
न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पास करते हुए दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक विश्व मानचित्र को बदलने और अफ्रीका महाद्वीप के आकार को सही ढंग से दिखाने वाले नक्शे को अपनाने की सिफारिश की है। “नक्शे को सही करें” नाम का यह प्रस्ताव अफ्रीकी यूनियन (AU) के सदस्य देशों और बहामास की तरफ से पेश किया गया था, जिसका मकसद 450 साल से चली आ रही एक भौगोलिक विसंगति को दूर करना है जिसने मीडिया, शिक्षा और नीति-निर्माण में अफ्रीका की छवि को लगातार छोटा करके पेश किया। यह प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हुआ।
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164 सदस्य देशों ने पक्ष में डाला वोट
164 सदस्य देशों ने इसके पक्ष में वोट डाला, जबकि केवल अमेरिका ने इसके विरोध में मतदान किया और सर्बिया, एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा तथा यूक्रेन सहित छह देश वोटिंग से दूर रहे। इस प्रस्ताव को टोगो ने पेश किया और अफ्रीकी यूनियन के सभी सदस्य देशों ने इसका समर्थन किया।
क्या है प्रस्ताव में
यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, यानी किसी भी देश या संस्था को मर्केटर मैप का इस्तेमाल बंद करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसके बजाय यह दुनिया भर की सरकारों और संस्थानों को प्रोत्साहित करता है कि वे 16वीं सदी से चले आ रहे मर्केटर मैप की जगह ‘इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन’ अपनाएं, जिसे विशेषज्ञ और भूगोलवेत्ता ज्यादा सटीक मानते हैं।

टोगो के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में यह भी स्पष्ट किया कि, यह प्रस्ताव समुद्री और हवाई नेविगेशन के लिए मर्केटर प्रोजेक्शन के इस्तेमाल को किसी भी तरह चुनौती नहीं देता, क्योंकि उस काम के लिए यह मानचित्र आज भी पूरी तरह उपयुक्त है।
क्या गड़बड़ी थी मर्केटर मैप में
मौजूदा दौर में स्कूलों, किताबों और गूगल मैप्स में जो नक्शा आमतौर पर दिखाया जाता है, उसे ‘मर्केटर प्रोजेक्शन’ कहा जाता है। इसे 1569 में फ्लेमिश मानचित्रकार गेरार्डस मर्केटर ने यूरोपीय समुद्री खोजकर्ताओं की मदद के लिए बनाया था, ताकि वे समुद्री रास्तों पर सीधी दिशा में यात्रा कर सकें। लेकिन चूंकि पृथ्वी गोल है और नक्शा चपटा कागज पर बनाया जाता है, इसलिए इस प्रोजेक्शन में ध्रुवों के करीब स्थित देश असल आकार से कहीं बड़े दिखते हैं, जबकि भूमध्य रेखा के पास के देश छोटे नजर आते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ग्रीनलैंड और अफ्रीका की तुलना।
मर्केटर मैप में दोनों लगभग बराबर आकार के दिखते हैं, जबकि हकीकत में अफ्रीका, ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। इतना ही नहीं, अफ्रीका के भीतर पूरा अमेरिका, चीन, भारत, जापान और यूरोप एक साथ समा सकते हैं। आलोचकों का लंबे समय से कहना रहा है कि यह मानचित्र पश्चिमी देशों को दृश्य रूप से बढ़ा-चढ़ाकर और केंद्र में दिखाता है।
कैसा है नया नक्शा
इस समस्या को दूर करने के लिए 2018 में मानचित्रकारों की एक टीम ने ‘इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन’ नाम का नक्शा तैयार किया था, जो सभी महाद्वीपों का क्षेत्रफल उनके वास्तविक अनुपात के हिसाब से दिखाता है। इस साल फरवरी में अफ्रीकी यूनियन के 54 सदस्य देशों ने इस नक्शे को औपचारिक रूप से अपना लिया था और उसके बाद टोगो ने अप्रैल में बाकी सदस्य देशों से भी इसे अपनाने की अपील की। इसी के बाद जुलाई में इस प्रस्ताव पर अनौपचारिक विचार-विमर्श शुरू हुआ, जो शुक्रवार को वोटिंग तक पहुंचा।
नए नक्शे में अफ्रीका अपने असली, विशाल आकार में नजर आता है, जबकि यूरोप, रूस और ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटे दिखते हैं। इसी तरह ब्राजील और दक्षिण अमेरिका भी अपने सही अनुपात में पहले से बड़े नजर आते हैं।
टोगो और फ्रांस का रुख
वोटिंग से पहले टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए कहा कि, नक्शों में बनी रही यह विकृति समय के साथ गंभीर परिणाम लेकर आई है। उन्होंने एक बातचीत में यह भी कहा कि, एक निष्पक्ष दुनिया की शुरुआत एक निष्पक्ष नक्शे से होती है। डुसी ने साफ किया कि, यह अभियान यूरोप या किसी भी सभ्यता पर हमला नहीं है, बल्कि उपनिवेशवाद के दौर की विरासतों से निपटने की अफ्रीका की व्यापक कोशिश का हिस्सा है। उनका कहना था कि मर्केटर मैप का व्यापक इस्तेमाल औपनिवेशिक इतिहास की ही एक देन है।

फ्रांस ने भी इस पहल का समर्थन किया। फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरो ने ऐलान किया कि, फ्रांस मर्केटर प्रोजेक्शन को छोड़कर ऐसे नक्शों को अपनाएगा जो देशों के वास्तविक क्षेत्रफल को बेहतर ढंग से दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका, रूस और चीन नक्शे में अफ्रीका, लातिन अमेरिका या दक्षिण-पूर्व एशिया के मुकाबले असंगत रूप से बड़े दिखाई देते हैं, और यह विकृति धीरे-धीरे लोगों की सोच में घर कर जाती है।
टोगो ने यह भी बताया कि वह साल के आखिर तक अपने स्कूली भूगोल की किताबों में यह बदलाव लाना चाहता है, और आने वाले छह महीनों में अफ्रीकी यूनियन के सदस्य देशों तथा अन्य समर्थकों के साथ मिलकर इस नक्शे को व्यापक स्तर पर अपनाने की रणनीति पर चर्चा करेगा। इसमें मैपिंग, जीपीएस और लोकेशन आधारित तकनीक से जुड़ी कंपनियों को भी शामिल किया जाएगा।
अमेरिका ने क्यों किया विरोध
अमेरिका इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने वाला इकलौता देश रहा। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने इसे एक बड़े और कहीं ज्यादा कट्टरपंथी वैचारिक प्रोजेक्ट का हिस्सा बताते हुए कहा कि इसे महज मानचित्रीय अनुपात सुधारने की एक निर्दोष कोशिश के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन असल में इसका इससे कहीं बड़ा वैचारिक एजेंडा जुड़ा है। अमेरिका ने महासभा की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह के मुद्दों पर बहस करने के बजाय संगठन को अंतरराष्ट्रीय शांति से जुड़ी असल चुनौतियों पर ध्यान देना चाहिए था।
क्यों जरूरी था बदलाव
अफ्रीकी देशों और अभियान से जुड़े संगठनों का मानना है कि, नक्शे में महाद्वीप को छोटा दिखाना केवल एक तकनीकी या भौगोलिक चूक नहीं, बल्कि इसका सीधा असर लोगों की सोच पर पड़ता है। जब बरसों तक अफ्रीका को नक्शे में छोटा और गैर-महत्वपूर्ण दिखाया जाता रहा, तो इससे यह धारणा मजबूत हुई कि यह महाद्वीप आर्थिक और वैश्विक मामलों में हाशिये पर है। इसका असर वहां निवेश, व्यापार और विकास से जुड़े फैसलों पर भी पड़ता रहा है। अभियान से जुड़े एक प्रमुख संगठन ने इस प्रस्ताव के पारित होने का स्वागत करते हुए कहा कि वे चाहते हैं कि स्कूलों, किताबों, न्यूजरूम, कारोबार और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सही अनुपात वाले नक्शे इस्तेमाल हों, जिन्हें रोजाना अरबों लोग देखते हैं।
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