
इन दिनों खेल जगत और खेल प्रेमियों की निगाहें स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर पर टिकी हैं, क्योंकि 23 जुलाई से यहां कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का आगाज हो चुका है। ओलंपिक और विश्व चैंपियन नीरज चोपड़ा की अगुवाई में भारत का 125 खिलाड़ियों का दल इस बार पदकों की उम्मीद लेकर मैदान में उतरा है। इसी बीच एक और बड़ी खबर ने खेल प्रेमियों को उत्साहित कर दिया है।
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खबर है कि 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स के शताब्दी संस्करण की मेजबानी भारत को मिल गई है। मतलब 2023 में कॉमनवेल्थ का आयोजन गुजरात के अहमदाबाद शहर में होगा। ऐसे में यह जानना दिलचस्प हो जाता है कि, आखिर लगभग एक सदी पुराने इस खेल आयोजन की शुरुआत कब, कहां और किसने की थी। साथ ही ये भी जानना जरूरी हो जाता है कि, यह किस तरह आज के भव्य स्वरूप तक पहुंचा है।
एक पत्रकार के दिमाग की उपज
कॉमनवेल्थ गेम्स की नींव किसी सरकार या खेल संगठन ने नहीं रखी थी, बल्कि एक साधारण खेल पत्रकार के विचार ने रखी थी। कनाडा के हैमिल्टन शहर के अखबार ‘हैमिल्टन स्पेक्टेटर’ से जुड़े स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट बॉबी रॉबिन्सन को इन खेलों की शुरुआत का श्रेय दिया जाता है। वे खुद भी खिलाड़ी थे, जो बाद में कोच भी बने।

1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक से लौटने के बाद रॉबिन्सन के मन में यह विचार आया कि, ब्रिटिश साम्राज्य से जुड़े देशों के खिलाड़ियों के लिए एक अलग बहु-खेल आयोजन कराया जाए। उन्होंने ही सरकार और खेल संस्थानों को इस विचार के लिए राजी किया। रोबिन्सन ने अपनी लगन व मेहनत से इस सपने को हकीकत में बदल डाला।
हैमिल्टन में 1930 में हुआ था पहला आयोजन
कॉमनवेल्थ का पहला आयोजन साल 1930 में 16 से 23 अगस्त बीच कनाडा के हैमिल्टन शहर में हुआ था। उस वक्त इसे पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स के नाम से जाना गया। इस पहले संस्करण में महज 11 देशों के करीब 400 एथलीटों ने छह खेलों और 59 स्पर्धाओं में हिस्सा लिया था। संसाधनों की कमी के बावजूद यह आयोजन बड़ी सफलता के साथ संपन्न हुआ। दिलचस्प बात यह है कि उस दौर में खिलाड़ियों के ठहरने के लिए आधुनिक एथलीट विलेज जैसी कोई सुविधा नहीं थी, बल्कि उन्हें हैमिल्टन के प्रिंस ऑफ वेल्स स्कूल में ठहराया गया था। यहां एक-एक क्लासरूम में दो दर्जन तक खिलाड़ियों को रखा गया। यहां ये भी जान लेना जरूरी है कि साल 1930 के इस पहले संस्करण में भारत ने हिस्सा नहीं लिया था।
नाम बदलते रहे, मकसद वही रहा
इन खेलों का नाम समय के साथ कई बार बदला, जो ब्रिटिश साम्राज्य के धीरे-धीरे बदलते राजनीतिक स्वरूप और उपनिवेशवाद के अंत को दर्शाता है। शुरुआत में इसे ‘ब्रिटिश एम्पायर गेम्स’ कहा गया, जो 1950 तक चला। इसके बाद 1954 से 1966 तक इसे ब्रिटिश एंपायर एंड कॉमनवेल्थ गेम्स और 1970 से 1974 तक ब्रिटिश कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम से जाना गया।

वर्ष 1978 में इसे कॉमनवेल्थ गेम्स या राष्ट्रमंडल खेल के नाम से जाना जाने लगा और यही नाम आज तक चल रहा है। इन्हें ‘फ्रेंडली गेम्स’ यानी दोस्ताना खेल भी कहा जाता है, क्योंकि इनका मूल मकसद राष्ट्रमंडल देशों के बीच खेल भावना और आपसी सद्भाव को बढ़ावा देना रहा है।
द्वितीय विश्व युद्ध के कारण 1942 और 1946 में इन खेलों का आयोजन नहीं हो सका। इसके अलावा यह आयोजन हर चार साल में लगातार होता रहा है। शुरुआती दशकों में इसमें केवल पुरुषों की एकल प्रतिस्पर्धाएं शामिल थीं, लेकिन 1998 में कुआलालंपुर में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब टीम खेलों को भी इसमें शामिल किया गया।
भारत का सफर
भारत कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में एक मजबूत खिलाड़ी के तौर पर अपनी पहचान बना चुका है। भारत का CWG में प्रदर्शन शानदार रहा है। 2022 के बर्मिंघम संस्करण में वह पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा था। भारत ने एक बार इन खेलों की मेजबानी भी की है। साल 2010 में नई दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में, जब भारतीय खिलाड़ियों ने 38 स्वर्ण सहित कुल 101 पदक जीते थे।
2030 में अहमदाबाद में होगा आयोजन
अब 2030 में होने वाले शताब्दी संस्करण की मेजबानी के लिए अहमदाबाद को प्रस्तावित स्थल चुना गया है, जिसे भारत की 2036 ओलंपिक मेजबानी की महत्वाकांक्षी तैयारियों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में कॉमनवेल्थ स्पोर्ट्स जनरल असेंबली की बैठक में इस बोली को औपचारिक मंजूरी दी गई है। इस मंजूरी के साथ ही भारत को करीब बीस साल बाद एक बार फिर इस बड़े खेल आयोजन की मेजबानी करने का मौका मिलेगा।
सीमित है 2026 का बजट
इस बार का आयोजन कुछ अलग है। 2026 के ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स का बजट सीमित रखा गया है। इसमें केवल दस खेलों को शामिल किया गया है। इस बार कुश्ती, शूटिंग, बैडमिंटन और हॉकी जैसे खेलों को बाहर कर दिया गया है। भारत के लिए यह एक झटका माना जा रहा है, क्योंकि इन खेलों में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन हमेशा से मजबूत रहा है। इसके बावजूद भारत इस बार 8 सामान्य और 5 पैरा खेलों में हिस्सा ले रहा है। ऐसे में नीरज चोपड़ा तथा मीराबाई चानू जैसे सितारों से पदक की उम्मीद है।
भारत को मिली मेजबानी
एक अखबार के खेल पत्रकार के दिमाग में जन्मा विचार आज करीब सौ साल बाद दुनिया के सबसे बड़े बहु-खेल आयोजनों में गिना जाता है। कॉमनवेल्थ गेम्स ने न सिर्फ अपना नाम और स्वरूप कई बार बदला, बल्कि छोटे स्तर से शुरू होकर आज यह दर्जनों देशों और हजारों खिलाड़ियों को एक मंच पर लाने वाला बड़ा आयोजन बन चुका है।
भारत के लिए यह सफर और भी खास है, क्योंकि दिल्ली 2010 की सफल मेजबानी के बाद अब अहमदाबाद 2030 में इतिहास के इस शताब्दी अध्याय का हिस्सा बनने जा रहा है। फिलहाल सभी की निगाहें ग्लासगो में जारी मौजूदा संस्करण पर टिकी हैं, जहां से भारत के लिए नई उपलब्धियों की उम्मीद की जा रही है।
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