यूपी में महिला आरक्षण पर महासंग्राम, अपर्णा यादव ने जलाया सपा-कांग्रेस का झंडा, अखिलेश ने कसा तंज

 लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय आधी आबादी यानी महिलाओं के हक को लेकर सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। लखनऊ की सड़कों पर शुक्रवार की रात जो मंजर देखने को मिला, उसने यह साफ कर दिया है कि, आने वाले समय में महिला आरक्षण का मुद्दा सूबे की राजनीति की दिशा तय करने वाला है। राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव ने सीधे तौर पर अपनी पुरानी पार्टी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

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देर रात दिखा हाई वोल्टेज ड्रामा

शुक्रवार देर रात लखनऊ के विधानभवन के सामने हाई-वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला, जब अपर्णा यादव ने कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर सपा और कांग्रेस का झंडा जलाया। यह विरोध प्रदर्शन संसद में महिला आरक्षण बिल के लंबे समय से लंबित होने और विपक्षी दलों के कथित अड़ियल रवैये के खिलाफ था।

aprana yadav

अपर्णा यादव, जो अब भाजपा का चेहरा हैं और मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू भी हैं, उन्होंने विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोला। झंडा जलाते हुए उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि दशकों से महिलाएं अपने हक की लड़ाई लड़ रही हैं, लेकिन सपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों ने हमेशा अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के चक्कर में इस बिल को लटकाए रखा।

उन्होंने कहा, यह सिर्फ एक कागज का टुकड़ा नहीं है, यह करोड़ों महिलाओं के सम्मान और उनके राजनीतिक अधिकारों की बात है। विपक्षी दलों में इच्छा शक्ति की इतनी कमी है कि, वे नहीं चाहते कि महिलाएं सदन में बैठकर देश के लिए फैसले लें। अपर्णा का यह गुस्सा उस टीस को भी दर्शाता है, जो भारतीय राजनीति में लंबे समय से देखी जा रही है।

1996 में पहली बार पेश हुआ था बिल

आपको याद होगा कि, 1996 से लेकर अब तक कई बार इस बिल को पेश करने की कोशिश हुई, लेकिन हर बार सदन में हंगामे और विरोध की भेंट चढ़ गया। कभी बिल की कॉपियां फाड़ी गईं, तो कभी मेजें थपथपाकर कार्यवाही रोकी गई। अपर्णा का तर्क है कि, आज की महिलाएं जागरूक हैं और वे अब इस देरी को बर्दाश्त नहीं करेंगी।

विरोध की यह आग सिर्फ विधानभवन तक सीमित नहीं रही। राज्य महिला आयोग की अन्य सदस्य और समर्थक समाजवादी पार्टी के प्रदेश कार्यालय भी पहुंच गईं। वहां भी जमकर नारेबाजी हुई। आयोग की सदस्यों का कहना है कि, सपा हमेशा से महिला आरक्षण के भीतर कोटे की मांग करके मुख्य बिल की राह में रोड़े अटकाती रही है।

महिला आयोग ने चेतावनी दी है कि, यह तो सिर्फ एक ट्रेलर था। शनिवार को पूरे प्रदेश में और लखनऊ की सड़कों पर एक बड़ा और निर्णायक प्रदर्शन किया जाएगा। आयोग की योजना है कि, इस मुद्दे को गांव-गली तक ले जाया जाए ताकि महिलाओं को पता चले कि उनकी भागीदारी का असली दुश्मन कौन है।

अखिलेश ने किया पलटवार

इस पूरे घटनाक्रम पर समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने चिर-परिचित अंदाज में पलटवार किया। जब उनसे सपा दफ्तर के बाहर हुए प्रदर्शन के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने इसे भाजपा प्रायोजित ड्रामा करार दिया।

अखिलेश यादव ने चुटकी लेते हुए कहा, भाजपा वाले बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन हालत देखिए कि 12 करोड़ महिलाओं वाले उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन करने के लिए उन्हें 12 महिलाएं भी नहीं मिलीं। मुट्ठी भर लोगों को भेजकर झंडा जलवा देना लोकतंत्र नहीं है। सपा अध्यक्ष का इशारा इस ओर था कि भाजपा के पास इस मुद्दे पर कोई जनसमर्थन नहीं है और वे केवल सरकारी मशीनरी यानी महिला आयोग का इस्तेमाल करके राजनीति कर रहे हैं।

डिप्टी सीएम ने दी प्रतिक्रिया

आपको बता दें कि, अखिलेश अक्सर यह स्टैंड लेते रहे हैं कि, महिला आरक्षण में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से कोटे में कोटा होना चाहिए, ताकि आरक्षण का लाभ सिर्फ संपन्न वर्ग की महिलाओं तक सीमित न रहे।

यूपी के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने भी इस मामले में अपनी बात मजबूती से रखी। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद के 75 सालों में महिलाओं को वह हक नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं। पाठक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल की सराहना करते हुए कहा कि आज पूरा देश देख रहा है कि कौन महिलाओं के साथ खड़ा है और कौन उनके खिलाफ।

ब्रजेश पाठक ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, जो लोग इस ऐतिहासिक विधेयक के मार्ग में बाधा बन रहे हैं, उन्हें अब इसका खामियाजा भुगतना होगा। जनता, खासकर महिलाएं, अब चुप नहीं बैठने वालीं। विपक्ष का दोहरा चेहरा बेनकाब हो चुका है।

 विवादों भरा रहा है बिल का सफर 

उल्लेखनीय है कि, महिला आरक्षण बिल (108वां संविधान संशोधन विधेयक) का इतिहास काफी पुराना और विवादों भरा रहा है। साल 1996 में पहली बार देवगौड़ा सरकार ने इसे पेश किया, लेकिन उस वक्त भी बिल पास नहीं हो सका था। इसके बाद साल 2010 में  राज्यसभा में यह बिल भारी हंगामे के बीच पारित हो गया था, लेकिन लोकसभा में इसे कभी पेश ही नहीं किया जा सका क्योंकि कई क्षेत्रीय दलों ने समर्थन वापस लेने की धमकी दी थी।

ये है विरोध की वजह

सपा, राजद और कुछ अन्य दल हमेशा से मांग करते रहे हैं कि 33 प्रतिशत आरक्षण में ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग से कोटा निर्धारित किया जाए। उन्हें डर है कि, बिना कोटे के, केवल ऊंची जाति और रसूखदार परिवारों की महिलाएं ही संसद पहुंचेंगी।

क्या यह 2027 के चुनाव की तैयारी है?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि, अपर्णा यादव का यह आक्रामक रुख और महिला आयोग की सक्रियता सीधे तौर पर आने वाले चुनावों की बिसात बिछाने जैसी है। भाजपा अच्छी तरह जानती है कि, महिला वोटर एक बहुत बड़ा साइलेंट वोट बैंक है, जिसने पिछले कई चुनावों में पार्टी की जीत में बड़ी भूमिका निभाई है।

उज्ज्वला योजना, शौचालय निर्माण और अब महिला आरक्षण के मुद्दे को उठाकर भाजपा महिलाओं के बीच अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहती है। वहीं, सपा इस मुद्दे पर पिछड़ी और दलित महिलाओं के हक की बात करके अपने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को धार दे रही है।

लखनऊ की सड़कों पर जलाए गए ये झंडे केवल विरोध का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह यूपी की राजनीति में एक नए युद्ध का शंखनाद है। एक तरफ अपर्णा यादव के नेतृत्व में भाजपा महिलाओं के अधिकार की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव संख्या और भागीदारी पर सवाल उठा रहे हैं। शनिवार को होने वाला बड़ा प्रदर्शन यह तय करेगा कि यह आंदोलन कितना जनव्यापी बनता है। फिलहाल, उत्तर प्रदेश की राजधानी में सियासी घमासान जारी है और केंद्र में है आधी आबादी का हक।

 

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