
अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में करीब पांच सौ साल में पहली बार एक ऐसी परंपरा बदलने जा रही है, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। बताया जा रहा है कि, 498 साल बाद रामलला पहली बार नागपंचमी की जगह सावन शुक्ल तृतीया से झूले पर विराजमान होंगे। इस ऐतिहासिक बदलाव के साथ ही 15 अगस्त 2026 से शुरू होने वाला झूलनोत्सव इस बार पूरी तरह नए और भव्य स्वरूप में मनाया जाएगा।
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कब से कब तक चलेगा उत्सव
मंदिर प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार, इस वर्ष सावन का झूलनोत्सव 15 अगस्त की शाम सात बजे से आरंभ होगा और 12 दिनों तक चलेगा। इसे अब तक के सबसे भव्य आयोजनों में गिना जा रहा है। इस क्रम में 17 अगस्त को रामलला को गर्भगृह में विशेष रूप से सजाए गए झूले पर विराजित किया जाएगा।

श्रद्धालु करीब 20 फीट की दूरी से इस अलौकिक दृश्य के दर्शन कर सकेंगे। खास बात यह है कि पहली बार रामलला के झूलनोत्सव का सीधा प्रसारण भी कराया जाएगा, यानी देश-विदेश में बैठे श्रद्धालु भी अपने घरों में बैठकर रामलला को झूला झूलते हुए देख पाएंगे।
बाबर ने रखी थी मुगल सल्तनत की नींव
इतिहास पर नजर डालें तो उज्बेकिस्तान के फरगना से आए जहीरूद्दीन मोहम्मद बाबर ने 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के पहले युद्ध में दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित किया था। इसी जीत के साथ भारत में मुगल वंश की शुरुआत हुई। इतिहासकारों बताते हैं कि, बाबर ने खुद को कट्टर इस्लाम समर्थक साबित करने के इरादे से बड़े पैमाने पर मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए थे। इसी कड़ी में उसने अयोध्या स्थित प्राचीन राम मंदिर को भी ध्वस्त करने का फरमान जारी किया था, ताकि वह मध्य एशियाई और तूरानी परंपरा के अनुसार खुद को ‘पादशाह’ घोषित कर सके।
मीर बाकी ने बनवाया था विवादित ढांचा
बाबर की जीत के करीब दो साल बाद, यानी सन 1528 में उसके सेनापति मीर बाकी ने राम जन्मभूमि पर बने प्राचीन मंदिर को गिराकर वहां एक ढांचा खड़ा करवा दिया था, जिसे बाद में बाबरी ढांचे के नाम से जाना जाने लगा। इसके बाद यह स्थान सदियों तक विवाद, संघर्ष और लंबी न्यायिक लड़ाई का गवाह बना रहा।
इस दौरान रामलला का झूलनोत्सव केवल एक प्रतीकात्मक परंपरा तक सिमट कर रह गया था। वर्ष 1992 के बाद जब रामलला अस्थायी टेंट में विराजमान थे, तब अदालत के निर्देशों के तहत एक साधारण लकड़ी के झूले पर प्रतीकात्मक रूप से यह उत्सव मनाया जाता था। सुरक्षा कारणों और कानूनी बंदिशों के चलते उस दौर में न कोई सांस्कृतिक आयोजन होता था, न ही उत्सव को सार्वजनिक स्वरूप मिल पाता था।
2019 के फैसले के बाद बदली तस्वीर
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया। इसके बाद 2020 में अस्थायी मंदिर में पहली बार अपेक्षाकृत भव्य ढंग से झूलनोत्सव मनाया गया। 2021 में रामलला के लिए विशेष रूप से चांदी का झूला तैयार करवाया गया। हालांकि अब तक यह उत्सव परंपरागत रूप से श्रावण शुक्ल पंचमी से शुरू होता रहा है।
इस साल पहली बार इस तिथि में भी बदलाव किया जा रहा है और उत्सव सावन शुक्ल तृतीया यानी 15 अगस्त की शाम से शुरू होगा। इस शुभ मुहूर्त में रामलला को विशेष रूप से सुसज्जित दिव्य चांदी के झूले पर विराजमान कराया जाएगा। लगातार 12 दिनों तक श्रद्धालु झूला दर्शन कर सकेंगे। वहीं मंदिर परिसर में प्रतिदिन दो घंटे तक भक्ति संगीत, रामभजन, शास्त्रीय संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन होगा। पूरे मंदिर परिसर को विशेष रूप से सजाया जाएगा।
तीन दिन में तीन लाख श्रद्धालु पहुंचे
सावन का महीना शुरू होते ही रामनगरी में श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ रही है। रोजाना एक लाख से अधिक श्रद्धालु रामलला के दर्शन के लिए मंदिर पहुंच रहे हैं। बीते तीन दिनों में करीब तीन लाख श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। आंकड़ों के अनुसार 7 अगस्त को लगभग 91 हजार, 8 अगस्त को करीब 1.15 लाख और 9 अगस्त को शाम सात बजे तक लगभग 97 हजार श्रद्धालुओं ने रामलला के दर्शन किए। आगामी झूलनोत्सव के मद्देनजर श्रद्धालुओं की संख्या में और बड़ा इजाफा होने की संभावना जताई जा रही है।
पुजारियों के ड्रेस कोड बदले
इस बार राम मंदिर के पुजारियों के पहनावे में भी बदलाव किया गया है। अब सभी पुजारी रामानंदाचार्य परंपरा के अनुसार बिना सिला हुआ पीले रंग का उत्तरीय वस्त्र धारण कर ही गर्भगृह में प्रवेश करेंगे।

गौरतलब है कि, प्राण प्रतिष्ठा के बाद पुजारियों को चौबंदी वस्त्र पहनने का निर्देश दिया गया था। अब मंदिर की पूजा-अर्चना व्यवस्था को और अधिक सुव्यवस्थित बनाने के लिए पुजारियों के लिए नए नियम तैयार किए जा रहे हैं। इनमें पुजारियों की दिनचर्या, पूजा-विधि, भगवान के श्रृंगार, भोग, आरती जैसे तमाम धार्मिक अनुष्ठानों को लेकर व्यवस्था बनाई जा रही है।
ट्रस्ट के धार्मिक समिति सदस्य राजकुमार दास के अनुसार, सभी पुजारी सिल्क का बिना सिला उत्तरीय वस्त्र धारण करेंगे। वहीं ठंड के मौसम में इसी तरह के ऊनी वस्त्र पहने जाएंगे। माना जा रहा है कि, आने वाले दिनों में इन नियमों को अंतिम रूप देकर मंदिर की नियमित पूजा व्यवस्था में शामिल कर लिया जाएगा।
ट्रस्ट सदस्यों ने लिया व्यवस्थाओं का जायजा
रविवार को राम मंदिर ट्रस्ट की धार्मिक समिति के सदस्यों ने मंदिर परिसर पहुंचकर झूलनोत्सव से जुड़ी तैयारियों का निरीक्षण किया। इस दौरान ट्रस्ट के अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन, सदस्य महंत दिनेंद्र दास, धार्मिक समिति सदस्य महंत मिथिलेश नंदनी शरण, राजकुमार दास, महंत रामानंद दास, महंत कमल नयन दास और आचार्य इंद्रदेव मिश्र मौजूद रहे। समिति सदस्यों ने श्रद्धालुओं की दर्शन व्यवस्था और पुजारियों की सुविधाओं का भी जायजा लिया। इसके साथ ही पालकी यात्रा और कुबेर टीला पर होने वाले झूलनोत्सव की साज-सज्जा को लेकर भी विस्तृत चर्चा की गई।
इस तरह पांच सदी बाद अयोध्या में एक ऐसी परंपरा फिर से जीवंत हो रही है, जिसे इतिहास के एक कठिन दौर में दबा दिया गया था। भव्य राम मंदिर में इस बार का झूलनोत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बनेगा, बल्कि यह सदियों पुराने संघर्ष के बाद मिली एक नई शुरुआत का भी गवाह बनेगा।
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