नई दिल्ली । भारत के बढ़ते पोषण संकट को हल करने में स्कूल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पोषण असमानता की वजह से वर्तमान में कुपोषण से लेकर बढ़ती लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। पोषण संकट को देखते हुए अब विशेषज्ञ पोषण शिक्षा को रोज़ाना की पढ़ाई का एक नियमित और महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने का आह्वान कर रहे हैं।
नई दिल्ली में ‘नरिशिंग स्कूल्स फाउंडेशन’ द्वारा आयोजित ‘न्यूट्रिशन कॉन्क्लेव’ के तीसरे संस्करण में नीति-निर्माता, शिक्षक और उद्योग जगत के दिग्गज व्यक्ति एकत्रित हुए और स्कूलों में पोषण शिक्षा के महत्व पर चर्चा की। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि पोषण साक्षरता को स्कूली शिक्षा प्रणाली के एक नियमित हिस्से के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। उनके अनुसार बच्चों को कम उम्र में ही खाने की स्वस्थ आदतों के बारे में सिखाने और जागरूकता बढ़ाने से उनके पूरे जीवन के स्वास्थ्य पर एक गहरा और स्थायी प्रभाव डाला जा सकता है।
यह चर्चा एक ऐसे समय में हो रही है, जब भारत पोषण से संबंधित दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। कई क्षेत्रों में कुपोषण प्रमुख समस्या बना हुआ है, तो कहीं मोटापा, डायबिटीज और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि हो रही है। अब ये समस्याएँ पहले की तुलना में कम उम्र में ही शुरू होने लगी हैं।
उपस्थित वक्ताओं ने इस बात की ओर इशारा किया कि जहाँ पोषण अभियान, पीएम पोषण और स्कूल स्वास्थ्य एवं कल्याण कार्यक्रम जैसे कार्यक्रमों ने आयुष्मान भारत के तहत भोजन और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता को बेहतर बनाया है, तो वहीं अब केवल पोषण का साधन उपलब्ध कराके ही चुप नहीं बैठना है, बल्कि लोगों की आदतों और व्यवहार को बदलने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित भी करना है।
भारत सरकार की पूर्व सचिव आरती आहूजा ने कहा कि भारत को भोजन के बारे में अपनी बुनियादी समझ से फिर से जुड़ने की ज़रूरत है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि पोषण नीतियों का दृष्टिकोण ज़्यादा व्यापक होना चाहिए। इसमें अलग-अलग क्षेत्रों के लोग मिलकर काम करें। उन्होंने आगे कहा, “पूरे फूड सिस्टम (खाद्य तंत्र) में किए जा रहे प्रयासों को व्यावहारिक और स्पष्ट तरीके से एक साथ आना चाहिए, ताकि वे जमीन पर प्रभाव दिखा सके।
चर्चा की मुख्य बात यह रही कि जो बच्चा काम उम्र में ही पोषण से जागरूक हो जाए और पोषण के पहलुओं को समझ जाए वह न केवल खुद के लिए एक स्वस्थ जीवन तैयार कर सकता है, बल्कि पूरे परिवार और समाज को स्वस्थ खानपान से स्वस्थ जीवन के लिए प्रेरित कर सकता है।
नरिशिंग स्कूल्स फाउंडेशन की को-फाउंडर और सीईओ अर्चना सिन्हा ने इस दीर्घकालिक प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए कहा, “आने वाले कल में बच्चे खाने की कौन-सी आदतें अपनाएँगे, यह आज के समय में वे क्या सीखते हैं, इस पर निर्भर करता है। स्कूल एक ऐसी जगह होती है, जहाँ से बदलाव की शुरुआत होती है।”
कॉन्क्लेव में विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि स्कूल की कक्षाएँ आदतों को तैयार करने का एक शक्तिशाली मंच होती हैं। फिर चाहे संतुलित डाइट के बारे में समझ विकसित करनी हो या बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड फूड के बारे में जागरूक रहना हो, यह ऐसी चीजें हैं जो बच्चा कक्षा में सिर्फ किताबी पढ़ाई के बजाए प्रायोगिक तरीके से सीख सकता है।
इन चर्चाओं में से एक अहम् बात जो सामने निकलकर आई, वह थी सरकार, कॉर्पोरेट्स और सिविल सोसाइटी के बीच ज़्यादा मज़बूत सहयोग होना अतिआवश्यक है। प्रतिभागियों ने तर्क दिया कि कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के प्रयासों को सिर्फ नियमों का पालन करने से आगे बढ़कर स्कूलों में बड़े पैमाने पर लागू होने वाले और लंबे समय तक चलने वाले उपायों को समर्थन देना चाहिए।
एक अन्य पैनल ने स्कूलों में बुनियादी शिक्षा में पोषण को शामिल करने पर चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य और बाल विकास प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए। उन्होंने पोषण शिक्षा को ज्यादा असरदार बनाने के लिए गतिविधि-आधारित पाठ, स्कूल-स्तरीय कार्यक्रम और सामुदायिक भागीदारी जैसे व्यावहारिक साधनों को भी महत्वपूर्ण बताया।
इस कार्यक्रम का मुख्य संदेश स्पष्ट था और वह यह था कि भारत में पोषण में सुधार केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि लोग क्या खाते हैं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करता है कि बच्चे कक्षाओं में क्या सीखते हैं।



