
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर आरक्षण के मुद्दे ने गर्माहट पैदा कर दी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी की घेराबंदी करते हुए महिला आरक्षण को लेकर नया मोर्चा खोल दिया है।
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चुनावी बिसात पर बड़ा दांव
लखनऊ से जारी एक कड़े बयान में अखिलेश यादव ने मांग की है कि, महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले प्रावधान को आगामी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ही तुरंत लागू करने की घोषणा की जाए। यह मांग न केवल भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है, बल्कि उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात पर एक बड़ा दांव भी है, क्योंकि सपा अब अपने पीडीए फॉर्मूले के साथ आधी आबादी के वोट बैंक को भी पूरी ताकत से साधने की कोशिश में जुट गई है।
अखिलेश यादव ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को आड़े हाथों लेते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि, सरकार को या तो 2027 के चुनावों तक इस आरक्षण को जमीन पर उतारने की एक निश्चित समयसीमा बतानी चाहिए या फिर उसे सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि वह महिलाओं के अधिकारों और उनके राजनीतिक सशक्तिकरण के पूरी तरह खिलाफ है।
जन आन्दोलन की चेतावनी
अखिलेश यादव का यह बयान उस समय आया है जब हाल ही में संसद में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक पारित होने में विफल रहा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी इस मांग को दोहराते हुए लिखा कि, समाजवादी पार्टी और उनका पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) गठबंधन हमेशा से महिलाओं के हक की बात करता रहा है और अब समय आ गया है कि, इसे कागजों से निकालकर चुनावी प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि इस मुद्दे पर चुप्पी नहीं तोड़ी गई और जल्द ही कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया, तो समाजवादी पार्टी इसे एक बड़े जन आंदोलन की शक्ल दे देगी। उन्होंने कहा कि पार्टी अब चुप बैठने वाली नहीं है और वह हर सप्ताह प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में रैलियों और सभाओं के माध्यम से इस मांग को उठाएगी ताकि जनता के बीच भाजपा की नीयत का पर्दाफाश किया जा सके। अखिलेश का यह रुख बताता है कि वे 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं।
पीएम मोदी पर पलटवार
इस दौरान अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक पुराने वीडियो को साझा करते हुए उन पर तीखा पलटवार भी किया। इस वीडियो में प्रधानमंत्री ने अतीत में समाजवादी पार्टी पर संसद में महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करने का आरोप लगाया था। अखिलेश ने इस वीडियो के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब गेंद भाजपा के पाले में है और वह केवल पुरानी बातों का हवाला देकर जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
उन्होंने आरोप लगाया कि, भाजपा केवल चुनाव जीतने के लिए महिला कार्ड खेलती है, लेकिन जब वास्तव में उन्हें अधिकार देने की बारी आती है, तो वह पीछे हट जाती है। सपा प्रमुख ने पश्चिम बंगाल के चुनावों का जिक्र करते हुए भी भाजपा पर हमला बोला और कहा कि वहां जिस तरह से मनमर्जी से परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश की गई, वह लोकतंत्र के लिए घातक है।
सोची समझी रणनीति का हिस्सा
संसद में हालिया घटनाक्रम का जिक्र करते हुए यह स्पष्ट हुआ कि, महिला आरक्षण विधेयक को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। सदन में 298 सांसदों ने इसके समर्थन में मतदान किया, जबकि 230 सदस्यों ने इसके खिलाफ वोट डाला। नियमों के अनुसार, इसे पारित करने के लिए कम से कम 352 मतों की आवश्यकता थी। इस विफलता को आधार बनाकर अखिलेश यादव अब जनता के बीच यह संदेश ले जाना चाहते हैं कि केंद्र सरकार की इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह ऐतिहासिक कदम रुक गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, अखिलेश यादव की यह मांग एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद सपा का मनोबल बढ़ा हुआ है और वह अपने पीडीए आधार को और अधिक विस्तार देना चाहती है। महिलाओं को आरक्षण की वकालत करके वे यह दिखाना चाहते हैं कि सपा न केवल जातियों की बात करती है, बल्कि वह आधी आबादी के प्रतिनिधित्व के लिए भी उतनी ही गंभीर है।
सत्ता के समीकरण बदलने की योजना
2027 के चुनावों से पहले यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति में ध्रुवीकरण या नए गठबंधन की दिशा तय कर सकता है। भाजपा के लिए यह स्थिति असहज हो सकती है क्योंकि वह खुद को महिला कल्याण का सबसे बड़ा पैरोकार बताती रही है, लेकिन 2027 की समयसीमा की मांग ने उसे अब रक्षात्मक होने पर मजबूर कर दिया है।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में, जहां महिला मतदाताओं की भूमिका निर्णायक होती जा रही है, वहां अखिलेश यादव का यह आंदोलन सत्ता के समीकरणों को बदल सकता है। सपा प्रमुख ने साफ कर दिया है कि, वे इस मुद्दे को अगले तीन सालों तक जीवंत रखेंगे। उनके इस तेवर से साफ है कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की सड़कों पर महिला आरक्षण और पीडीए के हक की गूंज और तेज सुनाई देगी। अब देखना यह होगा कि केंद्र सरकार इस सीधी चुनौती का जवाब किस तरह देती है और क्या 2027 के चुनावों में वास्तव में महिला आरक्षण की झलक देखने को मिलेगी।
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