IAFS-4 शिखर सम्मेलन के अनावरण में एस. जयशंकर ने खींचा भविष्य का रोडमैप

नई दिल्ली। वैश्वीकरण के इस दौर में जहां दुनिया के शक्ति केंद्र बदल रहे हैं। वहीं भारत और अफ्रीका की साझेदारी एक नई वैश्विक व्यवस्था की आधारशिला बनती नजर आ रही है। दिल्ली के कूटनीतिक गलियारों में गुरुवार का दिन बेहद खास रहा, जब विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन (IAFS-4) के आगामी चौथे संस्करण के लिए आधिकारिक लोगो, थीम और वेबसाइट का भव्य अनावरण किया।

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21 सदी का घोषणापत्र था संबोधन

इस दौरान जयशंकर का संबोधन मात्र एक औपचारिक भाषण नहीं था, बल्कि यह 21वीं सदी की उस नई विदेश नीति का घोषणापत्र था जिसमें ग्लोबल साउथ की आवाज को दुनिया की मेज पर सबसे आगे रखने का संकल्प झलकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि, अफ्रीका अब भारत की विदेश नीति के हाशिए पर नहीं, बल्कि उसके केंद्र बिंदु में स्थित है।

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भारत की कूटनीतिक यात्रा में अफ्रीका के साथ संबंधों का एक लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है, लेकिन वर्तमान सरकार के तहत यह संबंध केवल किताबी सहानुभूति से निकलकर ठोस रणनीतिक साझेदारी में बदल गए हैं। विदेश मंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि नई दिल्ली का अफ्रीका के प्रति दृष्टिकोण पूरी तरह से स्पष्ट है और यह समानता, आपसी सम्मान और साझा प्रगति के उन अटल सिद्धांतों पर आधारित है, जो किसी भी औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त हैं। यह एक ऐसी साझेदारी है जहां भारत एक बड़े भाई की भूमिका में नहीं, बल्कि एक ऐसे विश्वसनीय मित्र के रूप में खड़ा है, जो अफ्रीका के विकास में उसकी अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार साथ चलने को तैयार है।

अफ्रीका से शुरू हुआ था सत्याग्रह

जयशंकर ने अपने संबोधन के दौरान उन ऐतिहासिक तंतुओं को फिर से जीवित किया जो भारत और अफ्रीका को सदियों से जोड़े हुए हैं। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी अफ्रीका की धरती के बिना अधूरी है। दक्षिण अफ्रीका की वह मिट्टी जहां महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का पहला बीज बोया था, आज भी भारत और अफ्रीका के बीच एक अटूट भावनात्मक सेतु का काम करती है।

उपनिवेशवाद के काले दौर में जब अफ्रीकी देश अपनी आजादी और पहचान की लड़ाई लड़ रहे थे, तब भारत ने न केवल उनका नैतिक समर्थन किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी आवाज बनकर उभरा। संघर्ष और लचीलेपन का यही साझा इतिहास आज हमारी आधुनिक कूटनीतिक साझेदारी को खाद-पानी दे रहा है।

विदेश मंत्री ने भविष्य की ओर देखते हुए एक बहुत ही महत्वपूर्ण तुलना की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 के लक्ष्य और अफ्रीकी संघ के एजेंडा 2063 को एक-दूसरे का पूरक बताया। उन्होंने विस्तार से समझाया कि, कैसे भारत की विकास यात्रा और अफ्रीका की भविष्य की आकांक्षाएं एक ही दिशा में बढ़ रही हैं। दोनों ही पक्ष सतत विकास और समावेशी प्रगति के माध्यम से अपने नागरिकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना चाहते हैं।

बंद कमरों में अब नहीं होते फैसले

जयशंकर के अनुसार, ये दोनों रोडमैप केवल सरकारी दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि ये अरबों लोगों की उन आकांक्षाओं का प्रतिबिंब हैं जो एक बेहतर, समृद्ध और न्यायपूर्ण विश्व की कल्पना करते हैं।

भारत-अफ्रीका संबंधों की मजबूती का सबसे बड़ा प्रमाण हाल ही में भारत की जी20 अध्यक्षता के दौरान देखने को मिला था। जयशंकर ने गर्व के साथ उस ऐतिहासिक क्षण का जिक्र किया जब भारत के अथक प्रयासों के कारण अफ्रीकी संघ को जी20 का स्थायी सदस्य बनाया गया। उन्होंने इसे वैश्विक शासन की संरचना में एक क्रांतिकारी बदलाव करार दिया।

विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि, भारत का यह मानना है कि, जब तक ग्लोबल साउथ, विशेषकर अफ्रीका, को वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उचित स्थान नहीं मिलता, तब तक कोई भी वैश्विक व्यवस्था वास्तव में लोकतांत्रिक या प्रभावी नहीं हो सकती। यह कदम विश्व को यह संदेश देने के लिए था कि, अब दुनिया के फैसले बंद कमरों में मुट्ठी भर देशों द्वारा नहीं लिए जा सकते।

स्थायी साझेदारी का नया अध्याय

आगामी चौथे शिखर सम्मेलन (IAFS-4) की महत्ता पर चर्चा करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि यह आयोजन भारत और अफ्रीका के बीच स्थायी साझेदारी में एक नया अध्याय लिखने जा रहा है। डिजिटल बुनियादी ढांचे से लेकर स्वास्थ्य सेवा, कृषि से लेकर रक्षा सहयोग और कौशल विकास से लेकर जलवायु परिवर्तन तक, भारत अपनी विशेषज्ञता और संसाधनों को अफ्रीका के साथ साझा करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और अफ्रीका के बीच उच्च स्तरीय राजनीतिक संवाद में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। भारत ने अफ्रीका के लगभग हर देश के साथ अपने संबंधों को व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर मजबूती प्रदान की है।

इस दौरान, जयशंकर ने वैश्विक पटल पर भारत और अफ्रीका की संयुक्त भूमिका का खाका खींचा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले दशकों में वैश्विक चुनौतियों का समाधान खोजने में अफ्रीका की भूमिका निर्णायक होगी। चाहे वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई हो, समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना हो या फिर भविष्य की महामारियों से निपटना हो, भारत और अफ्रीका एक ठोस इकाई के रूप में काम करेंगे।

वेबसाइट और लोगो का अनावरण केवल एक कार्यक्रम की तैयारी नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास का प्रतीक है जो भारत अपने अफ्रीकी भाइयों में रखता है। जयशंकर के इस संबोधन ने यह साफ कर दिया है कि भारत की नेबरहुड फर्स्ट नीति के साथ-साथ एक्ट अफ्रीका भी उसकी विदेश नीति का एक अपरिहार्य स्तंभ बन चुका है, जो आने वाले समय में विश्व राजनीति की दिशा तय करेगा।

 

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