
लंदन। ब्रिटेन के पूर्व मंत्री रोरी स्टीवर्ट ने भारत में हो रहे छात्र और यूथ प्रोटेस्ट को लेकर एक ऐसा बयान दे दिया है, जिसने भारतीय राजनीतिक खेमे में हलचल मचा दी है। एक पॉडकास्ट में बोलते हुए स्टीवर्ट ने खुले शब्दों में आशंका जताई कि, नई दिल्ली में हुए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के विरोध-प्रदर्शनों की वजह से कहीं भारत का भी हाल बांग्लादेश जैसा न हो जाये। उन्होंने कहा, अगर ये प्रोटेस्ट ऐसे ही चलता रहा, तो यहां कोई बड़ा राजनीतिक उलट फेर देखने को मिल सकता है। हालांकि, भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल उन्हें इसका तीखा जवाब दिया और कहा स्टीवर्ट का विश्लेषण को अधूरी समझ पर आधारित है।
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क्या कहा, रोरी स्टीवर्ट ने
पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान रोरी स्टीवर्ट ने संकेत दिया कि, दिल्ली में हुए प्रदर्शन बांग्लादेश जैसी परिस्थितियों की शुरुआत साबित हो सकते हैं। बातचीत में उन्होंने पूर्व बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना का उदाहरण भी दिया। आपको बता दें कि, शेख हसीना बांग्लादेश की बेहद मजबूत और अपराजेय नेता मानी जाती थीं, लेकिन एक समय ऐसा आया कि, उन्हें न सिर्फ सत्ता छोड़नी पड़ी थी, बल्कि देशछोड़कर रातों रात भागना भी पड़ा था। स्टीवर्ट के मुताबिक, ठीक वैसी ही स्थिति भारत में भी बन सकती है।

उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर हुए पुराने आंदोलनों और मौजूदा प्रदर्शनों के बीच एक फर्क बताया। उनका कहना था कि, पहले जब भी देश में कोई बड़ा प्रदर्शन होता था, तो केंद्र सरकार आमतौर पर उसे मुस्लिम समुदाय से जोड़कर पेश कर देती थी, लेकिन इस बार सरकार ऐसा करने में कामयाब नहीं हो पाई।
स्टीवर्ट ने आगे कहा कि, पहले के आंदोलनों में शामिल होने वाले सिविल सोसाइटी के लोगों और उदारवादी विचारधारा वालों को आसानी से एक खास खेमे में डालकर बदनाम कर दिया जाता था। उन्हें वामपंथी करार दे दिया जाता था और फिर समर्थकों की एक पूरी ऑनलाइन फौज उन पर टूट पड़ती थी। यहां तक कि, यह भी आरोप लगाया जाता था कि, इन आंदोलनकारियों को विदेशी कारोबारी जॉर्ज सोरोस से आर्थिक मदद मिल रही है, लेकिन उनके अनुसार, इस बार परिस्थिति अलग रही, लोग बेहद रचनात्मक ढंग से अपनी बात रख रहे थे और पहले की तुलना में पुलिस का डर भी कम नजर आया।
नेपाल और बांग्लादेश से तुलना
चर्चा के दौरान रोरी स्टीवर्ट ने दिल्ली के मौजूदा प्रदर्शनों को नेपाल और बांग्लादेश में हाल के वर्षों में हुए जन-आंदोलनों से भी जोड़ा। पॉडकास्ट में यह मुद्दा भी उठा कि, पीएम मोदी के अब तक के कार्यकाल में किसी मंत्री को इस्तीफा देने के लिए मजबूर नहीं किया गया था। मोदी की छवि हमेशा से एक ऐसे मजबूत और अडिग नेता की रही है, जो दबाव में झुकते नहीं, लेकिन हाल ही में उनकी सरकार के एक मंत्री को पहली बार इस्तीफा देना पड़ा, जिसे स्टीवर्ट ने एक अहम राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा।

स्टीवर्ट का कहना है कि, उनकी नजर में नरेंद्र मोदी इस समय राजनीतिक रूप से बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं और मौजूदा हालात बांग्लादेश जैसे आंदोलन की शुरुआत बन सकते हैं। उन्होंने एक बार फिर शेख हसीना का हवाला देते हुए कहा कि, वे भी अपने समय में पूरी तरह अजेय मानी जाती थीं, लेकिन आखिरकार उनकी सरकार गिरा दी गई। इतना ही नहीं, स्टीवर्ट ने भारत सरकार पर सीधे आरोप लगाते हुए भ्रष्टाचार और असहमति को दबाने की नीति अपनाने की बात कही। यह भी दावा किया कि, टेलीविजन चैनलों पर सरकार का नियंत्रण हो चुका है।
कंवल सिब्बल का तीखा जवाब
रोरी स्टीवर्ट की इन टिप्पणियों पर भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि, ब्रिटेन के पूर्व मंत्रियों को भारत की राजनीतिक और सामाजिक वास्तविकताओं की गहरी समझ नहीं होती और वे अपनी काल्पनिक धारणाओं को ही गंभीर राजनीतिक विश्लेषण के रूप में पेश कर देते हैं।
सिब्बल ने बांग्लादेश और भारत के बीच के बुनियादी ढांचागत अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि, बांग्लादेश में इससे पहले भी निर्वाचित सरकारों का तख्तापलट हो चुका है और वहां सैन्य शासन भी लागू रह चुका है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि, बांग्लादेश में राष्ट्रीय चुनावों का बहिष्कार होने की घटनाएं भी हो चुकी हैं। इसके अलावा उन्होंने शेख हसीना और पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के बीच लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का भी जिक्र किया। साथ ही यह भी बताया कि, बांग्लादेश में लोकतंत्र-विरोधी इस्लामी राजनीतिक ताकतों की मौजूदगी भी एक अहम कारक रही है।
शेख हसीना की विदाई सुनियोजित साजिश
पूर्व विदेश सचिव ने आगे लिखा कि, शेख हसीना की सत्ता से विदाई कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि यह एक सुनियोजित और सोची-समझी प्रक्रिया का नतीजा थी। उन्होंने दावा किया कि, इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। मोहम्मद यूनुस ने स्वयं अमेरिका में अपने एक इस्लामी सलाहकार का सार्वजनिक रूप से परिचय कराया था।
शेख हसीना ने भी सार्वजनिक तौर पर यह आरोप लगाया था कि, अमेरिका उन्हें सत्ता से बेदखल करने की कोशिशों में शामिल रहा। सिब्बल ने यह भी उल्लेख किया कि, यूनुस को मुख्य सलाहकार के पद पर बिठाने में अमेरिकी भूमिका को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं, जबकि बांग्लादेशी सेना प्रमुख की भूमिका को लेकर अब भी अटकलें ही लगाई जा रही हैं।
सिब्बल ने अंत में यह भी स्पष्ट किया कि, बांग्लादेश की राजनीतिक और प्रशासनिक संरचना भारत जैसे संघीय ढांचे से पूरी तरह अलग है, इसलिए दोनों देशों के हालात की सीधी तुलना करना तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने रोरी स्टीवर्ट की समझ पर सवाल उठाते हुए तीखे लहजे में उन्हें भारतीय राजनीति से अनभिज्ञ करार दिया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छिड़ी बहस
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आंतरिक राजनीति को लेकर की जाने वाली टिप्पणियों पर बहस छेड़ दी है। जहां एक तरफ पश्चिमी देशों के कुछ पूर्व नेता और विश्लेषक भारत में हो रहे जन-आंदोलनों की तुलना दक्षिण एशिया के अन्य देशों में हुए सत्ता-परिवर्तनों से करते नजर आते हैं।
वहीं भारतीय राजनयिक और विश्लेषक इस तरह की तुलनाओं को सतही और तथ्यात्मक आधार से रहित बताते हुए खारिज करते रहे हैं। यह विवाद आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है, खासकर तब जब भारत में राजनीतिक हलचलें पहले से ही चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
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