
दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ना हर छात्र का सपना होता है। यही वजह है कि यहां हर साल देशभर से लाखों छात्र आते हैं। इनमें एक बड़ी संख्या ऐसे छात्रों की होती है, जो दूसरे राज्यों और शहरों से आते हैं। इन बाहरी छात्रों को सबसे पहले जिस समस्या का सामना करना पड़ता है, वह है रहने की व्यवस्था।
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इस मामले में हॉस्टल को सबसे सुविधाजनक व सुरक्षित विकल्प माना जाता है, लेकिन डीयू में हॉस्टल की सुविधा सभी कॉलेजों में उपलब्ध नहीं है और जहां यह सुविधा है, वहां सीटें बेहद सीमित हैं। ऐसे में सिर्फ डीयू में एडमिशन मिल जाना ही काफी नहीं होता, हॉस्टल पाने के लिए एक अलग और व्यवस्थित प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि डीयू में हॉस्टल कैसे मिलता है। इसकी पूरी प्रक्रिया क्या है और किन नियम-शर्तों का पालन करना अनिवार्य होता है।
डीयू में कितनी हैं हॉस्टल सीटें
दिल्ली यूनिवर्सिटी में हॉस्टल की सुविधा को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। विश्वविद्यालय के केंद्रीय हॉस्टल और अलग-अलग कॉलेजों के अपने हॉस्टल। दोनों को मिलाकर डीयू हॉस्टल में करीब 4,000 सीटें उपलब्ध हैं, जिनमें से लगभग 2,859 सीटें विश्वविद्यालय के 18 केंद्रीय हॉस्टलों में मौजूद हैं।

वहीं हिंदू कॉलेज, हंसराज कॉलेज, रामजस कॉलेज, किरोड़ीमल कॉलेज, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, मिरांडा हाउस, दौलत राम कॉलेज, इंद्रप्रस्थ कॉलेज फॉर वूमेन और दीनदयाल उपाध्याय कॉलेज जैसे कई प्रतिष्ठित कॉलेजों में भी हॉस्टल की सुविधा उपलब्ध है। हालांकि ये इन कॉलेजों के खुद के हॉस्टल हैं, लेकिन डीयू के अंतर्गत आने वाले सभी कॉलेजों में यह सुविधा नहीं है, और जहां है भी, वहां सीटों की संख्या छात्रों की जरूरत के मुकाबले काफी कम पड़ती है। यही वजह है कि हर साल हजारों आवेदकों में से बेहद सीमित छात्रों को ही हॉस्टल में जगह मिल पाती है।
अलग से करना होता है आवेदन
बहुत से छात्रों को लगता है कि, डीयू में एडमिशन मिलना मतलब हॉस्टल मिलने की गारंटी, लेकिन ऐसा नहीं है। संबंधित कॉलेज या विभाग में औपचारिक रूप से एडमिशन पूरा होने के बाद छात्रों को हॉस्टल के लिए अलग से अप्लाई करना पड़ता है। हर कॉलेज और हॉस्टल के अपने नियम, अपनी पात्रता शर्तें, अपनी फीस संरचना और अपनी आवेदन प्रक्रिया होती है। छात्रों को अपने कॉलेज की आधिकारिक वेबसाइट या नोटिस बोर्ड पर जारी होने वाली हॉस्टल संबंधी सूचनाओं पर लगातार नजर रखनी चाहिए और उसी के आधार पर आवेदन करना चाहिए।
मेरिट पर आवंटन
डीयू में हॉस्टल आवंटन का सबसे बड़ा आधार मेरिट होता है। यह मेरिट सीधे तौर पर सीयूईटी यूजी की मेरिट लिस्ट से जुड़ी होती है। कहने का मतलब है कि, जिन छात्रों का सीयूईटी स्कोर बेहतर होता है, उन्हें हॉस्टल में जगह मिलने के चांस ज्यादा रहते हैं। इसके अलावा हर कॉलेज अपने स्तर पर भी एक आंतरिक मेरिट सूची तैयार करता है, जिसमें एडमिशन के समय मिले अंक, कोर्स और छात्र की अन्य पात्रता शर्तों को ध्यान में रखा जाता है। चूंकि सीटें सीमित हैं और मांग बहुत ज्यादा, इसलिए जो छात्र मेरिट में जितना ऊपर रहेगा, उसे हॉस्टल मिलने के चांस उतने ही ज्यादा रहेंगे।
आरक्षण नीति का भी रखा जाता है ध्यान
डीयू के हॉस्टल आवंटन में विश्वविद्यालय की तय आरक्षण नीति का भी पूरी तरह पालन किया जाता है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए हॉस्टल की सीटों में निर्धारित प्रतिशत आरक्षित रखा जाता है। इसके अलावा दिव्यांग छात्रों और कुछ विशेष श्रेणियों के लिए भी अलग से सीटें सुरक्षित रखने का प्रावधान है। हालांकि आरक्षित वर्ग में भी सीटों का आवंटन उसी श्रेणी की मेरिट सूची के आधार पर किया जाता है, यानी आरक्षण का मतलब यह नहीं कि हर आवेदक को अपने आप हॉस्टल मिल जाएगा।
शॉर्टलिस्टिंग के बाद होता है डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन
हॉस्टल के लिए आवेदन करने के बाद, जिन छात्रों के नाम मेरिट और आरक्षण के आधार पर शॉर्टलिस्ट किया जा जाता है। इसके बाद उनके दस्तावेजों का सत्यापन भी किया जाता है। डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के दौरान एडमिशन प्रमाण पत्र, स्थायी और वर्तमान पते का प्रमाण, जाति या श्रेणी प्रमाण पत्र (यदि लागू हो), पहचान पत्र और पासपोर्ट साइज फोटो जैसे दस्तावेजों की जांच की जाती है।

कुछ कॉलेजों और हॉस्टलों में डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के साथ-साथ छात्रों का एक संक्षिप्त इंटरव्यू भी लिया जाता है, ताकि उनकी वास्तविक जरूरत और पात्रता को परखा जा सके। छात्र को चाहिए कि, जब वे हॉस्टल के लिए आवेदन करें तो सबसे पहले ही अपने सभी जरूरी दस्तावेज भी तैयार कर लें, ताकि प्रक्रिया के दौरान किसी तरह की देरी या परेशानी न हो।
समय पर आवेदन क्यों है जरूरी
चूंकि डीयू के हॉस्टलों में सीटें बेहद सीमित हैं। हर साल आवेदकों की संख्या उपलब्ध सीटों से कहीं ज्यादा होती है, इसलिए आवेदन प्रक्रिया में तय समय-सीमा का पालन करना बेहद जरूरी होता है। कई बार अच्छी मेरिट रखने वाले छात्र सिर्फ इसलिए हॉस्टल से वंचित रह जाते हैं क्योंकि उन्होंने तय समय के अंदर आवेदन नहीं किया या फिर समय से जरूरी दस्तावेज नहीं जमा कर सके। ऐसे में सलाह दी जाती है कि, एडमिशन प्रक्रिया पूरी होते ही छात्र तुरंत अपने कॉलेज की हॉस्टल संबंधी सूचनाओं को ट्रैक करना शुरू कर दें।
हॉस्टल की फीस और सुविधाएं
डीयू के केंद्रीय और कॉलेज हॉस्टलों की फीस, प्राइवेट पीजी या हॉस्टल की तुलना में काफी कम होती है, क्योंकि इन पर विश्वविद्यालय की तरफ से सब्सिडी दी जाती है। यही कारण है कि, आर्थिक रूप से सीमित संसाधनों वाले छात्रों के लिए डीयू का हॉस्टल सबसे किफायती और भरोसेमंद विकल्प माना जाता है। हालांकि, फीस की सटीक राशि, कमरे का प्रकार, मेस की सुविधा और अन्य नियम हर कॉलेज और हॉस्टल के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए आवेदन से पहले संबंधित हॉस्टल की आधिकारिक जानकारी जरूर देख लेनी चाहिए।
हॉस्टल न मिलने पर विकल्प
चूंकि डीयू में हॉस्टल की सीटें सीमित हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में छात्रों को यह सुविधा नहीं मिल पाती। ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय के आसपास मौजूद पीजी और निजी हॉस्टल एक विकल्प के तौर पर सामने आते हैं। हालांकि इनकी फीस सरकारी हॉस्टलों की तुलना में कहीं ज्यादा होती है, जो हर छात्र नहीं अफोर्ड कर सकते। इस लिए सलाह दी जाती है कि, एडमिशन मिलते ही छात्र हॉस्टल की प्रक्रिया शुरू कर दें।
दिल्ली यूनिवर्सिटी में हॉस्टल पाना केवल एडमिशन लेने भर से तय नहीं होता, बल्कि इसके लिए मेरिट, आरक्षण नीति, समय पर आवेदन और दस्तावेजों के सही सत्यापन जैसी कई शर्तों को पूरा करना पड़ता है। सीमित सीटों और भारी मांग के बीच यह प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन सही जानकारी और समय पर तैयारी के साथ छात्र इसमें सफलता की संभावना काफी हद तक बढ़ा सकते हैं। इसलिए डीयू में एडमिशन लेने वाले हर बाहरी छात्र को सलाह दी जाती है कि वे एडमिशन प्रक्रिया के साथ-साथ हॉस्टल आवेदन की तैयारी भी समय रहते शुरू कर दें
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