
इस्लामाबाद। पाकिस्तान इन दिनों काफी मुश्किल में घिरा है। वजह है पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी पीओके में लंबे समय से चल रहा विरोध प्रदर्शन। वहीं अब एक और मुसीबत उसके सिर पर आ गई। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा मानवाधिकार रिपोर्ट ने उसकी असलियत सामने ला दी है। इस रिपोर्ट में डिटेल में बताया गया है कि, किस तरह पीओके में पाकिस्तान की आर्मी द्वारा आम नागरिकों को अत्याचार किया जा रहा है और लगातार मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
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इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद पीओके के स्थानीय नेता अब इसका हवाला देकर 5 जून को हुई नागरिकों की हत्याओं की एक निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि, पीओके में प्रस्तावित चुनावों से पहले इस पूरे मामले में जवाबदेही तय की जानी चाहिए, ताकि दोषियों को सजा मिल सके और भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
रावलकोट के धरने से उठी नई मांगें
पीओके के रावलकोट शहर में चल रहे धरने के दौरान जम्मू कश्मीर अवामी एक्शन कमेटी यानी JAAC के नेताओं ने खुलकर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि, प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों ने आम नागरिकों के खिलाफ जरूरत से कहीं ज्यादा बल का इस्तेमाल किया, जिसकी वजह से कई निर्दोष लोगों की मौत हो गई। संगठन ने मांग रखी है कि, इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और बलों की पहचान की जाए और उन पर कानूनी कार्रवाई करते हुए मुकदमा चलाया जाए।

धरने को संबोधित करते हुए JAAC के प्रमुख नेता सरदार उमर नजीर कश्मीरी ने कहा कि, 5 जून को हुई हिंसा को किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सीधी अपील की कि, वह पीओके की मौजूदा स्थिति पर गंभीरता से ध्यान दे और चुप्पी तोड़े।
जिम्मेदारों को बेनकाब करने की मांग तेज
JAAC की तरफ से जारी बयानों में साफ कहा गया है कि, जब तक पीड़ितों को न्याय नहीं मिल जाता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। संगठन का कहना है कि, प्रदर्शन के दौरान हुई हत्याओं के पीछे जो भी लोग जिम्मेदार हैं, उन्हें बेनकाब किया जाना चाहिए और सार्वजनिक रूप से जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
इसके साथ ही JAAC ने एक और अहम मांग रखी है। उसकी मांग है कि, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को लेकर संयुक्त राष्ट्र की हालिया मानवाधिकार रिपोर्ट में जो सिफारिशें की गई हैं, उन्हें तुरंत लागू किया जाए। संगठन के नेताओं का तर्क है कि, जब तक नागरिकों की मौत की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच नहीं होती, तब तक क्षेत्र में होने वाली किसी भी चुनावी प्रक्रिया को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। उनका मानना है कि, बिना न्याय के कराए गए चुनाव सिर्फ दिखावा साबित होंगे और असल मुद्दे दबे रह जाएंगे।
5 जून के बाद बिगड़े हालात
5 जून की घटना के बाद से पीओके में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। पाकिस्तान सरकार ने क्षेत्र के कई हिस्सों में अघोषित कर्फ्यू जैसी स्थिति बना दी है, भले ही इसे आधिकारिक रूप से स्वीकार न किया गया हो। पूरे इलाके में भारी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है, जिससे स्थानीय लोगों में भय का माहौल है। सामान्य जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है। लोगों की आवाजाही पर कड़ी पाबंदियां लगाई जा रही हैं और सुरक्षा जांच के नाम पर आम नागरिकों को बेवजह परेशान किया जा रहा है।
रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि, बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया है, जबकि कुछ प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं को नजरबंद कर दिया गया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि, उन्हें लगातार डराया-धमकाया जा रहा है, ताकि वे विरोध प्रदर्शन से पीछे हट जाएं। सड़क परिवहन के बाधित होने से हालात और भी गंभीर हो गए हैं। पूरे पीओके में जरूरी सामानों की भारी किल्लत पैदा हो गई है और आम लोगों को पेट्रोल-डीजल तक नहीं मिल पा रहा है, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
कई महीने से चल रहा प्रदर्शन
गौरतलब है कि, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पिछले कई महीनों से विरोध प्रदर्शनों चल रहा है। यह आंदोलन शुरुआत में भारी महंगाई, बिजली बिलों में लगातार हो रही बढ़ोतरी और पाकिस्तानी सेना के दमनकारी रवैये के खिलाफ शुरू हुआ था। आम जनता बिजली की ऊंची कीमतों और बुनियादी सुविधाओं की कमी से त्रस्त होकर सड़कों पर उतरी थी, लेकिन समय के साथ इस आंदोलन का दायरा काफी बढ़ गया है और अब इसमें कई नई और अहम मांगें भी जुड़ चुकी हैं। प्रदर्शनकारियों की तरफ से एक विस्तृत 38 सूत्रीय चार्टर पेश किया गया है, जिसमें उनकी तमाम मांगों को दर्ज किया गया है।
नौकरी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग
पीओके के लोग अब सिर्फ महंगाई और बिजली बिलों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने अपने अधिकारों को लेकर आवाज और बुलंद कर दी है। स्थानीय जनता नौकरियों और राजनीति में अपने लिए उचित और निष्पक्ष प्रतिनिधित्व की मांग कर रही है, ताकि उनके क्षेत्र के फैसलों में उनकी भी भागीदारी सुनिश्चित हो सके। इसके अलावा बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा सुविधाओं की मांग भी इस आंदोलन का अहम हिस्सा बन चुकी है, क्योंकि दशकों से इन बुनियादी क्षेत्रों में क्षेत्र को उपेक्षित रखा गया है।
अब तक सैकड़ों लोगों की मौत का दावा
इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान पाकिस्तानी पुलिस और सुरक्षा बलों की ओर से कई बार फायरिंग की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें अब तक कम से कम 100 लोगों के मारे जाने का दावा किया जा रहा है। यह आंकड़ा दिखाता है कि, पीओके में स्थिति कितनी गंभीर और संवेदनशील बनी हुई है। स्थानीय संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि, पाकिस्तानी प्रशासन इन घटनाओं को दबाने और सच्चाई छिपाने की लगातार कोशिश कर रहा है, जबकि पीड़ित परिवार और आम जनता न्याय की गुहार लगा रहे हैं।
कुल मिलाकर, संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पीओके के हालात को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। अब देखना यह होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है और क्या पाकिस्तान पर स्वतंत्र जांच कराने का दबाव बन पाता है, या फिर पीओके के लोगों का यह संघर्ष यूं ही अनसुना रह जाएगा।
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