Kidney Stone Research: किडनी स्टोन से बचने के लिए क्या सिर्फ ज्यादा पानी पीना ही काफी है? शोध में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

किडनी स्टोन की समस्या से जूझ रहे करोड़ों लोगों के लिए एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर आई है। दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘द लांसेट’ में प्रकाशित एक नई स्टडी ने दावा किया है कि, सिर्फ ज्यादा पानी पीने की सामान्य सलाह किडनी स्टोन को दोबारा बनने से रोकने के लिए काफी नहीं है। अमेरिका के छह बड़े मेडिकल सेंटर्स पर 1,658 लोगों पर किए गए इस शोध में स्मार्ट बोतलों और रिमाइंडर्स का सहारा लिया गया, लेकिन नतीजे उम्मीद के विपरीत रहे। जानिए क्यों आधुनिक तकनीक और कोचिंग के बावजूद लोग इस दर्दनाक बीमारी से बच नहीं पा रहे हैं।

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असहनीय होता है किडनी का दर्द

गुर्दे की पथरी यानी किडनी स्टोन एक ऐसी स्वास्थ्य समस्या है, जो इन्सान को तीव्र दर्द देती है। ऐसा दर्द जो कई बार असहनीय हो जाता है, जो लोग इस समस्या से गुजर चुके हैं, वे जानते हैं कि यह न केवल शरीर को तकलीफ देता है, बल्कि अस्पताल के आपातकालीन कक्ष तक पहुंचाने और रोजमर्रा की जिंदगी को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त करने की क्षमता रखता है।

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आंकड़ों की मानें, तो दुनिया भर में एक बड़ी आबादी अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार इस समस्या का सामना करती है और सबसे डरावनी बात यह है कि, एक बार पथरी होने के बाद इसके दोबारा होने की संभावना बहुत अधिक रहती है। आमतौर पर डॉक्टरों द्वारा सबसे पहली और बुनियादी सलाह यही दी जाती है कि, मरीज को खूब पानी पीना चाहिए।

तर्क यह है कि, पर्याप्त पानी पीने से यूरिन पतला रहता है जिससे कैल्शियम और ऑक्सलेट जैसे मिनरल्स आपस में चिपककर पत्थर का रूप नहीं ले पाते, लेकिन हाल ही में ‘द लांसेट’ में प्रकाशित एक व्यापक शोध ने इस सरल सी दिखने वाली सलाह की वास्तविकता और मानवीय व्यवहार की जटिलताओं पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

1,658 लोगों पर हुआ शोध

यूूरिनरी स्टोन डिजीज रिसर्च नेटवर्क द्वारा संचालित और ड्यूक क्लिनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा समन्वित इस ऐतिहासिक अध्ययन में अमेरिका के छह प्रमुख चिकित्सा केंद्रों से लगभग 1,658 लोगों को शामिल किया गया था। इस शोध का प्राथमिक उद्देश्य यह समझना था कि क्या लोगों को आधुनिक तकनीक और निरंतर प्रोत्साहन के जरिए ज्यादा पानी पीने के लिए प्रेरित कर किडनी स्टोन के जोखिम को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है।

इसके लिए शोधकर्ताओं ने एक बहुत ही व्यवस्थित ढांचा तैयार किया था, जिसमें प्रतिभागियों को दो अलग-अलग समूहों में विभाजित किया गया। पहले समूह को सामान्य रूप से पानी बढ़ाने की सलाह दी गई जबकि दूसरे समूह को एक विशेष और हाई-टेक हाइड्रेशन प्रोग्राम का हिस्सा बनाया गया। इस कार्यक्रम के तहत मरीजों को स्मार्ट वॉटर बॉटल दी गईं, जो उनके पानी पीने के स्तर को ट्रैक करती थीं।

पानी की मात्रा बढ़ाई

इसके साथ ही उन्हें मोबाइल पर नियमित रिमाइंडर मैसेज, व्यक्तिगत लक्ष्य और प्रोफेशनल हेल्थ कोचिंग जैसी सुविधाएं भी प्रदान की गईं ताकि वे अपने दैनिक जल सेवन के स्तर को हर हाल में ऊंचा बनाए रख सकें। लगभग दो साल तक चले इस गहन अध्ययन के परिणाम चिकित्सा समुदाय के लिए काफी आंखें खोलने वाले रहे हैं।

रिसर्च के आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि, जिन लोगों ने स्मार्ट तकनीक और हाइड्रेशन प्रोग्राम का सक्रियता से पालन किया, उन्होंने निश्चित रूप से अपने पानी पीने की मात्रा में कुछ इजाफा किया था, लेकिन यह बढ़ोतरी इतनी पर्याप्त नहीं थी कि, वह किडनी स्टोन के दोबारा बनने के खतरे को सांख्यिकीय रूप से कम करने में सफल हो सके।

पानी की मात्रा बढ़ा देने ही समाधान नहीं

शोधकर्ताओं का मानना है कि, असली चुनौती तकनीक की कमी नहीं बल्कि इंसानी स्वभाव की वह प्रवृत्ति है जिसमें लंबे समय तक एक कठिन और नीरस आदत को बनाए रखना लगभग असंभव हो जाता है। भले ही मरीजों को अच्छी तरह पता हो कि, पर्याप्त पानी पीना उनके लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है और उन्हें इसके लिए हर तरह का डिजिटल सपोर्ट भी दिया जाए, फिर भी दैनिक जीवन के दबावों के बीच लगातार ज्यादा पानी पीते रहना एक बहुत बड़ा मानसिक और शारीरिक अनुशासन मांगता है जिसे ज्यादातर लोग एक समय के बाद छोड़ देते हैं।

इस शोध ने एक और महत्वपूर्ण पहलू की ओर इशारा किया है जो अक्सर सामान्य चर्चाओं में छूट जाता है। अध्ययन में यह पाया गया कि हर व्यक्ति के शरीर के लिए पानी की एक समान मात्रा तय कर देना वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह सही नहीं है। किसी भी व्यक्ति को असल में कितने पानी की आवश्यकता है, यह उसके शरीर की बनावट, उसकी चयापचय दर, उसके रहने वाले क्षेत्र का स्थानीय मौसम, उसकी शारीरिक सक्रियता और उसकी मौजूदा स्वास्थ्य स्थितियों जैसे कई जटिल कारकों पर निर्भर करता है।

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इसके अलावा, शोध में यह भी सामने आया कि, केवल पानी की मात्रा बढ़ा देना ही समाधान नहीं है जब तक कि शरीर से निकलने वाले यूरिन का वॉल्यूम एक निश्चित स्तर तक न पहुंच जाए। हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि, यह शोध साबित करता है कि व्यवहार में बदलाव लाना और उसे स्थायी बनाना दुनिया की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक है, खासकर तब जब इलाज का तरीका जीवनशैली से जुड़ा हो।

किडनी स्टोन के इलाज में मील का पत्थर है ये शोध

कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि, ये स्टडी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि, किडनी स्टोन जैसी समस्याओं के समाधान के लिए हमें केवल पानी की बोतलों पर निर्भर रहने के बजाय एक अधिक व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। इसमें खान-पान में व्यापक बदलाव, नमक और सोडियम के सेवन में भारी कटौती और शरीर के भीतर मिनरल्स के संतुलन को समझना शामिल है।

‘द लांसेट’ की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि बिना कड़े आत्म-अनुशासन और जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन के, महंगी से महंगी स्मार्ट तकनीक भी बीमारी को दोबारा लौटने से नहीं रोक सकती।  ये शोध किडनी स्टोन के इलाज की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा ये हमें ये बताता है कि, किडनी के स्टोन से बचना है कि तो ये सख्त जीवन शैली अपनानी होगी।

 

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