
नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़े और ऐतिहासिक बदलाव की तैयारी तेज हो गई है। केंद्र सरकार ने लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर महिला आरक्षण लागू करने के मकसद से एक नए संविधान संशोधन को लगभग अंतिम रूप दे दिया है। सूत्रों के अनुसार इस प्रस्ताव पर सरकार के उच्च स्तरों पर कई दौर की बातचीत हो चुकी है और ड्राफ्ट काफी हद तक तैयार भी हो चुका है। यह प्रस्तावित कानून संविधान (133वां संशोधन) बिल के रूप में संसद में पेश किया जा सकता है।
इसे भी पढ़ें- मिशन 2027: अखिलेश में खोला महिला आरक्षण का मोर्चा, विधानसभा चुनाव में लागू करने की मांग
कम नहीं होंगी लोकसभा सीटें
प्रस्तावित 133वां संशोधन बिल मोटे तौर पर उस संविधान (131वां संशोधन) बिल पर आधारित होगा जो पहले विफल रह चुका है। हालांकि, इस बार सरकार ने उन कमियों को दूर करने की कोशिश की है जिनकी वजह से पिछला प्रयास सफल नहीं हो सका था। सबसे बड़ी चिंता परिसीमन को लेकर थी, यानी सीटों की सीमाएं तय करने की प्रक्रिया में दक्षिणी राज्यों को अपना प्रतिनिधित्व घटने का डर था।

नए प्रस्ताव में इस चिंता को दूर करने की कोशिश की गई है। इसमें यह सुझाव दिए जाने की संभावना है कि 1971 की जनगणना पर आधारित मौजूदा अंतर-राज्यीय सीट अनुपात में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि किसी भी राज्य की लोकसभा सीटें कम नहीं होंगी। हालांकि, राज्यों के भीतर चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं 2011 की जनगणना के आधार पर नए सिरे से तय की जा सकती हैं।
इन अनुच्छेदों में होगा बदलाव
एक मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से लिखा गया है कि, इस प्रस्तावित बिल में संविधान के आर्टिकल 55, 81, 82, 170, 330, 332 और 334A में संशोधन की मांग की जा सकती है। ये अनुच्छेद मुख्य रूप से राष्ट्रपति के चुनाव, लोकसभा की संरचना, परिसीमन, राज्य विधानसभाओं की सीटों और अनुसूचित जाति-जनजाति के आरक्षण से संबंधित हैं।
प्रस्तावित कानून में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या में जहां तक संभव और व्यावहारिक हो, एक समान 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का प्रावधान किया जा सकता है। इसे लागू करने के लिए सरकार लोकसभा में लंबित परिसीमन बिल में बदलाव करने पर विचार कर रही है, जिसमें सीटों की संख्या बढ़ाने को उन सिद्धांतों में शामिल किया जाएगा जो भविष्य के परिसीमन आयोग का मार्गदर्शन करेंगे।
SC-ST का प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा
इस पूरे प्रस्ताव का एक बड़ा और सकारात्मक पहलू यह है कि, सीटों की संख्या बढ़ने से केवल महिलाओं को ही नहीं, बल्कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को भी सीधा फायदा होगा। मौजूदा सोच के अनुसार लोकसभा में SC सीटों की संख्या 84 से बढ़कर 136 हो सकती है, जबकि ST सीटों की संख्या 47 से बढ़कर 70 हो सकती है।
यह केवल संख्या में बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि इससे एक बड़ी विसंगति भी दूर होगी। अभी तक लोकसभा में अनुसूचित जातियों के लिए 15.46 प्रतिशत आरक्षण था, जबकि संविधान में उनके लिए 16 प्रतिशत का प्रावधान है। सीटें बढ़ने के बाद इस अंतर को पाटा जा सकेगा और पूरे 16 प्रतिशत आरक्षण को प्रभावी ढंग से सुनिश्चित किया जा सकेगा।
प्रस्ताव के अनुसार महिलाओं के लिए कोटा वर्टिकली यानी लंबवत रूप से लागू होगा। इसका अर्थ यह है कि, SC और ST के लिए आरक्षित सीटों में से भी एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए अलग से तय की जाएंगी। यानी SC और ST वर्ग की महिलाएं दोहरे आरक्षण की लाभार्थी होंगी, एक तरफ उनकी जाति का आरक्षण और दूसरी तरफ महिला होने का आरक्षण।
महिलाओं को मिलेगा सशक्त मंच
इस फॉर्मूले के अनुसार प्रस्तावित 136 SC सीटों में से लगभग 45 सीटें और 70 ST सीटों में से लगभग 23 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती हैं। यह व्यवस्था समाज के सबसे वंचित और पिछड़े वर्गों की महिलाओं को राजनीतिक मंच पर सशक्त भागीदारी का अवसर देगी।
सूत्रों के अनुसार इस पूरे ढांचे का मकसद 2029 के आम चुनावों से पहले इसे लागू करने की समय-सीमा को बनाए रखना है। इसके लिए पीएमओ में भी उच्च स्तरीय बैठकें हो चुकी हैं। सरकार राज्यों की उस चिंता को भी गंभीरता से ले रही है, जिसमें उन्हें डर है कि, प्रतिनिधित्व में उनका हिस्सा बदल सकता है। नए प्रस्ताव में इसी चिंता को दूर करने की कोशिश की गई है।

हालांकि, सरकार तब तक इस बिल को आगे नहीं बढ़ाएगी जब तक उसे इसे पास कराने के लिए जरूरी संख्या का पूरा भरोसा न हो जाए। पिछले प्रयास की तरह ही इस बिल को भी दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और कम से कम आधे राज्यों की मंजूरी की आवश्यकता होगी। यह एक कठिन राजनीतिक लक्ष्य है। एक वरिष्ठ सूत्र की माने तो सब कुछ संख्या पर निर्भर करता है। इससे साफ संकेत मिलता है कि सरकार जरूरी राजनीतिक समर्थन सुनिश्चित होने के बाद ही इस ऐतिहासिक कानून को संसद में लाएगी।
यदि यह बिल पास हो जाता है तो यह भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं और वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों तक महसूस किया जाएगा।
इसे भी पढ़ें- प्रियंका गांधी ने सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा, कहा- महिला आरक्षण का नहीं, परिसीमन का है विरोध



