
नई दिल्ली। देश के महान शूटर और कोच जसपाल राणा का शुक्रवार, 12 जून को महज 49 वर्ष की आयु में निधन हो गया। दिल्ली के मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत में उनका इलाज चल रहा था। नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष कालीकेश नारायण सिंह देव ने उनके निधन की पुष्टि की। जसपाल राणा का सफर शूटिंग रेंज पर शुरू हुआ और यह सफर न सिर्फ पदकों से भरा हुआ था, बल्कि भारतीय निशानेबाजी को नई ऊंचाइयों तक ले जाने वाला था। एक खिलाड़ी के रूप में उन्होंने राष्ट्र को गौरवान्वित किया और कोच के रूप में उन्होंने नई पीढ़ी को तैयार किया, जिसमें ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर प्रमुख हैं।
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फ्लाइट में बिगड़ी तबियत
एक जून की रात को जर्मनी के म्यूनिख से भारत लौटते समय फ्लाइट में जसपाल राणा की तबीयत बिगड़ गई। वहां उन्हें प्राथमिक चिकित्सा दी गई। दिल्ली पहुंचने पर उन्हें तुरंत मैक्स साकेत अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच में हृदय संबंधी समस्या पाई गई और उनके हार्ट में स्टेंट डाला गया। इसके बावजूद उनकी हालत बिगड़ती गई और उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन की खबर से पूरा खेल जगत स्तब्ध है।
भारत को दिलाया पहला गोल्ड
जसपाल राणा का जन्म 28 जून 1976 को उत्तरकाशी, उत्तराखंड में हुआ था। मात्र 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने 1994 एशियन गेम्स (हिरोशिमा) में 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल इवेंट में गोल्ड मेडल जीतकर भारत को पहला एशियन गेम्स शूटिंग गोल्ड दिलाया। यह उपलब्धि भारतीय शूटिंग के लिए ऐतिहासिक थी। उसके बाद उनका करियर लगातार चमका।

उन्होंने एशियन गेम्स में कुल 8 मेडल जीते, जिनमें 4 गोल्ड, 2 सिल्वर और 2 ब्रॉन्ज है। 2006 दोहा एशियन गेम्स उनके करियर का स्वर्णिम अध्याय था, जहां उन्होंने तीन गोल्ड मेडल जीते और 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल में वर्ल्ड रिकॉर्ड के बराबर स्कोर (590 पॉइंट्स) किया। कॉमनवेल्थ गेम्स में जसपाल राणा भारत के सबसे सफल शूटर रहे।
उन्होंने चार संस्करणों (1994, 1998, 2002 और 2006) में कुल 15 मेडल जीते, जिनमें 9 गोल्ड, 4 सिल्वर और 2 ब्रॉन्ज शामिल हैं। 2002 मैनचेस्टर गेम्स में उन्होंने अकेले 6 मेडल जीते थे। वे अभी भी कॉमनवेल्थ गेम्स इतिहास में भारत के सबसे सफल एथलीटों में शुमार हैं।
अर्जुन अवॉर्ड (1994) से सम्मानित जसपाल राणा की सफलता सिर्फ प्रतिभा की नहीं, बल्कि अनुशासन, मेहनत और दृढ़ संकल्प की भी थी। एक बार 1994 वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप के दौरान घुटने में फोड़े के कारण असहनीय दर्द के बावजूद उन्होंने जींस काटकर शॉर्ट्स बनाकर शूटिंग की और गोल्ड जीता। यह घटना उनकी जज्बे की मिसाल बन गई।
मनु भाकर को बनाया चैंपियन
2012 के आसपास जसपाल राणा ने कोचिंग शुरू की। वे जूनियर टीम के कोच और हाई परफॉर्मेंस ट्रेनर रहे। फरवरी 2025 में उन्हें 25 मीटर पिस्टल के हाई परफॉर्मेंस कोच के रूप में नियुक्त किया गया था। उनका सबसे बड़ा योगदान मनु भाकर के साथ रहा। 2018 में 16 वर्षीय मनु के कोच बने जसपाल राणा ने उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैयार किया।

टोक्यो ओलंपिक के बाद दोनों के बीच मतभेद हो गए थे, लेकिन 2023 में वे फिर जुड़े। मनु भाकर ने पेरिस 2024 ओलंपिक में दो ब्रॉन्ज मेडल (महिला 10 मीटर एयर पिस्टल और मिक्स्ड टीम) जीते यह 12 वर्ष बाद भारत के लिए ओलंपिक शूटिंग पदक थे।
मनु उन्हें पिता तुल्य मानती थीं और कहती थीं कि जसपाल सर उन्हें हार न मानने की हिम्मत देते थे। जसपाल राणा ने सौरभ चौधरी जैसे अन्य युवा शूटरों को भी मार्गदर्शन दिया। वे सख्त लेकिन समर्पित कोच थे, जो खिलाड़ियों से पूर्ण अनुशासन की मांग करते थे।
अभिनव बिंद्रा ने जताया शोक
2008 बीजिंग ओलंपिक में भारत को पहला शूटिंग गोल्ड दिलाने वाले अभिनव बिंद्रा ने एक्स पर लिखा- जसपाल के निधन की खबर सुनकर दुखी हूं। वे मेरे टीम मेट रहे हैं और भारतीय निशानेबाजी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाली पीढ़ी के अहम सदस्य थे। वह बेहद प्रतिभाशाली और जुनूनी खिलाड़ी थे, जो हर बार रेंज पर उतरते समय देश का गौरव अपने साथ लेकर चलते थे।
उनका जाना भारतीय खेल जगत, खासकर निशानेबाजी के लिए बड़ी क्षति है। मेरी संवेदनाएं उनके परिवार, दोस्तों, शिष्यों और उन सभी लोगों के साथ हैं, जिनके जीवन को उन्होंने छुआ और प्रेरित किया।
शूटिंग संस्कृति को बदला
जसपाल राणा ने न सिर्फ पदक जीते, बल्कि भारतीय शूटिंग की संस्कृति को बदला। 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में जब शूटिंग में भारत की उपस्थिति सीमित थी, तब उन्होंने तिरंगे को बार-बार फहराया। उनकी मृत्यु युवा उम्र में हुई है, जिससे खेल प्रेमी और शूटर समुदाय गहरा आघात महसूस कर रहा है।
NRAI, खेल मंत्रालय और देश के कई दिग्गज खिलाड़ी उनके परिवार के साथ शोक व्यक्त कर रहे हैं। जसपाल राणा का जाना एक युग का अंत है, लेकिन उनकी विरासत अनुशासन, जुनून और राष्ट्र के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
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