
लखनऊ। सूबे की राजधानी लखनऊ में हुए अलीगंज अग्निकांड की भयावह त्रासदी के बाद अब एलडीए के 100 से अधिक अधिकारियों और अभियंताओं पर कार्रवाई की तलवार लटक गई है। उत्तर प्रदेश शासन और विशेष जांच दल (SIT) की बढ़ती सख्ती के चलते एलडीए को अपनी पहले की रणनीति बदलनी पड़ी है। शुरुआत में एलडीए ने केवल 19 अभियंताओं और 6 पीसीएस अधिकारियों की सीमित सूची शासन को सौंपी थी, लेकिन अब इस सूची का विस्तार करते हुए वर्ष 2014 से 2026 तक अलीगंज क्षेत्र में तैनात रहे समस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों को जांच के दायरे में लाया गया है।
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सीनियर अधिकारी तलब
शुक्रवार को शासन द्वारा गठित एसआईटी ने एलडीए के वरिष्ठ अधिकारियों को तलब किया। एलडीए के उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार स्वयं एक अपर सचिव के साथ शासन मुख्यालय पहुंचे। वहां अग्निकांड से प्रभावित भवन, उसमें हुए अवैध निर्माण और प्रशासनिक लापरवाही के प्रत्येक स्तर पर गहन पूछताछ की गई। एसआईटी ने न केवल अतीत की चूक पर सवाल उठाए, बल्कि यह भी जानना चाहा कि भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए एलडीए क्या ठोस कदम उठाने की योजना बना रहा है।

इससे एक दिन पहले गुरुवार को एसआईटी ने एलडीए से कई महत्वपूर्ण दस्तावेज तलब किए थे। इनमें संपत्ति आवंटन से संबंधित फाइलें, भवन मानचित्र और विशेष रूप से वे फाइलें शामिल थीं, जिनमें अवैध निर्माणों के ध्वस्तीकरण आदेशों को वापस लेने के निर्णय दर्ज थे। एलडीए ने ये सभी दस्तावेज एसआईटी को सौंप दिए हैं, जो अब जांच का मुख्य आधार बनेंगे।
SIT को सौंपी जाएगी अधिकारियों और अभियंताओं की लिस्ट
एसआईटी ने संपत्ति आवंटन, भवन मानचित्र स्वीकृति और विहित प्राधिकारी (कॉम्पिटेंट अथॉरिटी) से जुड़े कुछ प्रमुख अधिकारियों को शनिवार को बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया है। सूत्रों के अनुसार, इस पूछताछ से पहले ही एलडीए 100 से अधिक अधिकारियों और अभियंताओं की विस्तृत नई सूची शासन और एसआईटी को सौंप देगा। यह सूची उन सभी व्यक्तियों के नाम समाहित करेगी जो पिछले 12 वर्षों में अलीगंज क्षेत्र में किसी भी प्रशासनिक या तकनीकी पद पर तैनात रहे।

एलडीए की प्रारंभिक रणनीति स्पष्ट रूप से जिम्मेदारी से बचने की थी। पहले भेजी गई 19 नामों की सूची में 14 ऐसे अभियंता थे जो पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके थे और एक अभियंता का तो निधन हो चुका था। इस सुरक्षित सूची को शासन ने तुरंत नाकाफी और अपर्याप्त करार दिया। शासन ने स्पष्ट निर्देश दिए कि अवैध निर्माण और प्रशासनिक लापरवाही की पूरी श्रृंखला में शामिल प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, चाहे वह वर्तमान में सेवारत हो या सेवानिवृत्त।
इस कड़ी फटकार के बाद एलडीए को अपना रुख बदलना पड़ा और अब जांच का दायरा 2014 से 2026 तक के पूरे कालखंड में तैनात रहे सभी अधिकारियों और अभियंताओं तक विस्तारित हो गया है।
लिस्ट में इन अधिकारियों के नाम होंगे
अवर अभियंता (जेई) और सहायक अभियंता (एई): जमीनी स्तर पर निर्माण की निगरानी और अनुपालन सुनिश्चित करने वाले
कार्यकारी अभियंता (ईई): क्षेत्रीय स्तर पर निर्माण स्वीकृति और निरीक्षण के प्रभारी
अधीक्षण अभियंता और मुख्य अभियंता: वरिष्ठ तकनीकी पदाधिकारी जो नीतिगत निर्णयों में भागीदार रहे
विहित प्राधिकारी (कॉम्पिटेंट अथॉरिटी): भवन मानचित्र स्वीकृति और अवैध निर्माण पर कार्रवाई के अधिकारी
पीसीएस अधिकारी: प्रशासनिक पदों पर तैनात अधिकारी जो नीतिगत फाइलों को संचालित करते रहे
संपत्ति आवंटन अनुभाग के कर्मचारी: भूखंड और भवन आवंटन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी
ढूढ़े जा रहे इन सवालों के जवाब
इस पूरे प्रकरण में कई गंभीर सवालों के जवाब अभी तक नहीं मिले, ये वह सवाल हैं सिर्फ इस विशेष दुर्घटना से जुड़े हैं बल्कि शहर में अवैध निर्माण की व्यापक समस्या और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी असर डालने वाले हैं।
पहला
2014 से 2026 तक तैनात रहे प्रत्येक अधिकारी से पूछताछ की जाएगी, लेकिन वास्तविक कार्रवाई कितने लोगों पर होगी? क्या यह जांच केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी या दोषियों को वास्तव में दंडित किया जाएगा?
दूसरा
अवैध निर्माणों के ध्वस्तीकरण आदेश वापस लेने वाली फाइलें किसके इशारे पर बंद की गईं? क्या यह निर्णय केवल स्थानीय अधिकारियों का था या इसमें किसी राजनीतिक हस्तक्षेप की भूमिका थी?
तीसरा
100 नामों की सूची भेजने मात्र से पीड़ित परिवारों को इंसाफ मिलेगा या यह कार्रवाई फाइलों और कार्यालयों तक ही सीमित रहेगी?
अनदेखी के मुद्दे आये सामने
अलीगंज अग्निकांड ने लखनऊ ही नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश में अवैध निर्माण और भवन सुरक्षा मानकों की अनदेखी के गंभीर मुद्दे को सामने ला दिया है। वर्षों से विभिन्न शहरों में अवैध निर्माण बेरोकटोक होते रहे, ध्वस्तीकरण आदेश जारी होकर भी लागू नहीं हुए, और अग्नि सुरक्षा मानकों का खुलेआम उल्लंघन होता रहा।

जानकारों का कहना है कि, इस त्रासदी की जड़ें उस प्रणालीगत भ्रष्टाचार और लापरवाही में हैं जहां अवैध निर्माण पर आंखें मूंद ली जाती हैं, निरीक्षण केवल कागजों पर होते हैं और कार्रवाई के आदेश दबाव में वापस ले लिए जाते हैं।
एसआईटी की जांच अभी शुरूआती चरण में है, लेकिन इस बार जिस तरह से मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है उससे ऐसा लगता है कि, जांच का दायरा काफी बड़ा होने वाला है। शनिवार की पूछताछ और उसके बाद सामने आने वाले तथ्य यह तय करेंगे कि क्या दोषी अधिकारियों पर वास्तविक कार्रवाई होगी या यह जांच भी पूर्व की तरह बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हो जाएगी।
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