
नई दिल्ली। वित्त वर्ष के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करने की अंतिम तिथि 31 जुलाई बीत चुकी है और अधिकांश टैक्सपेयर्स ने तय समय-सीमा के भीतर अपना रिटर्न फाइल कर दिया है। रिटर्न दाखिल करने के बाद अब हर करदाता को अपने रिफंड का इंतजार है, जहां कई टैक्सपेयर्स के बैंक खातों में रिफंड की राशि आ चुकी है। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो अभी भी अपने रिफंड का इंतजार कर रहे हैं।
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कारणों को समझना जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि, अगर रिटर्न दाखिल करने के काफी समय बाद भी रिफंड नहीं आया है, तो इसे हल्के में लेने की बजाय इसके पीछे के संभावित कारणों को समझना जरूरी है। दरअसल, कई बार टैक्सपेयर्स द्वारा की गई छोटी-छोटी गलतियों के कारण भी रिफंड मिलने में देरी हो जाती है। आइए जानते हैं ऐसी कौन सी सामान्य गलतियां हैं, जो रिफंड की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं।
आय और TDS की जानकारी में गड़बड़ी
टैक्स विशेषज्ञों के अनुसार, यदि रिटर्न में दर्ज सैलरी, टीडीएस या अन्य स्रोतों से हुई आय की जानकारी में किसी प्रकार की असमानता या अंतर पाया जाता है, तो आयकर विभाग द्वारा उस रिटर्न की गहन जांच की जा सकती है।

इस जांच प्रक्रिया के चलते रिफंड मिलने में स्वाभाविक रूप से अधिक समय लग जाता है। इसके अलावा, बैंक खाते का IFSC कोड यदि गलत दर्ज किया गया हो या बैंक अकाउंट नंबर में कोई त्रुटि हो, तो भी रिफंड का ट्रांसफर विफल हो सकता है, जिससे प्रक्रिया और लंबी खिंच जाती है।
पैन कार्ड और बैंक खाते की लिंकिंग जरूरी
रिफंड में देरी का एक बड़ा और आम कारण यह भी है कि, कई टैक्सपेयर्स का पैन कार्ड उनके बैंक खाते से लिंक ही नहीं होता। ऐसी स्थिति में आयकर विभाग रिफंड की राशि ट्रांसफर नहीं कर पाता। विशेषज्ञों की सलाह है कि, जिन करदाताओं ने अभी तक अपना पैन कार्ड अपने बैंक खाते से लिंक नहीं करवाया है, उन्हें सबसे पहले यह प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए, ताकि रिफंड में किसी तरह की बाधा न आए।
ई-वेरिफिकेशन के बिना अटक सकता है रिफंड
बहुत से टैक्सपेयर्स यह मानकर चलते हैं कि, केवल रिटर्न दाखिल कर देने भर से ही उन्हें रिफंड मिल जाएगा, लेकिन यह धारणा पूरी तरह गलत है। नियमानुसार, रिटर्न दाखिल करने के बाद उसे ई-वेरिफाई करना अनिवार्य होता है। जब तक टैक्सपेयर यह प्रक्रिया पूरी नहीं करता, तब तक आयकर विभाग उस रिटर्न पर आगे की कार्रवाई शुरू नहीं करता। स्पष्ट है कि रिफंड की प्रक्रिया केवल ई-वेरिफिकेशन पूरा होने के बाद ही आगे बढ़ती है। इसलिए यदि किसी टैक्सपेयर ने रिटर्न दाखिल करने के बाद ई-वेरिफिकेशन नहीं किया है, तो उसे तुरंत यह प्रक्रिया पूरी कर लेनी चाहिए।
पैन और बैंक खाते के नाम में अंतर बन सकता है अड़चन
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि टैक्सपेयर के बैंक खाते में दर्ज नाम और पैन कार्ड पर अंकित नाम में कोई भिन्नता पाई जाती है, तो बैंक द्वारा रिफंड ट्रांसफर को अस्वीकार किया जा सकता है। नियम के अनुसार, रिफंड की राशि केवल उसी बैंक खाते में भेजी जाती है, जिसमें दर्ज सभी जानकारियां पूरी तरह सही और सत्यापित हों। ऐसे में करदाताओं को सलाह दी जाती है कि वे रिटर्न दाखिल करने से पहले अपने बैंक खाते और पैन कार्ड की जानकारियों का मिलान अवश्य कर लें।
पुराना टैक्स बकाया होने पर भी हो सकती है दिक्कत
आयकर विभाग के नियमों के अनुसार, यदि किसी टैक्सपेयर पर पिछले किसी असेसमेंट ईयर का टैक्स बकाया है, तो ऐसी स्थिति में विभाग मौजूदा वित्त वर्ष के रिफंड में से पूर्व का बकाया टैक्स स्वतः ही काट सकता है। इसका सीधा असर यह होता है कि या तो टैक्सपेयर को उसका रिफंड देरी से प्राप्त होता है, या फिर उसे पूरा रिफंड न मिलकर कम राशि प्राप्त होती है। ऐसे मामलों में करदाताओं को अपने पुराने टैक्स रिकॉर्ड की जांच करते रहना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की बकाया राशि के बारे में पहले से जानकारी रहे।
अधिकारिक वेबसाइट पर चेक करें
यदि किसी टैक्सपेयर का इनकम टैक्स रिफंड आने में देरी हो रही है, तो उसे घबराने की बजाय ऊपर बताए गए संभावित कारणों की जांच करनी चाहिए। सही बैंक विवरण दर्ज करना, पैन-बैंक लिंकिंग सुनिश्चित करना, समय पर ई-वेरिफिकेशन पूरा करना, तथा पैन व बैंक खाते में नाम का मिलान करना, ये सभी कदम रिफंड प्रक्रिया को सुचारू और तेज बनाने में सहायक साबित हो सकते हैं। यदि इन सभी बिंदुओं की जांच के बाद भी रिफंड नहीं आता, तो टैक्सपेयर्स को आयकर विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर अपने रिटर्न की स्थिति की जांच करनी चाहिए या संबंधित हेल्पलाइन से संपर्क करना चाहिए।
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