतर ही बनती है, तो उसकी सप्लाई चेन पर वैश्विक उतार-चढ़ाव का असर कम पड़ता है, जो भारत जैसे विशाल देश के लिए बहुत जरूरी है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि, वैक्सीन के आ जाने से सरकार के टीकाकरण अभियान को एक नई दिशा मिलेगी, लेकिन इसके साथ ही डॉक्टरों का एक बड़ा तबका यह भी स्पष्ट कर रहा है कि, वैक्सीन केवल सुरक्षा की एक परत है। डेंगू से पूरी तरह मुक्ति पाने के लिए हमें उन बुनियादी आदतों को नहीं छोड़ना चाहिए जो हमें दशकों से सिखाई गई हैं।

मच्छरों के पनपने वाली जगहों को नष्ट करना, कूलर और पुराने बर्तनों में पानी जमा न होने देना और मच्छरदानी का प्रयोग करना आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पहले था। सरकार अब इस योजना पर काम कर रही है कि, इस वैक्सीन को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में किस तरह शामिल किया जाए ताकि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक इसकी पहुंच सुनिश्चित की जा सके।

कम होगा अस्पतालों का बोझ

कुल मिलाकर, भारत में डेंगू वैक्सीन की शुरुआत स्वास्थ्य क्षेत्र में एक नई सुबह की तरह है, जहां एक तरफ तकनीक और विज्ञान ने हमें मौत के आंकड़ों को कम करने का हथियार दिया है, वहीं दूसरी तरफ यह हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ाता है कि हम इस नई सुविधा का लाभ उठाएं और साथ ही सफाई के प्रति जागरूक रहें।

आने वाले मानसून सत्र में उम्मीद की जा रही है कि, इस वैक्सीन के सार्वजनिक उपयोग से अस्पतालों की इमरजेंसी में लगने वाली लंबी लाइनें छोटी होंगी और प्लेटलेट्स की कमी के कारण होने वाली अफरा-तफरी के दृश्यों में भी कमी आएगी। भारत अब डेंगू के खिलाफ केवल रक्षात्मक मुद्रा में नहीं है, बल्कि इस वैक्सीन के जरिए वह इस जानलेवा बीमारी पर सीधा प्रहार करने को तैयार है।

 

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