
नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी और उसके राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के लिए आज की सुबह एक ऐसे राजनीतिक भूकंप की तरह आई है, जिसने पार्टी की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। लंबे समय से चल रही अटकलों और खींचतान के बाद, अब देश के उच्च सदन यानी राज्यसभा ने भी उस हकीकत पर आधिकारिक मुहर लगा दी है, जिससे ‘आप’ बचने की कोशिश कर रही थी।
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बदल गया समीकरण
राज्यसभा सचिवालय ने एक आधिकारिक अधिसूचना जारी करते हुए राघव चड्ढा समेत आम आदमी पार्टी के सभी सातों बागी सांसदों को भारतीय जनता पार्टी का हिस्सा मान लिया है। इस फैसले के साथ ही राज्यसभा में समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं, जहां बीजेपी की ताकत बढ़कर 113 हो गई है, वहीं केजरीवाल की पार्टी महज 3 सांसदों के साथ हाशिए पर सिमट गई है।

इस पूरे विवाद की जड़ 24 अप्रैल को पड़ी थी, जब राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल जैसे केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद दिग्गजों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बगावत का बिगुल फूंक दिया था। उनके साथ हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, विक्रम साहनी और राजिंदर गुप्ता भी खड़े थे। इनमें से 6 सांसद पंजाब से आते हैं, जो आम आदमी पार्टी का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था। इन बागी सांसदों ने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि, अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली यह पार्टी अब अपने उन नैतिक मूल्यों और सिद्धांतों से पूरी तरह भटक चुकी है, जिनके दम पर इसका जन्म हुआ था।
संजय सिंह ने लिखी चिट्ठी
जैसे ही बगावत की खबर पुख्ता हुई, आम आदमी पार्टी ने इन सांसदों की सदस्यता खत्म करवाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। रविवार, 26 अप्रैल को ‘आप’ के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय सिंह ने राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन को एक लंबी और कड़वी चिट्ठी लिखी। संजय सिंह ने अपनी मांग में स्पष्ट रूप से कहा कि इन सातों सांसदों को ‘दल-बदल विरोधी कानून’ के तहत अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
उन्होंने तर्क दिया कि ये सभी सांसद आम आदमी पार्टी के चुनाव चिन्ह और टिकट पर चुनकर आए थे, इसलिए इनका बीजेपी में जाना न केवल संविधान के साथ बल्कि पंजाब की उस जनता के साथ भी विश्वासघात है जिसने उन पर भरोसा जताया था। संजय सिंह ने यहां तक चेतावनी दी थी कि पार्टी इस मामले में कानूनी लड़ाई भी लड़ेगी।
हालांकि, राज्यसभा सचिवालय के आज के नोटिफिकेशन ने आम आदमी पार्टी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। तकनीकी और कानूनी रूप से सभापति ने ‘आप’ की मांग को दरकिनार कर दिया। इसके पीछे संविधान की ‘दसवीं अनुसूची’ का वह पेंच है, जिसने बागियों की सदस्यता बचा ली।
अब सत्ता पक्ष की तरफ बैठेंगे सातों सांसद
कानून के मुताबिक, यदि किसी पार्टी के कुल सांसदों में से दो-तिहाई सदस्य एक साथ पार्टी छोड़कर किसी दूसरे दल में विलय करते हैं, तो उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा में कुल 10 सांसद थे और राघव चड्ढा ने बड़ी ही चतुराई से 7 सांसदों का आंकड़ा जुटाया, जो दो-तिहाई से भी अधिक है। इसी गणित ने संजय सिंह की कानूनी घेराबंदी को फेल कर दिया।

इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा झटका अरविंद केजरीवाल की निजी और राजनीतिक साख को लगा है। राघव चड्ढा और संदीप पाठक जैसे नेता न केवल सांसद थे, बल्कि वे पार्टी की रणनीतियों के मुख्य आधार स्तंभ थे। पंजाब जैसे राज्य में, जहां पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार है, वहां से चुनकर आए सांसदों का इस तरह पाला बदलना यह संकेत देता है कि पार्टी के भीतर सबकुछ ठीक नहीं है। राज्यसभा सचिवालय के इस फैसले के बाद अब उच्च सदन की कार्यवाही में ये सातों सांसद बीजेपी की बेंच पर बैठेंगे और सत्ता पक्ष के फैसलों का समर्थन करेंगे।
राष्ट्रीय विस्तार के सपने को झटका
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल सांसदों का जाना भर नहीं है, बल्कि यह आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय विस्तार के सपनों पर एक बड़ी चोट है। संजय सिंह की दलीलों के बावजूद सचिवालय का यह कदम यह साफ करता है कि कानूनी रूप से ‘आप’ के पास फिलहाल कोई रास्ता नहीं बचा है। अब देखना यह होगा कि, क्या केजरीवाल इस झटके से उबरकर अपनी पार्टी को फिर से खड़ा कर पाएंगे या फिर यह बगावत अन्य राज्यों में भी पार्टी के ढांचे को कमजोर करने की शुरुआत साबित होगी।
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