
तेहरान। ईरान की सेना ने अमेरिका को सख्त चेतावनी दी है कि अगर उसने होर्मुज पर अवैध नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखी, तो इसे सीजफायर का उल्लंघन माना जाएगा और इसका परिणाम पूरे विश्व समुदाय को भुगतना पड़ेगा। ईरान ने धमकी दी है कि, यदि अमेरिका अपना रवैया नहीं बदलेगा, तो वह अपने आस-पास के तीन समुद्रों फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी और लाल सागर के रास्ते होने वाले सभी प्रकार के आयात-निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा देगा।
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तेल टैंकरों की सुरक्षा खतरे में
दरअसल, अमेरिका की नाकेबंदी के जवाब में ईरान ने नाकेबंदी का ऐलान कर दिया है। ईरान के सैन्य मुख्यालय ने स्पष्ट कहा है कि, अगर अमेरिका ईरानी कमर्शियल जहाजों और तेल टैंकरों की सुरक्षा को खतरे में डालता रहा, तो ईरान इन तीनों समुद्रों में किसी भी देश के जहाजों को आने-जाने की अनुमति नहीं देगा।

आपको बता दें कि, इस तनाव की शुरुआत तब हुई जब अमेरिका ने मंगलवार को एक चौंकाने वाला सैन्य कदम उठाते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य और ईरानी बंदरगाहों की पूर्ण घेराबंदी का ऐलान किया। पेंटागन के इस ऑपरेशन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, इस नाकेबंदी को सफल बनाने के लिए अमेरिका ने 10 हजार खूंखार कमांडो, दर्जनों भारी-भरकम युद्धपोत और घातक विमानवाहक पोतों को ओमान की खाड़ी और लाल सागर के रणनीतिक बिंदुओं पर तैनात कर दिया है।
अमेरिका की ओर से जारी बयान किसी चेतावनी से कम नहीं था, जिसमें साफ कहा गया कि, यदि कोई भी जहाज अमेरिकी नाकेबंदी क्षेत्र के आसपास आने का दुस्साहस करेगा, तो उसे बिना किसी चेतावनी के नष्ट कर दिया जाएगा। इस कड़े रुख का असर यह हुआ कि कुछ ही घंटों के भीतर होर्मुज और ईरानी बंदरगाहों से जहाजों की आवाजाही पूरी तरह शून्य हो गई है, जिससे एक बड़ा व्यापारिक सन्नाटा पसर गया है।
सीजफायर के उल्लंघन का आरोप
अमेरिका की इस सैन्य आक्रामकता ने ईरान के भीतर ज्वालामुखी सा रोष पैदा कर दिया है। ईरान के सैन्य मुख्यालय ने इस नाकेबंदी को न केवल अवैध बताया है बल्कि इसे हाल ही में हुए सीजफायर समझौते का खुला उल्लंघन करार दिया है। ईरान का तर्क है कि हालिया संघर्षों के बाद हुए शांति समझौते की आड़ में अमेरिका उसके आर्थिक हितों और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को जानबूझकर निशाना बना रहा है।
ईरान के स्टेट ब्रॉडकास्टर आईआरआईबी ने सैन्य मुख्यालय के हवाले से एक ऐसी खबर जारी की है, जिसने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका की इस नौसैनिक गुंडागर्दी को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेगा। अगर ईरानी तेल और कमर्शियल जहाजों के लिए समुद्री मार्ग सुरक्षित नहीं रहे, तो ईरान भी अपने हितों की रक्षा के लिए प्रति-नाकेबंदी की नीति अपनाएगा।
ध्वस्त हो जाएगी सप्लाई चेन
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि, ईरान का लाल सागर को लेकर दिया गया बयान सबसे ज्यादा खतरनाक है। भौगोलिक दृष्टि से देखें तो लाल सागर ईरान की मुख्य भूमि से काफी दूर है, लेकिन वहां उसके प्रभाव और उसके समर्थित गुटों की क्षमता से दुनिया वाकिफ है। लाल सागर कोई साधारण जलमार्ग नहीं है। यह एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने वाली जीवन रेखा है।
स्वेज नहर के जरिए होने वाला दुनिया का करीब 12 से 15 प्रतिशत व्यापार और कंटेनर ट्रैफिक का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा इसी रूट से गुजरता है। यदि ईरान यहां आयात-निर्यात रोकने में सफल होता है, तो यूरोप और एशिया के बीच की दूरी हजारों किलोमीटर बढ़ जाएगी और वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।

ईरान के इस कदम का सीधा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ना तय है। फारस की खाड़ी और होर्मुज से दुनिया का 20 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल गुजरता है। वर्तमान नाकेबंदी की वजह से यह सप्लाई पहले ही प्रभावित हो चुकी है। अब यदि ओमान की खाड़ी और लाल सागर भी युद्ध का अखाड़ा बनते हैं, तो दुनिया में तेल की कीमतें उस स्तर पर पहुंच सकती हैं, जहांआम आदमी की पहुंच से ईंधन और बिजली कोसों दूर हो जाएगी।
आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी घेरेबंदी है
गौर करने वाली बात यह है कि, होर्मुज के बंद होने की स्थिति में सऊदी अरब जैसे बड़े तेल उत्पादक देश लाल सागर के रास्ते ही अपना निर्यात जारी रखने की योजना बनाते थे। ईरान का लाल सागर को बंद करने का ऐलान सीधे तौर पर सऊदी अरब और अमेरिका के सहयोगियों की उस वैकल्पिक योजना पर भी चोट है, जिससे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ गई है।
वर्तमान में लाल सागर का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह बाब-एल-मंदेब जलडमरूमध्य से हिंद महासागर को और उत्तर में स्वेज नहर से भूमध्य सागर को जोड़ता है। यह जलमार्ग वैश्विक अर्थव्यवस्था का वह मुख्य द्वार है जिसके बंद होने का मतलब है दुनिया भर में महंगाई का विस्फोट होना। जानकारों का कहना है कि, ईरान ने अपनी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाते हुए अमेरिका को उस नस पर दबाने की कोशिश की है जहां दर्द पूरी दुनिया को महसूस होगा। अगर ईरान वास्तव में इन तीन समुद्रों में व्यापारिक जहाजों का रास्ता रोकता है, तो इसे आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक घेराबंदी माना जाएगा।
लाल खून में तब्दील हो जाएंगी समुद्र की लहरें
इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक कूटनीति के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है। एक तरफ अमेरिका की ज़िद है कि, वह ईरानी प्रभाव को पूरी तरह कुचल देना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ ईरान है जो कुछ भी खोने को तैयार नहीं वाली मुद्रा में आ गया है। इस संघर्ष के पीछे की जड़ें उस अधूरे युद्धविराम में हैं जो इजरायल और अमेरिका के साथ संघर्ष के बाद हुआ था। ईरान का आरोप है कि अमेरिका समझौते की शर्तों का पालन करने के बजाय उसे आर्थिक रूप से पंगु बना रहा है।
अब गेंद पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पाले में है। यदि संयुक्त राष्ट्र और अन्य महाशक्तियां समय रहते हस्तक्षेप नहीं करतीं, तो समुद्र की ये लहरें बहुत जल्द खून से लाल हो सकती हैं और इसके आर्थिक परिणाम कई दशकों तक दुनिया को भुगतने पड़ सकते हैं। फिलहाल, होर्मुज से लेकर लाल सागर तक शांति केवल कागजों पर सिमट गई है और हथियारों की गूंज ने भविष्य को अनिश्चितता के गर्त में धकेल दिया है।
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