संघर्ष की मिसाल: जमीन बेचकर पिता ने दिलाई राइफल, बेटी ने एशियन गेम्स में जीत लिया सिल्वर

नई दिल्ली। खेल जगत की हर बड़ी कामयाबी के पीछे अक्सर वर्षों का त्याग, संघर्ष और अनकही कुर्बानियों की एक गाथा होती है। आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 में रविवार को जब भारत की झोली में महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल टीम स्पर्धा का रजत पदक आया, तो पूरा देश झूम उठा। साथ ही इस उपलब्धि को हासिल करने वाली 23 वर्षीय निशानेबाज सोनम मस्कर की एक ऐसी प्रेरक कहानी सामने आई, जिसमें एक पिता के संघर्ष और समर्पण की मिसाल देखने को मिली।

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कोरोना ने छीना सब कुछ

संघर्ष की शुरुआत होती है साल 2020 से, जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी की चपेट में थी और पूरा देश लॉकडाउन की जद में था। इसी दौरान सोनम के पिता उत्तम मारुति मस्कर का मुंबई में चल रहा दूध सप्लाई का कारोबार पूरी तरह ठप हो गया और रोजी-रोटी का जरिया छिन गया।

Sonam Maskar

 

परिवार के सामने ऐसा आर्थिक संकट आया कि, मजबूरन उन्हें मायानगरी मुंबई को छोड़कर अपने पैतृक शहर कोल्हापुर लौटना पड़ा। उस वक्त परिवार के पास बचत के नाम पर सिर्फ एक छोटा-सा प्लॉट और एक दुकान ही शेष रह गई थी। यह दौर परिवार के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था, जहां भविष्य की राह पूरी तरह अनिश्चित नजर आ रही थी।

बेटी के सपने के लिए सब कुछ लगाया दांव पर

कोल्हापुर लौटने के बाद सोनम के सामने अपने निशानेबाजी के सपने को नए सिरे से संवारने की चुनौती थी, क्योंकि शूटिंग जैसा खेल जितना गौरवशाली है, उतना ही खर्चीला भी माना जाता है। एक अदद अच्छी राइफल और जरूरी किट खरीदना आसान बात नहीं थी, खासकर तब जब परिवार खुद आर्थिक तंगी से जूझ रहा हो, लेकिन एक पिता के लिए बेटी के सपनों से बड़ा कुछ नहीं होता। उत्तम मस्कर ने अपने दिल पर पत्थर रखकर वह किया, जो शायद हर कोई नहीं कर पाता। बेटी के अपने को ज़िंदा रखने के लिए पिता ने अपनी 0.25 एकड़ जमीन और दुकान, दोनों को बाजार भाव से भी काफी कम कीमत पर बेच दिया।

आज, जब सोनम की बदौलत भारत के खाते में एशियन गेम्स का रजत पदक आया है, तो पिता उत्तम मस्कर की आंखों में गर्व के आंसू हैं। भावुक होते हुए वे कहते हैं,  यह कोई त्याग नहीं था, बल्कि एक पिता के रूप में यह मेरी जिम्मेदारी थी। आज जब मैंने उसे देश के लिए पदक जीतते हुए देखा, तो वे सारी पुरानी मेहनत और कुर्बानियां सफल होती नजर आईं। उनके ये शब्द बताते हैं कि, सच्चा प्यार और समर्पण किसी भी बड़ी से बड़ी कुर्बानी को भी बोझ नहीं, बल्कि एक फर्ज बना देता है।

कॉलेज शुरू हुआ सफर

सोनम का शूटिंग की दुनिया में कदम रखना भी दिलचस्प है। दसवीं कक्षा पास करने के बाद उन्होंने मुंबई के अंधेरी स्थित तोलानी कॉलेज से निशानेबाजी की शुरुआत की। प्रारंभिक दौर में उन्होंने वेध राइफल एंड पिस्टल शूटिंग एकेडमी में एकेडमी द्वारा उपलब्ध कराई गई किट से ही अभ्यास किया, क्योंकि उस समय निजी राइफल खरीदना संभव नहीं था। साल 2022 में जब पिता ने उन्हें अपनी खुद की राइफल दिलाई, तो मानो सोनम के करियर को नए पंख लग गए। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

SONAM MASKAR

इस सफर में एकेडमी के कोच रोहित हवलदार और उनकी पत्नी राधिका बारले हवलदार का योगदान भी रहा। दोनों ने मिलकर सोनम की छिपी प्रतिभा को तराशाना शुरू किय और एक विश्वस्तरीय निशानेबाज बनाया।

कड़ी मेहनत और तकनीकी सुधार से मिली सफलता

कोच रोहित हवलदार बताते हैं कि, जब सोनम ने प्रशिक्षण शुरू किया था, तब उनका स्कोर बहुत साधारण हुआ करता था, लेकिन उनकी तकनीकी समझ शुरू से ही बेहद मजबूत थी, जो उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती थी। कोच ने सबसे पहले उनके शरीर के पोस्चर पर काम किया, कंधे की मांसपेशियों को मजबूत बनाने पर ध्यान दिया और निशाना साधते समय ऊपरी शरीर में स्थिरता लाने के लिए विशेष अभ्यास कराए। इसके लिए सोनम को हर दिन 90 से 120 शॉट्स की कठिन प्रैक्टिस से गुजरना पड़ता था।

कोच के अनुसार, सोनम की सबसे बड़ी ताकत उनकी तकनीक से कहीं ज्यादा उनका मजबूत मानसिक संकल्प और कभी हार न मानने वाला जज्बा रहा है। यही मानसिक दृढ़ता उन्हें बड़े से बड़े दबाव वाले मुकाबलों में भी शांत और केंद्रित बनाए रखती है।

शतरंज से शूटिंग तक का सफर

दिलचस्प बात यह है कि, निशानेबाजी की दुनिया में आने से पहले सोनम स्कूली दिनों में शतरंज की शौकीन थीं। वे स्कूल स्तर पर अपने बड़े भाई-बहन मानसी और सत्यजीत के साथ नियमित रूप से चेस खेला करती थीं। आज भी वे अपने पुराने शतरंज मुकाबलों की चालों को याद रखती हैं और तनाव को दूर भगाने के लिए फुर्सत के पलों में चेस खेलना पसंद करती हैं। शायद यही रणनीतिक सोच उनकी निशानेबाजी में भी झलकती है, जहां एकाग्रता और धैर्य सबसे अहम गुण माने जाते हैं।

लगातार मेहनत ने दिलाई सफलता

सोनम का करियर ग्राफ शुरू से ही ऊपर की ओर बढ़ता रहा है। साल 2023 में दक्षिण कोरिया के चांगवोन शहर में आयोजित ISSF जूनियर विश्व चैंपियनशिप में उन्होंने सातवां स्थान हासिल किया। वहीं, एशियाई चैंपियनशिप में उन्हें चौथे स्थान से संतोष करना पड़ा। लेकिन हार न मानने वाली सोनम ने अपनी मेहनत जारी रखी और 2024 में काहिरा में आयोजित वर्ल्ड कप में अपना पहला अंतरराष्ट्रीय सिल्वर मेडल जीता। इसके कुछ ही समय बाद, राजधानी दिल्ली में आयोजित ISSF वर्ल्ड कप फाइनल में भी उन्होंने रजत पदक पर निशाना साधा, जिससे यह साबित हो गया कि उनकी यह सफलता कोई तुक्का नहीं, बल्कि निरंतर मेहनत का नतीजा है।

एशियन गेम्स 2026 में चमका सितारा आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 के क्वालीफिकेशन दौर में सोनम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 634.1 अंक हासिल किए। इस बेहतरीन स्कोर की बदौलत उन्होंने न सिर्फ टीम स्पर्धा में भारत के लिए सिल्वर मेडल सुनिश्चित किया, बल्कि व्यक्तिगत स्पर्धा के फाइनल में भी अपनी जगह पक्की की, जहां वे छठे स्थान पर रहीं।

 

 

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